क्या कपास निर्यात पर पाबंदी अच्छी नीति है ?

पिछले  सोमवार को कपास उत्पादक किसानों और कपास व्यापारी जब अपने काम पर गए तो उन्हें पता चला कि सरकार ने खेल के दौरान ही नियम बदल दिए हैं। विदेश व्यापार माहनिदेशक ने घोषणा की कपास के  और निर्यात पर तुरंत लागू होनेवाली पाबंदी लगा दी गई है।

इससे पहले इन  सभी भले लोगों ने यही सोचा होगा कि  उन्होंने दूसरों के साथ जो योजनाएं बनाई है  अनुबंध किए हैं उसे वे पूरा करेंगे। कुछ लोगों ने यह सोचकर कर्ज भी लिया होगा कि उन्होंने अपने कपास के लिए एक मूल्य हासिल कर लिया है। दूसरी जगहों पर व्यापारियों ने यही सोचकर अपने ग्राहकों को कपड़ा और कपास के अन्य उत्पाद देने का बायदा किया होगा। उन्होंने कर्ज लिया होगा ,अतिरिक्त मजदूर जुटाए होंगे,और इस कपास का उपयोग करने के लिए मशीनें खरीदी होंगी।(कईयों ने तो यह प्रार्थना भी की होगी कि कोई प्रकृतिक आपदा या युद्ध सपने के रासते में बाधक न बनें।) 

ये लोग कितने मूर्ख हैं ! उन्होंने यह सोच कैसे लिया कि उन्होंने जो मेहतन करके कपास उगाया है उस पर उनकी मालकियत है या एक ईमानदार विनिमय में उन्होंने एक भुगतान किया है ? उन्होंने यह सोच कैसे लिया कि जो उनकी मालकियत का है उसे वे जिसे चाहे उसे बेचने के लिए स्वतंत्र है?

पाबंदी के जरिये विदेशी खरीददारों को पहले ही हटा दिए जाने के कारण देश में कपास के भाव में 6प्रतिशत की कमी आई है।। दूसरी तरफ विश्व के दूसरे सबसे बड़े कपास उत्पादक  देश से कपास की और सप्लाई बंद हो जाने के कारण विश्वभर में उसी अनुपात में दाम बढ़े। इन उत्पादकों ,व्यापारियों और वैशिवक उपभोक्ताओं के लिए ये प्रभाव बुनियादी तौर पर वैसे ही हैं जैसे भारत में लगी आग पृथ्वी पर से छ प्रतिशत कपास का सफाया कर दे या बाढ और तूफान रास्तों ,पुलों और बंदरगाहों को इस तरह तबाह कर हे कि भारत से बाकी विश्व की सप्लाई हो ही ना सके। क्या आप ऐसा नहीं सोचते कि ऐसी प्राकृतिक आपदाएं और आर्थिक मूल्य का खात्मा विश्व संपन्नाता के लिए त्रासद हैं।

सरकार ने यह हानिकारक और मनमाना कदम क्यों उठाया ? स्पष्ट  है इस पाबंदी का उद्देश्य है कपास के दाम कम  करके  देश के सूती पकड़ा उद्योग में काम करनेवालों को फेवर करना। सूती कपड़ा उद्योग का सबसे ज्यादा रोजगार उपलब्ध करानेवाले नियोक्ताओं में से है और मुझे अचरज नहीं होगा कि फैसला करनेवाले मंत्रियों के लिए वह कपास उत्पादकों की तुलना में ज्यादा बड़ा वोट बैंक हो।

अभी भारत दुनिया का दूसरा सबसे बडा  कपास उत्पादक है। दूसरी तरफ भारत के सूती कपड़ों के निर्माताओं का दावा है कि उन्हें बांग्लादेश और पाकिस्तान से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। रेकार्ड ग्लोबल उत्पादन और  हाल ही में कपास के भावों में गिरावट के बावजूद सरकार ने फैसला किया कि सूती कपड़ा उद्योग को उनके उत्पादन के सबसे महत्वपूर्ण कच्चे माल के मामले में  विदेशी प्रतियोगिता से  संरक्षण  की आवश्यकता है।

यदि देशी सूती कपड़ा उद्योग मुश्किल में है तो ग्लोबल भाव और मुनाफे की संभावनाएं संकेत करती हैं भारत को सूती कपड़ा बनाने की तुलना में कपास उत्पादन के मामले में थोड़ा बहुत प्रतियोगी लाभ हासिल है।यदि ऐसा है तो ज्यादा नागरिकों और ज्यादा पूंजी को कपास उत्पादन में लगाया जाना चाहिए और कम नागरिको और कम पूंजी को सूती कपड़ा उत्पादन में लगना चाहिए।विदेशी प्रतियोगिता से बचाने के सभी प्रयासों की तरह यह हस्तक्षेप भी  फर्मों को उन शक्तियों से बचाता है जो वैशिवक अर्थव्यवस्था को सामान्य प्रचुरता से बचाने और तुलनात्मक उत्पादक क्षमताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए संसाधनों को आबंटित करती है।(देखे रेकार्डो की प्रतियोगी लाभ की संकल्पना)।सरल भाषा में कहना हो तो इस  तरह कहा जा सकता है कि बाजार हमसे यह कह रहा है कि भारतीयों के लिए अपने लिए सूती कपड़ा बनाने की तुलना में ज्यादा कपड़े हासिल करने के लिए कृषि ज्यादा सस्ता तरीका है।

यह सही है लुघकालिक दृष्टि से यह पाबंदी के कारण कपास  के कम हुए दाम देशी सूती कपड़ा निर्माताओं को लाभ पहुंचाएगें। लेकिन  इस तर्क के तहत यह पाबंदी  देशी कपास उत्पादकों और व्यापारियों को नुक्सान पहुंचाएगी। इसके अलावा यह बिदेशों में बने सूती उत्पादों के दाम बढ़ाकर और अन्य विदेशी वस्तुओं के अप्रत्यक्ष रूप से दाम बढ़ाकर देशी उत्पादको और उपभोक्ताओं को ठेस पहुंचाएगी।

इस पाबंदी से अप्रत्यक्ष रूप से जो नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे उसको देख पाना कठिन हो सकता है लेकिन इस तरह की संरक्षणवादी नीतियों  का प्रभाव बहुत व्यापक और उत्पादन की सभी क्षेत्रों पर पड़ता है और उससे सभी वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं।इस तरह की नीति प्राकृतिक आपदाओं की श्रृंखलाओं की तरह है जो उत्पाद और बुनियादी ढ़ाचे को तबाह कर देती है। तबाही का हर मामला एक समूह की तुलना में दूसरे समूह सापेक्ष सहायता कर सकता है।लेकिन पाबंदी और तबाही सामान्य नीति के रूप में अभाव और गरीबी ही पैदा करते हैं।

- एंड्रूज जी हम्फ्री