भ्रष्टाचार के मसले पर और विचार करने की दरकार

इस वक्त दुनिया के दो बड़े देशों चीन और अमेरिका में बेरोजगारी, विकास, विदेश नीति, व्यक्तिगत छवि आदि बहस में बने हुए हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हो चुके हैं जिनमें बराक ओबामा को एक बार फिर जीत हासिल हुई है जबकि चीन सत्ता परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।  हमारे देश से उलट दोनों ही जगहों पर 'भ्रष्टाचार' कोई मुद्दा ही नहीं है। आप पूछेंगे कि ऐसा हो भी क्यों? आखिर क्या हमें यह नहीं बताया जा रहा है कि भ्रष्टाचार के पैमाने के लिहाज से भारत को विशिष्ट दर्जा प्राप्त है? कि भारत इस समय पहले की तुलना में कहीं अधिक भ्रष्ट है? जिस तरह का भ्रष्टाचार और जिस पैमाने पर हो रहा है वह बात हमें क्रोधित करती है और आखिर में भ्रष्टाचार दरअसल कुछ भटके हुए लोगों का मामला है, खासतौर पर वे लोग जो हमारे सत्ता प्रतिष्ठानों में उच्चतम स्तर पर विराजमान हैं?

दुर्भाग्यवश, इनमें से कोई भी बात सच नहीं है। इस मसले पर देश को गलत जानकारी दी जा रही है और भ्रष्टाचार को गलत ढंग से परिभाषित किया जा रहा है।

आइए कुछ मूलभूत बातों से शुरुआत करते हैं। राजनीतिक भ्रष्टाचार दरअसल क्या है? क्या इसका अर्थ प्रशासनिक और राजनीतिक ताकत की मदद से अपने लिए समृद्घि हासिल करना है? हां, गलत तरीके अपनाकर खुद को समृद्घ बनाना ऐसा ही काम है।  हमें यह समझना होगा कि सत्ता का इस तरह का इस्तेमाल गलत है। सीधे सीधे रिश्वत देना अवैध काम है। बिहार में चारा घोटाले में रिकॉड्र्स के साथ जिस तरह छेड़छाड़ की गई वह भी वैसा ही है लेकिन क्या आज हम वैसे ही भ्रष्टाचार के बारे में चर्चा कर रहे हैं? अगर हमारे कानून और नियम कायदे अतिरिक्त सांठगांठ की इजाजत देते हों तो फिर हमें अपनी राजनीतिक व्यवस्था में ऐसे संत कहां मिलेंगे जो इसका फायदा न उठाएं।

क्या अमेरिका भारत से कम भ्रष्टï है? वहां के ताकतवर सांसद अथवा नियामक पद मुक्त होते ही भारी भरकम शुल्क बटोर सकते हैं क्योंकि वे कंपनियों के लिए सलाहकार अथवा लॉबीइस्ट की तरह काम करना आरंभ कर देते हैं। ये वहीं कंपनियां होती हैं जो अभी हाल तक उनके कार्य क्षेत्र में आती थीं। इसी तरह सरकारी सौदों तथा अनुबंधों के लिए वैधानिक तरीके से एक दूसरे के हित में काम किया जाता है।

एक सामान्य सा उदाहरण लेते हैं। हमारे देश में स्पेक्ट्रम को लेकर बवाल मचा हुआ है। लेकिन अगर आप अमेरिका में अरबों डॉलर मूल्य के स्पेक्ट्रम के बंटवारे को लेकर खबरें तलाश करेंगे तो नाकाम रहेंगे।

अगर आप इससे सहमत नहीं हैं। तो एक दूसरी सामान्य सी तुलना लेते हैं: कोयला खनन लाइसेंस आवंटन को लेकर हमारे देश में आक्रोश व्याप्त है। अमेरिका में भूमि प्रबंधन ब्यूरो के पास ढेरों कोयला क्षेत्र हैं और वह खनन की लीज नीलामी के जरिये देता है। वहां ढेरों लीज राजनीतिक पहुंच वाले लोगों को दी गईं। अभी हाल की एक नीलामी में बोली हासिल करने वाले ने कोयले की स्थानीय हाजिर कीमत से महज 10 फीसदी ऊंची बोली लगाई और यह बोली चीन में कोयले की कीमत से एक फीसदी कम थी। लेकिन क्या यह अमेरिका में चुनावी मुद्दा बना? जी नहीं।

अगर आप अभी भी आश्वस्त नहीं हुए हैं तो एक और उदाहरण मेरे पास है। हम इस बात को लेकर चिंतित हैं कि नितिन गडकरी ने एक ऐसी कंपनी के साथ सौदे किए जिसने बाद में उन्हीं की कंपनी को वित्तीय मदद पहुंचाई। क्या आपने कभी कंट्रीवाइड पॉलिटिकल लोन स्कैंडल के बारे में सुना है? अमेरिका में अचल संपत्ति में आई उछाल के दौरान अमेरिकी सांसदों और सार्वजनिक क्षेत्र की आवास वित्त कंपनी के अधिकारियों को जमकर रियायती कर्ज दिया गया था। इससे संबंधित घोटाले में क्या किसी को दोषी बनाया गया? नहीं।

इनमें से प्रत्येक मामले में क्या आपको लगता है कि हमारी सार्वजनिक बहस अधिक परिपक्व है? अमेरिका में स्पेक्ट्रम बंटवारे को संपत्ति के अधिकार और उपभोक्ता मूल्य के आधार पर उचित ठहराया गया। उनके लिए यह भ्रष्टाचार को आमंत्रण नहीं था। भारत में अगर ऐसी बात की गई तो उसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि ठहरा दिया जाएगा। वहां कोयला खनन लीज राजनीतिक संपर्क वालों को दी गई और इसके लिए शीर्ष पर बैठे व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं माना गया। भारत में आप ऐसा सोच भी नहीं सकते। वहां किसी लाभ की प्रत्याशा में किए गए लेनदेन को समस्या माना जाता है लेकिन आप इसे तब तक खत्म नहीं कर सकते जब तक कि आप कंपनियों को लाभ पहुंचाने का पूरा अधिकार सरकारी कंपनियों से छीन नहीं लेते।

अमेरिका इस धरती के सबसे पारदर्शी व्यवस्था वाले देशों में से एक है और इस वजह से उसके मतदाता इन बातों की बेहतर समझ रखते हैं। लोगों को भ्रष्ट पुकारने के बजाय वे लॉबीइंग और राजनीतिक वित्त पोषण के असर पर ध्यान देते हैं और उसे कम से कम करने की कोशिश करते हैं। वे मानते हैं कि अंदरूनी लोगों के राजनीतिक लाभ को कम करने के लिए जरूरी है कि राजनीतिक व्यवस्था को बाहरी लोगों के लिए खोला जाए।

क्या मैं अमेरिका को लेकर ज्यादा सदाशयता बरत रहा हूं? आइए जरा एक क्षण के लिए चीन की व्यवस्था पर गौर करते हैं। जुलाई में ब्लूमबर्ग ने खबर दी कि चीन के भावी राष्ट्रपति झि जिंगपिंग के रिश्तेदारों ने अचल संपत्ति, दूरसंचार और खनन में काफी धन अर्जित किया है। अभी हाल ही में न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा कि चीन के पदमुक्त हो रहे प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के परिवार ने 2.1 अरब डॉलर की धन राशि जुटाई। ये सारी बातें कारोबारी पारदर्शिता संबंधी एक नये कानून के अस्तित्व में आने के कारण सामने आ सकीं। क्या आपको लगता है कि ये लोग अपने पूर्ववर्तियों के मुकाबले अधिक भ्रष्ट हैं? लेकिन फिर भी हम अपने राजनेताओं के बारे में ऐसे दावे आराम से करते हैं। हमें यह समझना होगा कि ऐसे लाभ सुधार रहित राजनीतिक और नियामक वातावरण में अधिक उभरकर सामने आते हैं। जरूरी नहीं है कि ऐसा बढ़ती राजनीतिक कमजोरी अथवा लालच की वजह से ही हो।

ऐसा तब तक नहीं होगा जब तक कि हम यह नहीं समझ लेते हैं कि हम एक राष्ट्रीय मनोविकृति के शिकार हैं। एक ऐसी समस्या जिसे समाजशास्त्री स्टैनली कोहेन ने 'मॉरल पैनिक' का नाम दिया था। ऐसी परिस्थितियों में इन मुद्दों की केंद्रीय समस्या के बारे में बात करना अनैतिक प्रतीत हो सकता है।

महान, अच्छे और बुद्घिमान लोग हमें बताते हैं कि देश में भ्रष्टाचार की समस्या है। दरअसल उनका कहने का तात्पर्य यह है कि देश में असमानता, सुधार और पारदर्शिता की समस्या है। यह बात भ्रामक है, गलत है। दरअसल यह बात केवल गलत ही नहीं बल्कि खतरनाक है। इससे यह संदेश जाता है कि देश के लोग ही भ्रष्ट हैं, वे संस्थान नहीं जिनका निर्माण ही गलत तरीके से हुआ है। जबकि जरूरत इस बात की है कि व्यवस्था की खामियों को उजागर किया जाए न कि व्यक्ति विशेष की।

--  मिहिर शर्मा
(हिंदी बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार)