कोपेनहेगन कवायद के मायने

बारह दिनों तक जलवायु परिवर्तन पर चले कोपनेहेगन सम्मेलन में अंतिम दिन अमेरिका ने चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ एक समझौते को दिया अंजाम. अमेरिका समझौते को भविष्य के लिए अहम कदम मान रहा जबकि कई देश कर रहे आलोचना.

जलवायु परिवर्तन पर बारह दिनों तक चले कोपेनहेगन सम्मेलन के बारे में कहा जा रहा है कि किसी बड़े समझौते को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन सकी। अलग-अलग पृष्ठभूमि के देश और उनकी अलग-अलग उम्मीदें, लेकिन हितों को साधने में कामयाबी या नाकामयाबी के आधार पर समापन के बाद सम्मेलन पर स्वाभाविक रूप से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं।

सम्मेलन के अंतिम दिन अमेरिकी नेतृत्व में जलवायु परिवर्तन पर एक समझौता हुआ, जिस पर अमेरिका समेत ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन (बेसिक) ने अपनी रजामंदी जताई । समझौते के प्रमुख बिंदुओं पर नजर डालें तो पता चलता है कि कोई भी बात किसी भी रूप में बाध्यकारी नहीं है। हालांकि अमेरिकी प्रयासों और भारत सहित चार उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच हुए समझौते को अधिकतर गरीब देशों ने एकपक्षीय कहकर खारिज कर दिया है। उल्लेखनीय यह है कि समझौता विकसित देशों के लिए उत्सर्जन कटौती का कोई बाध्यकारी मानक तय नहीं करता। कहा जा रहा है कि अमेरिका और बेसिक के बीच हुआ समझौता साफ तौर पर विकसित देशों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के तहत कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन कटौती करने की जरूरत है। क्योटो प्रोटोकॉल 2012 में खत्म होने जा रहा है और संयुक्त राष्ट्र के 194 देशों की कान्फ्रेंस ऑफ पार्टीज प्रोटोकॉल के विस्तार पर कुछ करने में असफल रही है।

समझौते के महत्वपूर्ण बिंदु

  1. समझौते पर सहमति जताने वाले देश पृथ्वी के तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक न होने देने की दिशा में एकजुटता के साथ काम करेंगे।
  2. इस समझौते में शामिल देश अपने-अपने देशों में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का हिसाब रखेंगे और हर दो साल में इस बारे में रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र को सौंपेंगे। इसमें संबंधित देश की राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान किया जाएगा।
  3. जंगलों को बचाने और उनकी स्थिति में सुधारने के लिए हर संभव उपाय किए जाएंगे।
  4. इसमें कहा गया है कि वर्ष 2020 तक विकसित देश इस काम के लिए 100 अरब डॉलर के दीर्घकालिक कोष के लिए धन जुटाने की दिशा में मिलकर काम करेंगे। ये धन कई स्रोतों से आएगा। इस धन के उपयोग के लिए जो व्यवस्था बनेगी उसमें विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों को बराबर की भागीदारी मिलेगी।
  5. जो देश पहले ही कम ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जित कर रहे हैं उन्हें आर्थिक प्रोत्साहन मिलेगा जिससे वे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन घटाएं।

अन्य देशों का नजरिया

तुवालू, बोलीविया, कोस्टारिका, वेनेजुएला और क्यूबा सरीखे कई देशों के प्रतिनिधियों ने अमेरिका-बेसिक समझौते की जमकर आलोचना की। सूडान के प्रतिनिधि ने समझौते की तुलना 'होलोकास्ट' से कर डाली। उन्होंने कहा कि यह एक ऐसा समझौता है जिससे कि कुछ देशों का आर्थिक आधिपत्य कायम रखा जा सके। जबकि निकारागुआ और वेनेजुएला सरीखे कई दक्षिण अमेरिकी देशों का कहना है कि बिना किसी उचित प्रक्रिया के यह समझौता हुआ है।

सम्मेलन में शामिल हुए देश मानते हैं कि बेशक अंतिम समय में एक राजनीतिक समझौते को अंजाम दे दिया गया हो लेकिन कोपेनहेगन सम्मेलन को मौजूदा हालात में असफल ही कहा जा सकता है। सभी देशों में किसी भी बात को लेकर सहमति नहीं बन सकी। पूरे सम्मेलन के दौरान चर्चाओं के दौर ही चलते रहे और अंत में अमेरिका ने अपना वर्चस्व दिखाते हुए नाम के लिए एक समझौते को अंजाम दिया।

सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन को दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने पर प्रतिबद्धता तो जता दी गई, कार्बन उत्सर्जन को वर्ष 2020 या 2050 तक कम करने पर कोई बात नहीं बन सकी। जलवायु परिवर्तन की तपिश से जल रहे गरीब देशों को 100 अरब डॉलर देने की बात तो कही गई है लेकिन इन देशों को धन मुहैया कराने को लेकर कोई ठोस योजना तय नहीं हुई।

किसने क्या कहा

“हम सब जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन से जो सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, वे उसके लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। हमारी बातचीत का नतीजा चाहे जो भी हो लेकिन अफ्रीका सरीखे देशों के साथ हुए अन्याय को जरूर गंभीरता से देखना होगा।”

- मनमोहन सिंह, भारत के प्रधानमंत्री

“हम भारत और उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले अन्य देशों के साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने के जिस समझौते पर पहुंचे हैं, वह एक सफलता है। यह आगामी वर्षों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले प्रयासों की नींव रखती है।”

- बराक ओबामा, अमेरिका के राष्ट्रपति

“हम वास्तविक कार्रवाई करके अपने शब्दों पर अमल करके दिखाएंगे।”

- वेन जियाबाओ, चीन के प्रधानमंत्री

“अगर हम किसी बड़े समझौते पर नहीं पहुंचते हैं तो विश्व नेता के तौर पर हम अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहेंगे।”

- हातोयामा, जापान के प्रधानमंत्री

“जलवायु परिवर्तन वार्ता संबंधी प्रक्रिया को असफल बनाने की दिशा में कुछ तेल संपन्न देश विध्वंसक का काम कर रहे हैं। यह स्वीकार्य नहीं है।”

- एरिश सोल्हेम, नॉर्वे के पर्यावरण मंत्री

"संभवतः हम जो चाहते हों, वह हमें नहीं मिला हो लेकिन इस समझौते को एक शुरुआत तो माना ही जो सकता है।"

- बान की मून, संयुक्त राष्ट्र महासचिव