साम्यवाद का बिगड़ैल पुत्र है नक्सलवाद

दुनिया की कोई भी विचारधारा हो, यदि वह समग्र चिंतन पर आधारित है और उसमें मनुष्य व जीव-जंतुओं सहित सभी प्राणियों का कल्याण निहित है; तो उसको गलत कैसे ठहराया जा सकता है। इस पृथ्वी पर साम्यवाद एक ऐसी विचारधारा है जिसके संदर्भ में गभीर चिंतन-मंथन करने से ऐसा प्रतीत होता है कि इसके प्रेरणा पुरुषों ने यह नया वैचारिक रास्ता खोजते समय समग्र चिंतन नहीं किया। मात्र कुछ समस्याओं के आधार पर और वह भी पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर, इस रास्ते को खोजा। यही कारण है कि साम्यवाद एक कृत्रिम विचारधारा के सदृश प्रतीत होती है। यदि दुनिया में इस विचारधारा का प्रभाव और उसके अनुयायियों की संख्या तेजी से घट रही है तो फिर अनुचित क्या है ?

सृष्टि के प्रारम्भ से आज तक; कोई भी विचारधारा रही हो, उसका सदा-सर्वदा से यही कार्य रहा है कि वह समाजधारा को अपने अनुकूल करे। लेकिन यह कार्य बड़ा कठिन है या यूं कहें कि यह तपस्या के सदृश है। इस कठिन तपस्या के डर से लोग शार्ट-कट अपनाते हैं। समाज के लोगों को शीघ्र जुड़ता न देख साम्यवाद का झंडा लेकर चलने वाले अधीर कार्यकर्ताओं ने एक नए विकल्प की तलाश की। इन्हीं शार्ट-कट की परिस्थितियों में नक्सलवाद का जन्म हुआ। साम्यवाद ही नक्सलवाद की बुनियाद है।

मनुष्य के जीवन में कभी-कभी ऐसी स्थितियां आती हैं कि पुत्र जब ज्यादा बिगड़ जाता है तो पिता लोक-लाज के भय से उसको अपना मानने से ही इन्कार कर देता है। ठीक वैसी ही स्थिति साम्यवाद और नक्सलवाद के साथ है। साम्यवाद का बिगड़ैल पुत्र है नक्सलवाद! साम्यवाद के कर्ता-धर्ता भले ही इससे इन्कार करें, लेकिन सत्य भी यही है। नक्सलवाद की नींव में साम्यवादी ईंट का जमकर प्रयोग हुआ है।

आज नक्सलवाद देश के लिए विध्वंसक साबित हो रहा है। इन कथित क्रांतिकारियों की गतिविधियों से देश की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। सुरक्षाबल और पुलिस के सैंकड़ों जवानों सहित अनगिनत निर्दोष लोग; इस कथित आंदोलन के शिकार हुए हैं। इन्हीं खूनी नक्सलियों का समर्थन करने वाले व उनकी गतिविधियों में सहायक की भूमिका निभाने के आरोप में डॉ. विनायक सेन को छत्तीसगढ़ की एक अदालत ने देशद्रोही करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा चलाए गए सलवा जुडूम नामक अभियान के खिलाफ डॉ. सेन काफी मुखर रहे हैं। यह अभियान नक्सलियों के सफाए के लिए चलाया गया था। उन्होंने इस अभियान के खिलाफ धरती-आसमान एक कर दिया था। डॉ. सेन पेशे से चिकित्सक एवं ‘पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबरटीज’ की छत्तीसगढ़ इकाई के महासचिव हैं। वे मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में ज्यादा चर्चित हैं पर संभावना जतलायी गयी है कि डॉ. सेन ने चिकित्सा की आड़ में  गरीब आदिवासी व वनवासियों को नक्सली आंदोलन से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई।

वामपंथी बुद्धिजीवियों जो भी कहे पर नक्सली मा‌र्क्सवादियों के घोषित हिंसक अवतार हैं, किंतु स्वयं मा‌र्क्सवादी लोकतंत्र व प्रजातात्रिक मूल्यों को कितना महत्व देते हैं? हिंसा मा‌र्क्सवादी दर्शन के केंद्र में प्रधान स्थान क्यों रखती है? क्यों वे हिंसा के बल पर अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों के दमन पर उतारू हो उठते हैं? ऐसा इसलिए कि मा‌र्क्सवाद सभ्य समाज के प्रति हिंसा, प्रतिरोध और असंतोष का दर्शनशास्त्र है।

- पवन कुमार