यह संकट पूंजीवाद की नहीं सरकारी हस्तक्षेप की देन है - लिंगल - (1)

उदारवादी अर्थशास्त्री क्रिस्टोफर लिंगल पिछले दिनों भारत यात्रा पर आए हुए थे। उन्होंने सेंटर फार सिविल सोसायटी  की चिंतन श्रृंखला के अंतर्गत दो भाषण दिए। वे ग्वाटेमाला के विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर है इसके अलावा सेंटर फार सिविल सोसायटी में रिसर्च स्कालर हैं।राजनीतिक अर्थशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र उनकी दिलचस्पी के मुख्य विषय रहे हैं जिन्हें वे उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं पर फोकस करते हैं। उनकी सिंगापुर के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखी  Singapore's Authoritarian Capitalism: Asian Values, Free Market Illusions, and Political Dependency और  The Rise and Decline of the 'Asian Century': False Starts on the Road to the 'Global Millennium' काफी सराही गईं। सतीश पेडणेकर ने उनसे उनके अकादमिक जीवन ,. पश्चिमी देशों  में पूंजीवाद के गहराते संकट, भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं से जुड़े  कुछ मुद्दों पर बातचीत की। लिंगल ने बहुत इत्मीनान से उनके  विचारोत्तेजक जवाब दिए। प्रस्तुत है उनके साथ हुई बातचीत के कुछ अंश -

अपनी शुरूआती जिंदगी और अकादमिक जीवन के बारे में कुछ बताइए।

अपनी शुरूआती जिंदगी में मैं वकील बनना चाहता था लेकिन जब मैं विश्वविद्यालय गया तो कानून की पढ़ाई करनेवाले बाकी लोग मुझे खास पसंद नहीं आए। इसलिए मैंने अर्थशास्त्र पढ़ना शुरू किया और पाया कि मेरे लिए अपनी बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करने का यही रास्ता है। मजेदार बात यह है कि मैं कभी नहीं समझ पाया कि  मैं ऐसा इसलिए सोचता हूं क्योंकि मैं अर्थशास्त्री हूं या अर्थशास्त्री हूं इसलिए इस ढंग से सोचता हूं। लेकिन जब मैं अर्थशास्त्र का प्रोफेसर बन गया तो अर्थशास्त्र में कानून और नीति  और कानून और नीति में अर्थशास्त्र के महत्व को समझने लगा। मेरा मतलब है कि वे किस तरह एक दूसरे से संबधित हैं। इस तरह मैं अपनी मूल पसंद कानून की ओर लौट आया था। इस तरह मेरा कैरियर एक तरह का चक्र है।

आप लिबर्टी की विचारधारा से कैसे प्रभावित हुए?

मुझे नहीं मालूम कि मैं  इसी तरह पैदा हुआ या इस तरह बन गया। कोई यदि अपनी दादागिरी चलाने की कोशिश करता था तो मैं मैं कड़ा प्रतिरोध करता था। मेरी कई बार स्कूल में शिक्षकों के साथ पटरी नहीं बैठ पाती थी। क्योंकि कई बार मुझे लगता था कि वे मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हैं तो मैं वैसा कह देता था। मैंने हमेशा आथोरिटी का विरोध किया ,उसे चुनौती दी। और मुझे लगता है कि यह मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया है। और इस कारण आखिर में मैं लिबर्टी का इतना कट्टर समर्थक बन गया क्योंकि मेरी मान्यता थी कि लोगों में विचार प्रगट करने की क्षमता होनी चाहिए। इसका महत्व यह है कि अलग –अलग लोगों द्वारा विचार प्रगट किए जाने पर जो विकसित होता है जिसे हम अस्थायी तौर पर सत्य कह सकते हैं जबतक कोई और उसे चुनौती नहीं देता।

किन विचारकों और पुस्तकों ने आपको प्रभावित किया है?

मेरे बौद्धिक विकास में स्टीगलर की- सिटीजन आफ स्टेट – और फ्रीडमैन की -कैपिटलिज्म एंड फ्रीडम-का गहरा प्रभाव रहा।लेकिन इसके बाद फ्रेडरिक हायेक की खासकर –कांस्टीट्यूशन आफ लिबर्टी – ने अर्थशास्त्र के परिसर में मेरी आंखे सामाजिक दर्शन और राजनीतिक दर्शन के विचारों के प्रति खोल दीं। आखिर में परिचय लुडविग वान मिजेज से हुआ जिनकी किताबों ने वह सब भूलने में मदद की थी जो मैंने डाक्टरेट करते हुए सीखा था । इसलिए मैंने डाक्टरेट करते हुए जो सीखा उसे मुझे बाद में नकारना पड़ा।

आज विश्वभर में पूंजीवाद  अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि यह पूंजीवाद का आखिरी संकट है क्योंकि बाद इसके  लोगों को पूंजीवाद से परे जाकर कोई और विकल्प तलाशना पड़ेगा।

यह बात गलत जानकारी पर आधारित है क्योंकि हमें पूंजीवाद का अनुभव नहीं है ।हमने जो देखा है वह है  लंबे समय तक बाजार में राज्य का हस्तक्षेप।मार्क्स ने इसी तरह की भविष्यवाणी की थी। फिर मार्क्स ने जो जाना और हमने हाल ही के वर्षों में देखा  उसे मुक्त बाजार नहीं कहा जा सकता। जिसे पूंजीवाद की असफलता कहा जा रहा है वह किसी तरह के सरकारी हस्तक्षेप से पैदा हुईं हैं।

यह सही है कि हम एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं। यह संक्रमण है वर्तमान स्थिति से उस स्थिति की तरफ जहां ज्यादा पूंजीवाद और कम सरकारी हस्तक्षेप होगा।यह पूंजीवाद का संकट नहीं है। यह संकट है, सरकार ने  कुछ बातों का वायदा किया जिसे वह पूरा नहीं कर पाई।

कुछ लोगों का कहना है कि संकट तो पूंजीवाद में अंतर्निहित है। यह उसका अंग है।

मार्क्स ने बहुत साल पहले यह दलील दी थी। उसने पूंजीवाद के आंतरिक संकट की बात की थी। लेकिन मार्क्स की पूंजीवाद और बाजार किस तरह काम करते हैं  इसके बारे में समझ बहुत कमजोर थी। लेकिन इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि बाजार या पूंजीवाद में संकट की प्रवृत्ति अंतर्निहित है। मार्क्स का यह विचार अब भी रूढ़ है। जब भी आर्थिक बिगाड़ होता है लोग इस विचार को उठा लेते हैं। लेकिन यदि हम समग्र दृष्टि से विचार करें तो आप जो देख रहे हैं वह बाजार की असफलता नहीं है।बाजार स्थिर होना चाहते हैं।यदि बाजार स्थिर नहीं रहते होते तो हम उन पर सदियों पहले पाबंदी लगा चुके होते। बाजार तेजडियों और मंदडियों या आशावादियों और निराशावादियों  से बने होते हैं। जो बाजार को स्थिर बनाए रखते हैं।लेकिन जब किसी कारणवश किसी क्षण ज्यादातर लोग आशावादी या निराशावादी हो जाते हैं तब असंतुलन पैदा होता है। तब हमें जवाब देना पड़ता है कि ऐसा क्यों हुआ।हाल ही वित्तीय ऊथल पुथल  बाजार में तेजडियों के प्रभुत्व से पैदा हुई है। हर कोई खरीदना चाहता था –डाट काम और प्रापर्टी के शेयर। ऐसा होने का एकमात्र कारण यह था कि बाजार में बहुत सारा पैसा था। इसके कारण तेजडिये हावी हुए आखिरकार वह बुलबुला फूट गया।अर्थव्यवस्था ढ़ह गई। इसलिए यह बाजार की गलती नहीं है। मौद्रिक संस्थाओं ने बाजार को झूठे संकेत दिए। उन्होंने संकेत दिए कि बाजार में बड़े तादाद में नई लिक्विडीटी उपलब्ध है। इसलिए कम व्याज दरों पर चाहे जितना कर्ज लेकर खर्च करो। इसलिए तब हमने देखा कि बाजार के भागीदारों ने यह पैसा लिया। यदि सेंट्रल बैंक इसे संभव नहीं बनाता तो यह सब नहीं हो सकता था। यदि आप सेंट्रल बैंक को तस्वीर से हटा दें तो न तो डाट काम बबल होता  न अमेरिकी हाउसिंग लोन बबल होता । इसके अलावा आज का सबसे बड़ा बबल गवर्मेंट बांड बबल भी न होता। यह बबल ग्रीस और यूरोप में फूट रहा है । देर सबेर वह हमें अमेरिका में भी प्रभावित करेगा।और तब तक जारी रहेगा जब तक सेंट्रल बैंक व्याज दरों को कृत्रिम रूप से से इतना कम  रखेंगी। कुछ देशों में यह 0 प्रतिशत से कम है।या जैसे भारत की तरह वह बाजार दरों से कम है। इस तरह बबल बनते रहेंगे। और बबल बाजार के कारण नहीं बनें हैं। आप इतिहास को देखे तो बबल बाजार के कारण पैदा नहीं हुए हैं।वे मौद्रिक नीति की देन हैं। और जैसा कि हम देख रहे हैं मौद्रिक नीति एसेट और एकानामी बबल का कारण है। हम इसे बाजार की असफलता नहीं मानते।