घोटाले वाली गलती

आखिरकार केंद्र सरकार कोयला खदानों के आवंटन के मामले में यह मानने के लिए विवश हुई कि उससे किसी न किसी स्तर पर गलती हुई, लेकिन किसी मामले में केवल सच को स्वीकार करना पर्याप्त नहीं। सच्चाई स्वीकार करने से समस्या का समाधान नहीं होता। कोयला खदानों के आवंटन में गलती के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए, क्योंकि कोयला खदानों का आवंटन कुछ ज्यादा ही मनमाने तरीके से किया गया और इसी के चलते इस प्रक्रिया ने एक घोटाले का रूप ले लिया।

किसी नीति पर सही ढंग से अमल न हो पाना समझ में आता है, लेकिन आखिर वे कौन से कारण रहे जिनके चलते सर्वथा अपात्र लोगों को कोयला खदानों का आवंटन कर दिया गया? इस मामले में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा और सीबीआइ से जांच कराने की जरूरत पड़ी उससे तो ऐसा लगता है कि कोयला खदानों के आवंटन में भी वैसी ही मनमानी की गई जैसी 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में की गई थी। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन भी पहले आओ और पहले पाओ नीति के तहत किए गए, लेकिन इस दौरान बड़ी सफाई से चहेतों को उपकृत कर दिया गया। कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसे महज गलती की संज्ञा दी जा रही है वह जानबूझकर किया गया अनुचित काम हो? इस सवाल का जवाब सीबीआइ की जांच के जरिये ही सामने आ सकता है और देखना यह है कि वह इस पूरे मामले में सच्चाई की तह तक पहुंचने में सफल हो सकती है या नहीं? जो भी हो, केंद्र सरकार के नीति-नियंताओं को यह अहसास होना ही चाहिए कि कोयला खदानों के आवंटन में उससे जो कथित गलती हुई उसकी देश को गंभीर कीमत चुकानी पड़ी है।

कोयला खदानों का आवंटन एक घोटाले में तब्दील हो जाने के कारण न केवल खदान आवंटन की उसकी नीति का उद्देश्य छिन्न-भिन्न हो गया, बल्कि कोयले का खनन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ और इसके चलते बिजली की किल्लत तो पैदा हुई ही, उद्योग-धंधों को भी नुकसान उठाना पड़ा। हालात ऐसे बने कि कोयले के बड़े भंडार के बावजूद देश को उसका आयात करने के लिए विवश होना पड़ा। अब पता चल रहा है कि इसके आयात में भी घोटाला हो गया। क्या केंद्रीय सत्ता के नीति-नियंता यह समङोंगे कि किसी बड़ी नीति पर गलत तरीके से अमल के कैसे दुष्परिणाम सामने आते हैं? फिलहाल यह कहना कठिन है कि देश को कोयले की किल्लत से निजात मिल सकेगी या नहीं, क्योंकि केंद्र सरकार को यह तय करना शेष है कि जिन कंपनियों को गलत तरीके से कोयला खनन के लाइसेंस मिले उन्हें रद किया जाए या नहीं? इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की यह आपत्ति सही है कि सरकार को निर्णय लेने में इतनी देरी क्यों हो रही है? केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसकी गलती के कारण जो समस्याएं उत्पन्न हुईं उनका समाधान शीघ्र निकले। इतना ही नहीं, उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कोयले के पर्याप्त खनन की व्यवस्था कैसे बने। इस मामले में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सरकार जरूरत भर के कोयले का खनन करने में सक्षम नहीं रह गई है और इसके चलते गंभीर समस्याएं खड़ी हो गई हैं।

 

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