पूंजीवाद की नैतिकताः प्रतिस्पर्धा एवं सहकारिता

बाजार की प्रक्रिया के समर्थिक प्रायः प्रतिस्पर्धा के लाभों पर जोर देते हैं। प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया लोगों को सतत परीक्षण, अविष्कार व परिवर्तनशील परिस्थितियों की प्रतिक्रिया में उसके साथ सामंजस्य स्थापित करने की अनुमति प्रदान करते हैं। यह अपने उपभोक्ताओं की सेवा के लिए व्यवसायों को लगातार मुस्तैद खड़े रखने के लिए मजबूर करता है। यह आसानी से देखा जा सकता है कि प्रतिस्पर्धी प्रणाली, केंद्रीयकृत व्यवस्था अथवा एकाधिकार युक्त प्रणाली की तुलना में विश्लेषणात्मक और अनुभवजन्य दोनों ही प्रकार से, अधिक बेहतर परिणाम प्रदान करती है। यही कारण है कि मुक्त बाजार प्रणाली की वकालत करने वाले पुस्तकों के माध्यम से, अखबारों में लेखों की सहायता से अथवा टेलीविजन पर परिचर्चा में सदैव बाजार में प्रतिस्पर्धा के महत्व पर जोर डालते हैं और प्रतिस्पर्धा पर रोक लगाने वाले नियमों का विरोध करते हैं।

लेकिन बड़ी तादात में लोग प्रतिस्पर्धा के बारे में सुनते तो हैं लेकिन इसका तात्पर्य शत्रुतापूर्ण, गलाकाट प्रतिस्पर्धा अथवा किसी प्रकार एक दूसरे को हानि पहुंचाते हुए आगे निकलने से लगाते हैं। उन्हें आश्चर्य होता है कि क्या विश्व की भलाई के लिए सहकारिता, प्रतिद्वंदिता पूर्ण रवैये से ज्यादा बेहतर नहीं होगा? उदाहरण के लिए करोड़पति निवेशक जॉर्ज सोरोस मासिक पत्रिका एटलांटिक मंथली में लिखते हैं कि ‘अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और एकदम थोड़ी सहकारिता असहनीय असमानता और अस्थिरता का कारण बन सकती है’ आगे वह लिखते हैं कि ‘मुख्य बिंदू.. यह है कि सहकारिता भी व्यवस्था का उतना ही प्रमुख हिस्सा है जितना कि प्रतिस्पर्धा, और सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट का नारा इस तथ्य को विकृत करता है।’

अब यह ध्यान देने वाली बात है कि मुक्त बाजार अथवा स्वतंत्रता की वकालत करने वालों द्वारा विरले ही ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ कहावत का प्रयोग किया जाता है। इस कहावत का सृजन जैविक विकास की व्याख्या करने के उद्देश्य से हुआ था जो कि वातावरण के साथ अनुकूलता की खासियत को प्रदर्शित करने के लिए ज्यादा मुनासिब है। यह बाजार में उद्यमों के मध्य प्रतिस्पर्धा पर भी भले लागू हो जाए लेकिन इसकी मंशा पूंजीवादी व्यवस्था में केवल सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों की उपस्थिति के बाबत लागू करने की कभी नहीं रही है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा की व्याख्या करने के लिए सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट शब्द का प्रयोग करने वाले बाजार के मित्र नहीं दुश्मन हैं।

यह बात स्पष्ट कर देने की आवश्यकता है कि ‘मनुष्य, सहयोग के लिए पैदा हुआ है ना कि प्रतिस्पर्धा के लिए’ जैसे बात कहने वाले इस बात को समझने में असफल रहे हैं कि बाजार सहयोग ही है। वास्तव में, ये वो लोग हैं जो सहयोग करने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।

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- डेविड बोयाज़
लेखक ‘लिबरटेरियनिज्मः ए प्राइमर’ के लेखक और और ‘द लिबरटेरियन रीडरः क्लासिक एंड कंटेम्पोरेरी राइटिंग्स फ्रॉम लाओ त्जू टू मिल्टन फ्रीडमैन‘ के संपादक हैं।
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