भ्रष्टाचार संपत्ति कम होने का स्वाभाविक परिणाम

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि पूंजीवाद में भ्रष्टाचार, ब्लैक मार्केटिंग है, रिश्वत है। इन सबके लिए आप क्या कहते हैं?

इस सबका कारण पूंजीवाद नहीं है। इस सबका कारण पूंजी का कम होना है। जहां पूंजी कम होगी वहां भ्रष्टाचार नहीं रोका जा सकता। लोग होंगे बहुत,पूंजी होगी कम तो लोग सब तरह के रास्तें खोजेंगे पूंजी की मालकियत करने के । अगर दुनिया से भ्रष्टाचार मिटाना है तो भ्रष्टाचार मिटाने की फिक्र न करें। भ्रष्टाचार केवल बाइ प्रोडक्ट है उससे कोई लेना देना नहीं है। लेकिन सारे नेता भ्रष्टाचार मिटाने में लगे हैं। सारे साधु भ्रष्टाचार मिटाने में लगे हैं। वे कहते हैं हम भ्रष्टाचार मिटाएंगे जबकि असली सवाल यह है कि संपत्ति कम है भ्रष्टाचार होगा। भ्रष्टाचार संपत्ति कम होने का स्वाभाविक परिणाम है।अगर हम हजार लोग यहां है और खाना दस आदमियों के लिए है तो क्या आप समझते हैं कि खाना चोरी से प्राप्त करने की कोशिश नहीं की जाएगी?

यह भ्रष्टाचार है, यह जो रिश्वतखोरी है यह इस बात का सबूत है कि देश में लोग ज्यादा है और संपत्ति कम है। इस सीधे तथ्य को हम न समझेंगे। एक आदमी को जब बुखार चढ़ता है तो कुछ लोग बुखार को बीमारी समझ लेते हैं। लोग कहते हैं इस आदमी का शरीर गरम हो गया है एक सौ दो बुखार है। ठंडा पानी डालकर इसका बुखार किसी वक्त ठीक करो।वह उसको मार डालेंगे।बुखार बीमारी नहीं है सिर्फ खबर है कि भीतर अव्यवस्था हो गई है।यह जो भ्रष्टाचार हमें दिखाई पड़ता है – यह बीमारी नहीं सिर्फ खबर है कि पूंजी कम और लोग ज्यादा हैं। लेकिन भ्रष्टाचार कम करना है पर पूंजी बढ़ानी नहीं है,लोग कम करने नहीं हैं। लोगों को भगवान पैदा कर रहा है तो भगवान से बड़ा भ्रष्टाचारी  इस वक्त कोई भी नहीं है क्योंकि लोग जितने पैदा होते जाएंगे भ्रष्टाचार बढ़ेगा। संख्या बढ़ती जाएगी संपत्ति पैदा करनी नहीं है। और संपत्ति हम पैदा करेंगे और जनसंख्या भगवान पैदा करेगा तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाएगा।इधर हमें भगवान के इस निरंतर वरदान पर रोक लगानी पड़ेगी। उनसे हाथ जोड़कर कहना पड़ेगा कि अब बस,अब लोग नहीं चाहिए और अगर लोग भेजते हो तो सबके साथ दस एकड़ जमीन और एक-एक फैक्टरी साथ भेजो।

लोग अनैतिक नहीं हैं जैसा कि सारे धर्मगुरू और नेता समझते हैं। लोग अनैतिक नहीं है स्थिति अनैतिक है। कोई अनैतिक नहीं है। न कोई नैतिक होता है न अनैतिक होता है। इस अनैतिक में भी कोई अगर बहुत श्रम करे तो नैतिक हो सकता है तो उसकी कुल जिंदगी नैतिक होने में व्यय हो जाएगी।वह कुछ और न कर पाएगा।बस किसी तरह अपने को चोरी से रोक ले। आंख बंद करके हाथ पैर रोककर खड़ा हो जाए। इसमें बहुत श्रम करके कोई नैतिक हो सकता है।लेकिन यह स्थिति अनैतिक है।इसलिए इस स्थिति को बदलने का सवाल है न कि भ्रष्टाचार रोको,भ्रष्टाचार रोको आंदोलन चलाओं। नारे लगाओ,भाषण दो। कोई भी नहीं रोक पाएगा। रुकेगा अपने आप अगर संपत्ति बढ़ेगी। विकसित होगी अगर हम संपत्ति इतनी पैदा कर लेते हैं कि संपत्ति काफी हो तो कोई चोरी करने नहीं जाएगा।

- ओशो