शिक्षा नीति की नहीं, स्पष्ट कार्य योजना की जरूरत

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा हाल ही में समस्याओं से घिरा रहा। स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के पूर्व सचिव, अनिल स्वरूप, जिन्होंने शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने वाली समिति को इनपुट प्रदान किए थे, ने इससे जुड़ी कुछ बड़ी समस्याओं के बारे में प्रज्ञानंद दास से बातचीत की:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रस्तुत मसौदे को लेकर आपकी क्या राय है?

सबसे पहले तो हमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह कोई नई शिक्षा नीति नहीं है। यह उस नीति का मसौदा है जिसे भारत सरकार के द्वारा गठित एक समूह द्वारा प्रस्तुत किया गया है। अब आते हैं पॉलिसी अर्थात नीति वाले प्रश्न पर। जहां तक मेरी प्रतिक्रिया का सवाल है तो मैं यह कहना चाहूंगा कि वास्तव में सरकार को किसी पॉलिसी की आवश्यकता ही नहीं है। जिस चीज की आवश्यकता है वह है एक स्पष्ट रूप से परिभाषित कार्य योजना अर्थात एक्शन प्लान की। क्योंकि एक मात्र चीज जो शिक्षा व्यवस्था से गायब है वह है योजनाओं का जमीन पर क्रियान्वयन का आभाव। कुल मिलाकर कहें तो समस्या की पहचान और उसका समाधान लगभग लगभग उपलब्ध है। इसलिए मेरा मानना है कि एक नीति विविरण यानि कि पॉलिसी स्टेटमेंट की बजाए हमें एक कार्य योजना की अधिक जरूरत है।

आपके हिसाब से इस पॉलिसी के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती कौन सी है?

इस देश में किसी योजना के फलीभूत होने के लिए उसका राजनैतिक रूप से स्वीकार्य होना आवश्यक है। शिक्षा नीति भी ऐसी ही एक योजना है। भाषा वाले मामले में हमने पहले ही राजनैतिक बखेड़ा होता देख लिया है। आगे अभी और राजनैतिक चुनौतियां उत्पन्न होनी बाकी हैं। इसके बाद बारी आती है सामाजिक वांछनीयता की। इसका तकनीकि तौर पर व्यवहारिक होना जरूरी है। और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इसका वित्तीय तौर पर व्यवहारिक होना भी है। क्या हमारे पास धन है? प्रशासनिक स्तर पर भी यह किया जा सकने लायक होना चाहिए। प्रस्तुत मसौदे में प्रशासनिक संरचना के संदर्भ में कुछ विचार सुझाए गए हैं – इनमें से कुछ किये जा सकने लायक हैं जबकि कुछ के जा सकने लायक नहीं हैं। इसका न्यायिक तौर पर भी तर्क संगत होना आवश्यक है क्योंकि मसौदे में शिक्षकों के सेवा पूर्व प्रशिक्षण की बात भी कही गई है। आईए इसका सामना करें। इस देश में सबसे बड़ा रैकेट बीएड कॉलेजों का है। हमने उनके खिलाफ कार्रवाई करनी शुरु की लेकिन अदालत ने उसपर स्टे लगा दिया। इसीलिए, मैं कहता हूं कि प्रस्तुत नीति में जो कुछ सुझाया गया है वो पहले से ही ज्ञात है और निर्धारित किया जा चुका है। सवाल यह है  कि इसे हासिल कैसे किया जाए? जब तक हम इस कारण को नहीं जानते कि यह काम क्यों नहीं कर रहा है तबतक हम इसका समाधान नहीं तलाश पाएंगे।   

प्रस्तुत मसौदे में हिंदी को अनिवार्य भाषा के तौर पर शामिल किए जाने के मुद्दे पर आपके क्या विचार हैं?

भाषा को लेकर मेरा निजी मत है कि इसे कभी भी किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। कुछ भी जबरदस्ती थोपना अनुत्पादक हो सकता है जैसा कि भूत में हमने अनुभव किया भी है। यद्यपि वर्तमान में भी हमारे यहां त्रि-भाषा नीति है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।

समीक्षकों का मानना है कि अंग्रेजी को बहुत ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। आपकी इस पर क्या प्रतिक्रिया है?

पहले हमें समझना होगा कि अंग्रेजी को अन्य भाषाओं की तुलना में अधिक महत्व क्यों दिया जाता है – हम बाजार की मांग और आपूर्ति वाले आंकड़ों को भूल जाते हैं। बाजार में लोगों की यह आम धारणा है कि जो लोग अंग्रेजी जानते हैं उन्हें अंग्रेजी न जानने वाले लोगों की तुलना में बेहतर नौकरी मिलती है। इसीलिए, यहां तक कि ग्रामीण इलाकों में भी आपको कई तथाकथित कान्वेंट स्कूल्स मिल जाएंगे। इसके अतिरिक्त तमाम सर्वेक्षणों के मुताबिक अंग्रेजी भाषा के कारण ही छात्र सरकारी स्कूलों की तुलना में प्राइवेट स्कूलों को चुनते हैं। मैं यह नहीं कहता कि यह सही या गलत है। लेकिन इन दिनों मार्केट में इसी की डिमांड है।

स्कूली पाठ्यक्रम और शिक्षण प्रशिक्षण के लिए शिक्षा नीति में 5+3+3+4 प्रारूप की बात की गई है। क्या आपको यह पहल सही लगती है?

देखिए, यह सिर्फ कॉस्मेटिक यानि कि ऊपरी रंग रोगन वाली बात है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि फार्म्युला 5+3+3+2 है या कोई और? सबसे पहले हमें यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि हमारी शिक्षा प्रणाली में कहां गड़बड़ी है और फिर उसका समाधान निकालना चाहिए बजाए कि फार्म्युला लेकर आने की। हालांकि, प्री-स्कूल शिक्षण पर यहां जो जोर दिया गया है मैं उससे सहमत हूं। बच्चों के लिए प्री-स्कूल वाली शुरुआत अच्छी है। लेकिन फिर वही बात कि सरकार के पास तो पहले से ही ऐसी एक ‘समग्र शिक्षा’ नाम की योजना है, जिसमें प्री-स्कूल प्रशिक्षण शामिल है।

प्रस्तुत मसौदा में भारतीय मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करने की बात भी की गई है।

मुझे भारतीय मूल्यों को अंतर्निविष्ट करने में कोई समस्या नजर नहीं आती है। लेकिन नीति का इससे क्या लेना देना है? मूल्यों का बढ़ना एक ज्ञात सूत्रीकरण है। उसके लिए आपको किसी नीति की जरुरत नहीं है।

आपके अनुसार, हमारी शैक्षिक प्रणाली में क्या कमी है?

शिक्षक वह धुरी हैं जिसके चारों ओर हमारी शिक्षा घूमती है। हमें शिक्षकों से संबंधित मुद्दों को देखना होगा। निजी स्कूलों के बारे में बात करते समय, वे एक मजेदार सुझाव देते हैं - शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कक्षा IX, X, XI और XII तक बढ़ाया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि आरटीई ने हमें अच्छे से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। केवल कानून को अधिक वर्गों तक पहुंचाने से, यह कैसे मदद करेगा?
नए मानव संसाधन विकास मंत्री के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्र क्या होने चाहिए?
उनके लिए मेरा सुझाव यह होगा कि वह अपने पूर्ववर्ती प्रकाश जावड़ेकर द्वारा की गई पहल को आगे बढ़ाएं। उनके कार्यकाल के दौरान कुछ उत्कृष्ट पहल की गई थी। दूसरा, प्रत्येक राज्य के लिए अलग से कार्य योजना पर काम करना, उनके साथ बैठना, एक कार्य योजना को परिभाषित करना और यह पता लगाना कि संस्थागत और वित्तीय सहायता के मामले में उस कार्य योजना को लागू करने में क्या लगेगा। वह देने योग्य है। अधिक महत्वपूर्ण - उनके बिना मापदंडों को परिभाषित न करें क्योंकि प्रत्येक राज्य दूसरे से बहुत अलग है।

- साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया

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