क्या यह महामारी आखिरी साबित होगी

अब जबकि कोविड-19 महामारी अपना आधा जीवन पार कर चुकी है, तब यह तर्क बेतुका लग सकता है कि यह अपनी तरह की संभवत: अंतिम महामारी साबित होगी। जब हम इससे निजात पा लेंगे- और ऐसा जरूर होगा- तब मुमकिन है कि हमारी दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर जाए, जिसमें वैश्विक महामारी और बड़े पैमाने पर होने वाली बीमारी अतीत की बात मानी जाए।

इस महामारी की चीन से आई शुरुआती खबरों के एकाध हफ्तों बाद ही मैंने जोर देकर कहा था कि ‘अगले 15 वर्षों के भीतर दुनिया कई वायरसों के खिलाफ ‘ऑन-डिमांड' टीके और उपचार करने में सक्षम होगी, यानी वायरस के सक्रिय होते ही उसका इलाज संभव हो जाएगा। दरअसल, वायरल जीनोम के जल्द से जल्द विश्लेषण की क्षमता हमारे पास पहले से मौजूद है। दिनोंदिन यह क्षमता व्यापक होती जाएगी, जो खोज और किसी विशेष प्रजाति, जींस आदि को पहचानने में कारगर साबित होगी। कंप्यूटिंग पावर यानी कंप्यूटर तकनीक और जैव सूचना विज्ञान के विकसित होने से एंटी-वायरस अणुओं को एक साथ रखना संभव हो सकेगा, जो टीके बनाने और संक्रमण के इलाज में मददगार साबित होंगे। बेशक वायरस भी अपना चरित्र बदलेंगे, और चूहे-बिल्ली का यह खेल चलता रहेगा, लेकिन जीत आखिरकार मानवता की ही होगी।'

इस तरह के आशावाद के तीन बड़े कारण हैं। कंप्यूटर प्रौद्योगिकी और सिंथेटिक बायोलॉजी या कृत्रिम जीव-विज्ञान (जैविक अंग, उपकरण और तंत्र के नव-निर्माण या प्रकृति में मौजूद तंत्र के पुनर्निर्माण में प्रयत्नशील विज्ञान) में जिस तरह का विकास हुआ है, उसने रोगजनकों का पता लगाने और उनके इलाज, दोनों में क्रांति ला दी है। दूसरा, टीका आदि बनाने की प्रक्रिया गार्डन मूर (इंटेल के सह-संस्थापक) के नियम के मुताबिक, समय के साथ लगातार सस्ती और बेहतर होती जाएगी। हाल की तमाम महामारियां, जिनमें सार्स से लेकर एच1एन1, इबोला, जीका और अब कोविड-19 को गिना जा सकता है, जैविक और महामारी विज्ञान की तरफ प्रतिभाओं की अधिक से अधिक उत्सुकता बढ़ाएंगी। और तीसरा, मौजूदा कोविड-19 महामारी के खिलाफ जंग में राष्ट्रों की सरकारें, अंतरराष्ट्रीय संगठन और जनहितकारी संस्थान सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश को प्राथमिकता देंगे। इन्हीं तमाम प्रवृत्तियों का संयुक्त नतीजा एक ऐसी दुनिया के निर्माण के रूप में सामने आएगा, जिसमें संक्रामक रोग, और खासतौर से वायरल महामारी को एक भूगोल, दायरा और प्रभाव में समेट लेना मुमकिन हो जाएगा।

वायरस बेशक जानलेवा हो सकते हैं, मगर यह बहुत सामान्य बात है। वे कुछ प्रोटीन और आरएनए या डीएनए जैसे आनुवंशिक तत्वों की बहुत थोड़ी मात्रा से बने होते हैं। उनका पूरी तरह से विश्लेषण आसानी से किया जा सकता है। 2003 में सार्स वायरस जीनोम के 29,727 न्यूक्लियोटाइड्स (आरएनए और डीएनए के बुनियादी तत्व) को पूरी तरह से बेपरदा करने में वैज्ञानिकों को कुछ महीने लगे थे, जबकि कोविड-19 यानी सार्स-कोव-2 कोरोना वायरस (इसके जीनोम का आकार सार्स वायरस के बराबर ही है) के विश्लेषण में चीन के वैज्ञानिकों को महज एक महीने का समय लगा। ऐसा इसलिए हो सका, क्योंकि वायरस के विश्लेषण की तकनीक कंप्यूटर प्रौद्योगिकी की वजह से बेहतर होती गई है। आज की तकनीक तो दो दशक पहले की तुलना में कहीं ज्यादा एडवांस हो चुकी है। इसी कारण आज कोरोना वायरस के मरीजों की जांच चंद घंटों में हो जाती है और इसकी कीमत भी 5,000 रुपये के आसपास आती है।

जहां तक टीका बनाने और इलाज की बात है, तो इस मोर्चे पर भी स्थिति बेहतर हुई है। जैव सूचना और कृत्रिम जीव-विज्ञान के समन्वय से पूरी तस्वीर बदल गई है। सार्स-कोव-2 कोरोना वायरस के जीनोम के प्रकाशित होने के सिर्फ 42 दिनों में बायोटेक कंपनी मॉडर्न थेरेप्यूटिक्स ने क्लिनिकल परीक्षण के लिए अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी ऐंड इंफेक्शियस डिजीज (एनआईएआईडी) को टीके भेज दिए, जो अप्रैल में शुरू होना प्रस्तावित है। इस टीके को बनाने में कंपनी को महज एक सप्ताह का समय लगा। ऐसे में, यह भरोसा जगता है कि बाजार में इस नए वायरस का टीका जल्द से जल्द उपलब्ध होने लगेगा, क्योंकि क्लिनिकल परीक्षण भी अब कहीं अधिक तीव्र और सुरक्षित बन चुका है।

सस्ती और दक्ष कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के अलावा, नए सॉफ्टेवयर (जिसमें मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता भी शामिल हैं) ने भी टीके बनाने और दवाई की खोज का पूरा गणित बदल दिया है। बेशक, ये शुरुआती दिन हैं और हमारे पास कई मामूली वायरस के भी टीके नहीं हैं, लेकिन तकनीकी विकास ने वायरस-विज्ञानी और वैक्सीनोलॉजी विशेषज्ञों को खुश होने का मौका तो दिया ही है।

इसीलिए इस क्षेत्र में करियर बनाया जा सकता है, पुरस्कार जीते जा सकते हैं और पैसे भी कमाए जा सकते हैं। ये सभी कारण वायरोलॉजी, महामारी विज्ञान, जैव सूचना विज्ञान और सार्वजनिक स्वास्थ्य की तरफ अधिकाधिक प्रतिभा को आकर्षित करेंगे। आप देखिएगा कि किस तरह आने वाले महीनों में दुनिया भर में हर जगह अनुसंधान प्रयोगशालाएं संक्रामक रोग, खासतौर से वायरल महामारी की तरफ ध्यान देना शुरू करती हैं। इस क्षेत्र में सार्वजनिक, निजी और संयुक्त फंड जारी किए जाएंगे, क्योंकि सरकारें, बहुपक्षीय संगठन और जनहितकारी संस्थान महामारी की रोकथाम के लिए अपेक्षाकृत अधिक संसाधन आवंटित करते हैं।

और अंत में, दुनिया कोविड-19 महामारी के खिलाफ तमाम देशों की जंग में मिलने वाली सफलता और विफलता से सबक लेगी। हम सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अधिकाधिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग, नियम और प्रक्रियाओं की उम्मीद पाल सकते हैं, जैसा कि 9/11 हमले के बाद हमने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में देखी थी। जिस संजीदगी के साथ आज सरकारें आतंकी खतरों के मुकाबिल हैं, वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले से पहले ऐसी गंभीरता कहां दिखी थी! कोविड-19 के मामले में भी यही होगा। वैश्विक महामारी के खिलाफ दुनिया अपना रवैया बदलेगी।

वायरस, बैक्टीरिया और अन्य रोगजनक निश्चय ही मानव जाति के बढ़ते कदम को थामने के लिए उभरते रहेंगे। वे सफल भी होंगे, क्योंकि यही प्रकृति का नियम है, पर मानव-बुद्धि उस सफलता को छोटी हदों में समेट देगी, जहां उन पर नियंत्रण पाना कहीं ज्यादा आसान होगा।

- नितिन पाई (लेखक तक्षशिला इंस्टिट्यूट के निदेशक हैं)
साभारः हिंदुस्तान https://bit.ly/2IYLoOd