क्यों अहम है कोपेनहेगन सम्मेलन

हिमालय की बर्फ का पिघलना, समुद्र के जलस्तर का बढ़ना और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग की भयावहता की ओर ही इशारा करते हैं। यही नहीं, बाढ, सूखे, बीमारी, कुपोषण और अकाल सरीखे खतरे भी हमारे सिर पर मंडरा रहे है. www.azadi.me की ओर से पेश है कोपेनहेगन के बहाने जलवायु परिवर्तन को लेकर कुछ बुनियादी तथ्यों और विचारों का संकलन-

जलवायु परिवर्तन पर शिखर सम्मेलन

कोपेनहेगन में होने वाला सम्मेलन एक महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि इसके निष्कर्षों पर 2012 में समाप्त होने वाले क्योटो प्रोटोकॉल का स्थान लेने वाले नए समझौते का भविष्य निर्भर करता है। नया समझौता हर हाल में 2010 के अंत तक तैयार हो जाना चाहए ताकि पहली जनवरी, 2013 से लागू होने वाले समझौते पर सभी राष्ट्रों द्वारा पुष्टि के लिए दो वर्ष का समय छोड़ा जा सके।

क्या है समस्या

मुख्य समस्या विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु परिवर्तन के मामले पर एक-दूसरे के साथ विचार न मिलने और मौजूदा संदर्भ में हितों के टकराव की है। जहां एक ओर विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन पर रोक लगाएं, वहीं दूसरी ओर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं या विकासशील देश विकसित देशों से चाहते हैं कि वे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अधिक कटौतियां स्वीकार करने के अलावा अनुकूलन और उपशमन कार्यक्रमों के लिए वित्तीय सहायता के साथ-साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी करें। विकसित देश अभी तक इन दोनों मुद्दों पर विफल रहे हैं।

भारत की बात

अगर भारत की बाद करें तो वह पहले ही यह साफ कर चुका है कि वह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लेकर किसी भी तरह के सशर्त प्रतिबंध को स्वीकार नहीं कर सकता। महत्वपूर्ण बात यह कि भारत ने जलवायु में हो रहे परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना  30 जून, 2008 में ही जारी कर दी थी।

कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश

भारत का प्रति व्यक्ति ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 1.1 टन प्रति वर्ष है जबकि अमेरिका में 20 टन और यूरोपीय संघ में 10 टन है। चीन और अमेरिका विश्व के ग्रीन हाउस गैस का 20 फीसदी उत्सर्जन करते हैं और तीसरे नम्बर पर यूरोपीय संघ 14 फीसदी उत्सर्जन करता है, जबकि भारत और रूस पांच-पांच फीसदी ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन करते हैं। अगर संयुक्त राष्ट्र जलवायु पैनल की राय पर नजर डालें तो पता चलता है कि ग्लोबल वार्मिंग पर लगाम कसने के लिए उत्सर्जन का जो स्तर 1990 में थे उनमें 2020 तक 25 से 40 फीसदी कटौती करने की जरुरत है।

मौसम के बदलते तेवर

संयुक्त राष्ट्र के सहयोग से काम करने वाले विभिन्न देशों के विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों के पैनल आईपीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 1997 में क्योटो में एक बड़ा सम्मेलन किया था। जिसमें तय किया गया था कि अलग-अलग चरणों में विकसित, विकासशील और पिछड़े देश तापमान बढ़ाने में अहम भूमिका निभाने वाली गैसों का ऊत्सर्जन कम करेंगे। क्योटो प्रोटोकॉल का पहला चरण वर्ष 2012 में ख़त्म होने जा रहा है लेकिन अब भी इन गैसों का उत्सर्जन बदस्तूर जारी है।

जिम्मेदार ग्रीनहाउस गैसें

ग्लोबल वार्मिंग के लिए मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों को जिम्मेदार माना जाता है। इन गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और सल्फ़र हेक्साफ्लोराइड और तथा दो गैस-समूह हाइड्रोफ्लोरोकार्बन और परफ्लोरोकार्बन भी शामिल हैं।

जलवायु पर मुख्य सम्मेलन

अगर मुख्य सम्मेलनों की बात करें तो पहला सम्मेलन रियो सम्मेलन (1992-ब्राजील) के नाम से जाना जाता है जबकि दूसरे को क्योटो सम्मेलन (1997-जापान) और तीसरे का बाली सम्मेलन (2007-इंडोनेशिया) के नाम से जाना जाता है।

ब्राज़ील में में हुए रियो सम्मेलन में पर्यावरण को बचाने के लिए एक संधि पर सहमति बनी जिसे 'युनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कंवेशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) कहा गया। रियो सम्मेलन में इस बात पर सहमति बनी थी कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों की मात्रा को इतना कम कर दिया जाए कि जलवायु में हो रहे परिवर्तन मानव की पहुंच से दूर न हो सके। अगर क्योटो की बात की जाए तो 1997 में हुई इस संधि में कहा गया था कि औद्योगीकृत देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से लगभग पाँच फीसदी कम करेंगे। क्योटो संधि बाध्यकारी नहीं थी और अमेरिका ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे।

जलवायु में हो रहे परिवर्तनों के कारण हर साल लगभग 17 करोड़ 5 लाख बच्चे हर साल जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का शिकार होंगे। जलवायु परवर्तन के प्रभाव इतने भयंकर हैं कि इससे किसी भी देश के बच पाने की संभावना न के बराबर है। भारत में हर साल 20 लाख बच्चों की मौत डायरिया, मलेरिया और न्यूमोनिया सरीखे इलाज करने योग्य रोगों से हा जाती हैं। इसका कारण जलवायु में परिवर्तन के कारण दूषित पेयजल, पोषक भोजन पैदा करने में असमर्थता और महंगाई के कारण खाद्यान्न लोगों की पहुंच से बाहर हो जाएंगे। यह कहना है, सेव दि चिल्ड्रन नाम के एनजीओ की ताजा रिपोर्ट का। जिन्होंने इन तथ्यों का खुलासा अपनी रिपोर्ट फीलिंग दि हीटः चाइल्ड सरवाइवल इन ए चेंजिंग क्लाइमेट नाम की रिपोर्ट में किया है। कोपेनहेगन सम्मेलन के मौके पर इस रिपोर्ट का आना और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर जलवायु परिवर्तन पर आईपीसीसी की रिपोर्ट को देखें तो वह भी चेताती है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे घातक असर विश्व के गरीब देशों पर ही पड़ेगा।