पारदर्शिता लाएगी अदालती कार्रवाईयों की वीडियो रिकॉर्डिंग

अदालती कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग के पक्ष में तीन मुख्य तर्क दिए जा सकते हैं। पहला, जब देश की संसद, चाहे राज्य सभा हो अथवा लोक सभा अथवा राज्यों के विधानसभा की कार्रवाई टीवी पर सजीव प्रसारित की जा सकती है तो फिर अदालतों के पास ऐसा क्या कारण है कि वे इसका विरोध कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट व बॉम्बे हाईकोर्ट तीनों ही पिछले पांच छह सालों में अलग अलग याचिकाओं में वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग को नकार चुके हैं।
 
हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक मामले में वीडियो रिकॉर्डिंग की अनुमति तो दी किंतु बहुत सारी शर्तों के साथ। जिसमें से प्रमुख शर्त यह थी कि रिकॉर्डिंग औपचारिक दस्तावेजों का हिस्सा नहीं बनेगा। आश्चर्य की बात है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने सितंबर 2011 में वीडियो रिकॉर्डिंग की याचिका खारिज करने से कुछ दिन पहले यह टिप्पणी की थी कि वीडियोग्राफी से जजों पर ओछे आरोप लगाना संभव नहीं होगा और इसके सजीव प्रसारण से कोर्ट में भीड़भाड़ कम करने में भी मदद मिलेगी।
 
दूसरा, कई अन्य देशों में अदालती कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग एक सामान्य बात है। चाहे अमेरिका हो अथवा इंग्लैंड अदालती कार्रवाईयां उतनी पारदर्शी होती हैं जितना की वहां की संसद। अमेरिका का 'सन साइन इन द कोर्ट रूम एक्ट' अदालती कार्रवाईयों की मीडिया कवरेज की अनुमति देता है। यूएस के सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर मौखिक बहसों की ऑडियो रिकॉर्डिंग उपलब्ध करायी जाती है।
 
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि इससे वकीलों और जजों के अनुपयुक्त तौर तरीकों जैसे केस को बार बार मुल्तवी करना, अपनी दलीलों से पलटना इत्यादि पर लगाम लग सकेगी। इसके विरोधियों के पास मात्र दो ही दलीलें हैं; एक कि इसमें काफी खर्च आएगा जो कि शायद व्यवहारिक ना हो। और दूसरा कि वकील और जज अपने आप को असहज महसूस करेंगे। ये दोनों ही दलीलें अतार्किक हैं। एक तरफ जहां स्कूलों में स्कूलों में कैमरे लगाने की बात हो रही है, बाजारों व मॉल्स में कैमरे लग चुके हैं वहीं अदालती कार्रवाई की वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग की बात हास्यास्पद है। दूसरी दलील का कारण यह है कि अभी वकीलों के बहस का समय सीमित नहीं होता है और ना ही संरचित। इस वजह से कुछ वकीलों को काफी ज्यादा समय मिलता है और कुछ को बहुत कम। अक्सर जज की टीका टिप्पणी अनौपचारिक और अतार्किक भी होती है। वीडियो रिकॉर्डिंग करने से कोर्ट के माहौल को सुवव्यवस्थित और नियमानुरुप बनाने में काफी मदद मिलेगी। उम्मीद है कि इससे जजों के विवेकाधिकारों का इस्तेमाल कनिष्ठ अधिवक्ताओं के प्रतिकूल नहीं होगा।
 
 
- एड. प्रशांत नारंग
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं)