दागियों का सवाल

दागी नेताओं को मंत्री बनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को कोई निर्देश देने के बजाय जिस तरह खुद को केवल सलाह देने तक ही सीमित रखा उसे देखते हुए यह कहना कठिन है कि राजनीतिक दल उसकी राय को पर्याप्त महत्व देंगे। आसार इसी बात के अधिक हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद दागी समझे जाने वाले नेता मंत्री बनते रहेंगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि दागी की कोई सीधी-सरल परिभाषा नहीं है।
 
राजनीतिक दलों के लिए दोषी सिद्ध न होने तक व्यक्ति निर्दोष है। इतना ही नहीं वे तब तक यह दलील देते रहते हैं जब तक मामले का निपटारा अंतिम तौर पर न हो जाए। ज्यादातर मामलों में ऐसा सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर ही होता है। यह तो गनीमत रही कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल में यह पाया कि दो वर्ष से अधिक की सजा वाले मामले में दोषी पाया व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता, अन्यथा वे चुनाव भी लड़ रहे होते और जीतने की स्थिति में मंत्री पद के दावेदार भी बन रहे होते। नि:संदेह नैसर्गिक न्याय का तकाजा यही है कि दोष सिद्ध न होने तक व्यक्ति को निर्दोष माना जाए, लेकिन लोकतंत्र में लोक भावना का भी महत्व है।
 
जब आपराधिक छवि और अतीत वाले नेता मंत्री पदों पर काबिज होते हैं तो इससे लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादा को ठेस पहुंचती है। सबसे खराब बात यह होती है कि राजनीति के अपराधीकरण को बल मिलता है। कई बार राजनीतिक दल इसकी परवाह नहीं करते कि दागी छवि वाले नेता को मंत्रिपरिषद में शामिल करने से जनता और समाज पर क्या असर पड़ने जा रहा है? अक्सर उनके पास यह भी एक आड़ होती है कि गठबंधन राजनीति की मजबूरी के चलते अनचाहे फैसले करने पड़ते हैं। यह शुभ संकेत है कि गठबंधन राजनीति की जड़ें कमजोर होती दिख रही हैं, लेकिन फिलहाल उससे छुटकारा मिलता भी नहीं दिखता।
 
नि:संदेह सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा कि किसे मंत्री बनाया जाए और किसे नहीं, यह प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है, लेकिन इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस अधिकार की मनचाही व्याख्या होती है। कई बार विपक्षी दल जैसे दागी नेताओं को मंत्री बनाए जाने का विरोध करते हैं सत्ता में आने पर वैसे ही नेताओं को मंत्री बनाने के पक्ष में दलीलें दे रहे होते हैं। चूंकि दागी नेता की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं इसलिए अक्सर ऐसा नेता भी दागियों की सूची में शामिल कर लिए जाते हैं जो धरना-प्रदर्शन के दौरान पुलिस से उलङो होते हैं। बेहतर होगा कि एक ओर जहां राजनीतिक दल दागी छवि वाले लोगों को मंत्री बनाने के साथ-साथ चुनाव मैदान में भी उतारने से बचें वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका के स्तर पर ऐसी कोई व्यवस्था बने जिससे गंभीर आरोपों से घिरे नेताओं के मामलों की सुनवाई एक निर्धारित समय में हो सके।
 
अच्छा होगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने उस फैसले पर पुनर्विचार करे जिसमें उसने मोदी सरकार की उस याचिका को सुनने से इन्कार कर दिया था जिसमें उससे ऐसा ही अनुरोध किया गया था। यदि गंभीर आरोपों से घिरे विधायकों और सांसदों के मामले का निपटारा एक निश्चित समय में होने लगे तो फिर उनके मंत्री बनने की संभावनाओं पर एक बड़ी हद तक अंकुश लग सकता है।
 
 
- आजादी.मी