कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग क्या है? जाने खुद एक किसान से

कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग क्या है? खुद खेती करने वाले किसान ने बताई इसकी चुनौतियां, फायदे और नुकसान
गुणवंत समझाते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है। हम पहले से भी अपनी जमीन दूसरे को किराए पर देते रहे हैं। पहले मुंहजबानी काम होते आ रहे थे। अब कानून के तहत पूरी लिखा-पढ़ी के साथ होगी।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग से जुड़े जरूरी सवालों के जवाब

भारत में किसानों की एक बड़ी आबादी पारंपरिक तरीके से खेती करती है। देश के अधिकतर किसान मौसम के भरोसे खेती करते हैं। कभी सूखा पड़ जाए या कभी असमय ज्यादा बारिश हो जाए तो फसल बर्बाद हो जाती है। फसल ठीक तैयार हो गई, तो उसके भंडारण और विक्रय की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में तमाम योजनाओं के बावजूद किसानों की आर्थिक स्थिति नहीं सुधर पा रही है। पिछले दिनों सरकार ने नए कृषि कानून बनाए हैं, जिनमें से एक कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (Contract Farming) यानी अनुबंध खेती से जुड़ा है। यह शब्द भले ही कुछ साल पुराना हो, लेकिन देखा जाए तो परंपरागत तौर पर लोग इससे जुड़े रहे हैं।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग क्या है, इसकी प्रक्रिया क्या है, इसके फायदे या घाटे क्या हैं, इसकी चुनौतियां क्या है….वगैरह-वगैरह। लोगों के मन ऐसे तमाम तरह के सवाल चलते रहते हैं। करीब 30 सालों से किसान संगठनों से जुड़े गुणवंत पाटिल हंगरगेकर ने विशेष बातचीत में ऐसे सवालों को लेकर विस्तार से बातचीत की। गुणवंत महाराष्ट्र में शेतकारी संगठन के अध्यक्ष रह चुके हैं और वर्तमान में ऑल इंडिया किसान कोऑर्डिनेशन कमिटी के राष्ट्रीय महासचिव हैं।

सबसे पहले समझते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग है क्या?

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का मतलब है, अनुबंध पर खेती। गुणवंत बताते हैं कि यह दो तरीके से हो सकती है। पहला ये कि खेती योग्य अपनी बहुत सारी जमीन यानी खेत को किसी अन्य व्यक्ति, फर्म या कंपनी को सौंप देना और उसके बदले में खेत का किराया लेना। दूसरे तरीके में जमीन भी किसान की और खेती भी वही करे, लेकिन अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरे व्यक्ति, फर्म या कंपनी के लिए। अनुबंध के मुताबिक, किसान द्वारा उपजाई गई विशेष फसल को कॉन्ट्रैक्टर तय कीमत में खरीदता है।

खेती में खाद, बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी आदि सारे खर्च कॉन्ट्रैक्टर के होते हैं। कॉन्ट्रैक्टर ही किसान को फसल के लिए खेती के तरीके बताता है। फसल की क्वालिटी, मात्रा और उसकी डिलीवरी का समय खेती से पहले ही तय हो जाता है।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग बिल्कुल नई बात नहीं है

गुणवंत समझाते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की यह प्रक्रिया कोई नई नहीं है। हम पहले से भी अपनी जमीन दूसरे को किराए पर देते रहे हैं। पहले मुंहजबानी काम होते आ रहे थे। जैसे आपने अपनी जमीन किसी किसान को खेती के लिए दे दी। बदले में या तो आधी फसल ले ली या फिर पैसे ले लिए। कई इलाकों में इसे बटाईदारी या बटेदारी कही जाती है। अब नए कृषि कानून के तहत यही डील बड़े स्तर पर होगी और कानून के तहत पूरी लिखा-पढ़ी के साथ होगी। पहले की स्थिति में बटाईदार की नीयत खराब होने पर खेत मालिक को घाटा होने की संभावना रहती थी, लेकिन अब सब कुछ कॉन्ट्रैक्ट में पहले से दर्ज होगा।

किसान क्या कर सकते हैं? क्या प्रक्रिया है?

गुणवंत किसानों के संगठित होने पर बल देते हुए बताते हैं कि किसानों का एकजुट होना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोई भी कंपनी दो-चार एकड़ खेत तो कॉन्ट्रैक्ट पर लेगी नहीं। 50-100-200 एकड़ के लिए जरूरी है कि आसपास के सारे किसान अपने खेतों को जोड़ें और एक बड़ा प्लॉट तैयार करें। इसके बाद या तो वे कोऑपरेटिव यानी सहकारी समिति बना सकते हैं या फिर कंपनी के तौर पर रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं। दोनों ही तरीके में वे किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट (CA) की मदद ले सकते हैं। किसी सहकारी समिति या फिर किसी कंपनी के रूप में खुद को रजिस्टर्ड करा सकते हैं। कंपनी के रूप में पंजीकरण कराना ज्यादा श्रेयस्कर रहता है।

अगर अपनी जमीन किराए पर देनी हो तो क्या प्रक्रिया है?

गुणवंत बताते हैं कि एक पक्ष किसान हो गए और दूसरा पक्ष खेत लेने को इच्छुक कोई व्यक्ति, फर्म या कंपनी। किसान पहले से जमीन के बारे में, उपज के बारे में, सिंचाई वगैरह के बारे में बताएंगे। फिर दोनों किसी जानकार वकील की मदद से कॉन्ट्रैक्ट तैयार करवाएंगे। तमाम शर्तों, किराये वगैरह की जानकारी के साथ दोनों अपने दस्तखत करेंगे और रजिस्ट्रार या संबंधित कार्यालय में निबंधन कराएंगे। किसान को उसकी जमीन का पूरा किराया मिलेगा और कॉन्ट्रैक्टर को खेत की पूरी फसल।

अगर किसान कंपनी के मुताबिक फसल खुद ही उपजाएं तो?

इसमें भी पहले तरीके की ही तरह कॉन्ट्रैक्ट बनाए जाएंगे। किसानों की ही जमीन होगी, वही खेती करेंगे, लेकिन इसमें कंपनी की जरुरत के मुताबिक फसल उपजानी होगी। जैसे, कुरकुरे की कंपनी को मक्के की फसल चाहिए होगी। रिफाइन की कोई कंपनी किसान से सोयाबीन, सूरजमुखी की फसल चाहेगी। किसानों के खेत, जलवायु, फसल, उपज की मात्रा के मुताबिक कंपनियां करार करेंगी। कंपनी को जो फसल चाहिए होगी, उसकी जो गुणवत्ता चाहिए होगी, उस अनुसार उत्पादन करना होगा। करार के मुताबिक, फसल पर किसानों का अधिकार किसानों को राशि का भुगतान किया जाएगा।

क्या किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का फायदा होगा?

गुणवंत पाटिल कहते हैं कि इसके दूरगामी फायदे होंगे। किसानों के पास परंपरागत खेती से अलग विकल्प मौजूद होगा। उन्होंने बताया कि पंजाब के किसान इसके तहत तमिलनाडु में खेती कर रहे हैं। दक्षिण भारत समेत उत्तर भारत के राज्यों में भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही है। वे कहते हैं कि इसके जरिए खेती अधिक संगठित होगी। बाजार खुद चलकर किसानों तक पहुंचेंगे। फसलों की क्वालिटी सुधरेगी। लेकिन इसकी चुनौतियां भी है।

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की चुनौतियां क्या है?

गुणवंत बताते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, किसान और कॉन्ट्रैक्टर, दोनों के लिए फायदेमंद है, लेकिन इसके लिए ईमानदारी पहली जरूरी चीज है। दोनों पक्षों के बीच होने वाले करार का पंजीकरण होना चाहिए। किसान/किसानों और फर्म/कंपनी के बीच कॉन्ट्रैक्ट या करार पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए। कोई भी छिपा हुआ नियम, बात या छिपी हुई शर्त नहीं होनी चाहिए। सामान्य किसानों के लिए इसे समझना मुश्किल है, इसलिए इस बारे में जागरूकता की जरूरत है। बहुत सारे किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिये सफल कृषि उद्यमी बन कर लाखों की कमाई कर रहे हैं। उन्हें फॉलो किया जा सकता है।

- निलेश कुमार (TV9 भारतवर्ष)