शासन का नया मॉडल, माइक्रो सिटी

हम में से जो लोग बड़े शहरों में रहते हैं, वे अपने शहर को इतना चाहते हैं कि शायद ही कभी उसके भीतर झांककर देखते हैं कि जिस शहर में हम रह रहे हैं, उसमें चल क्या रहा है। इतना ही नहीं हमारे पास इतना वक्त ही नहीं होता कि थोड़ा आराम से बैठकर इस बारे में कुछ सोचें। शहरों में रहने वाले हम लोग हमेशा रोजमर्रा की जिंदगी के रोलर-कोस्टर पर होते हैं। आइए, इस लेख को पढ़ने के लिए लगने वाले वक्त में ही अपने शहर पर कुछ निगाह दौड़ा ली जाए। मैं आपको फुर्ती से एक विचार-यात्रा पर ले चलता हूं।
 
शुरुआत में तो एक मुक्कमल शहर ही होता है और फिर शहर में कुछ छोटे शहर, जिन्हें नए जमाने की शब्दावली में कहें तो माइक्रो सिटी आ जाती हैं। हम शहरी संकुलों में रहते हैं, जो कुछ मायनों में बड़े और बड़े होते जा रहे हैं तो कुछ अन्य अर्थों में छोटे और छोटे होते जा रहे हैं। दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चलती हैं। शहर बड़े अर्थात मेगा सिटी का रूप इस अर्थ में लेते जाते हैं कि इसके चारों ओर से ज्यादा से ज्यादा लोग इस चुंबकीय शहर की ओर खिंचे चले आते हैं और वहां बसना चाहते हैं। माइक्रो सिटी इसकी प्रतिक्रिया में बनती हैं, क्योंकि शहर इतना बड़ा हो गया है कि वह सबके बस में नहीं रहता।
 
माइक्रो सिटी दरअसल वह प्रक्रिया है, जो अपने आप शुरू हो जाती है। यह तब अस्तित्व में आती है, जब छोटे रहवासी इलाके अधिक से अधिक आत्म-निर्भर होते जाते हैं। यहां रहने वाले लोग बाहर की यात्रा करना ज्यादा पसंद नहीं करते। वे अपनी सारी जरूरतों, इच्छाओं, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं में आत्म-निर्भर हैं। ये छोटे इलाके ही फैशन और ब्रैंड के सर्वश्रेष्ठ विकल्प देते हैं, शॉपिंग की बेहतरीन जगहें यहां हैं और सर्वश्रेष्ठ मनोरंजन यहां उपलब्ध है। जब कोई इलाका बैंक की शाखा, खाने-पीने के ठिकानों और शॉपिंग की जगहों में आत्म-निर्भर हो जाता है तो माइक्रो सिटी का जन्म होता है। कई मायनों में बेंगलुरू का कोरामंगला, मुंबई का भायंदर, दिल्ली का ग्रेटर कैलाश और कोलकाता का राजरहाट माइक्रो सिटी के आदर्श उदाहरण हैं। हर महानगर में ये छोटे शहर मिल जाएंगे।
 
इस तरह से माइक्रो सिटी यानी शहर के भीतर शहर। एक आत्म-निर्भर संकुल, जो अपने आप में संतुष्ट है। इनमें से प्रत्येक शहरी संकुल धीरे-धीरे अपनी खास पहचान और ब्रैंड इमेज विकसित करता है। कुछ समय बाद मेगा सिटी में आकर बसने वाले नए लोग रहने के लिए खुद अपनी माइक्रो सिटी का चुनाव करते हैं। यह इस बात से तय होता है कि संबंधित माइक्रो सिटी की प्रभावी उपयोगिता और छाप छोड़ने वाली छवि क्या है। जहां माइक्रो सिटी विकसित होती है, तो उसके साथ खास तरह के स्पेशलिटी जिले भी उभरेंगे। ये कुछ उस तरह के होंगे जैसे अहमदाबाद का शॉपिंग डिस्ट्रिक्ट या वहां का बिज़नेस डिस्ट्रिक्ट है। अब तो यह भी लग रहा है कि अहमदाबाद एयरपोर्ट का क्षेत्र महानगर के एविएशन डिस्ट्रिक्ट के रूप में उभरेगा पर ये आगे की बात है। अभी बात माइक्रो सिटी की।
 
बेंगलुरू को ही लीजिए। ओआरआर और आईआरआर पर उभरने वाले ऑफिस-दफ्तरों के प्रमुख स्थान और उसी तरह केम्पेगौडा अंतरराष्ट्रीय विमानतल पर उभरने वाले ऐसे स्थानों की अपनी अलग छवि है। जितने अधिक बिल्डर और मार्केटियर जेनरिक ब्रैंड बिल्डिंग में निवेश करेंगे, उतना ही उन्हें कीमतों के आकलन में फायदा होगा। बेंगलुरू के बीआईएएल को ‘एरोसिटी’ और बाहरी रिंग रोड क्षेत्र को ‘ऑफिस हब’ के रूप में विकसित करने के अवसर पर गौर करें। अौर शायद व्हाइटफील्ड क्षेत्र को बेंगलुरू का ‘एंटरटेनमेंट डिस्ट्रिक्ट’ मान लिया जाए। दिल्ली तो पहले ही अपने एरोसिटी हब के रास्ते पर चल पड़ी है, जहां अंतरराष्ट्रीय होटलों के सर्वश्रेष्ठ ब्रैंड पहुंच चुके हैं। वहां अब और भी बहुत कुछ आएगा। जैसे-जैसे अवसर बढ़ेंगे रिटेल और रिटेलर ललचाएंगे।
 
जब आप माइक्रो सिटी इमेज विकसित कर रहे हैं तो फोकस का बहुत महत्व है। तीन प्रमुख विशेषताओं पर ध्यान केंद्रित रखने से ब्रैंडिंग प्रक्रिया में उतनी अधिक मदद मिल जाती है। बेंगलुरू के कोरामंगला को देखें। यहां मध्यम कीमतों पर खाने-पीने की इतनी व्यापक विविधता मिलती है, जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा स्ट्रीट फूड की वैरायटी है। एक पूरी गली इसके लिए समर्पित है, जिसे रविवार को ट्रैफिक के लिए बंद रखा जाता है। अाप केवल पैदल जा सकते हैं। अब यह सब धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से इलाके की ब्रैंड इमेज तैयार करेगा। ऐसे में रविवार को कोरमंगला को चुंबकीय दर्जा मिल जाता है। जब आप खाने-पीने के बारे में सोचते हैं तो कोरमंगला की ओर खिंचे चले आते हैं। रविवार है तो लोग कोरमंगला ही जाएंगे। फिर ये माइक्रो सिटी एक-दूसरे से स्पर्द्धा करने लगती हैं। हर माइक्रो सिटी एक अलग खासियत पेश करती है, जिससे उसकी दर्जा तय होता है।
 
इस तरह मेगा सिटी अपने में समाए इन माइक्रो सिटी का ही योग होती है। निवेश की जगह के रूप में मेगा सिटी को कोई नुकसान नहीं होगा। यह निवेशकों की रुचि जगाए रखेगा। वास्तव में ये माइक्रो सिटी शासन का बेहतर ढांचा भी लाने में मददगार होंगी। इनके लिए वार्ड के स्तर पर शासन को गहराई देनी होगी। माइक्रो सिटी के हितों को देखते हुए ज्यादा स्वायत्त शासन का दबाव बढ़ेगा और मेगा सिटी का कुल प्रबंधन सुधरेगा। पंचायती राज के कारण हमारे गांव में पहले ही स्थानीय स्वशासन का तंत्र काम कर रहा है।
 
हमारे शहरों को वार्डस्तरीय प्रबंधन व्यवस्था कायम कर गांव के स्वशासन को दोहराना होगा। इन माइक्रो सिटी में रहने वाले तय करें कि उनके बजट का कैसे और कहां उपयोग होगा। इन माइक्रो सिटी प्रबंधन तंत्र में सहायक तत्व के रूप में नागरिकों की सहभागिता को बढ़ाना होगा। विशुद्ध रूप से रिटेल रीयल एस्टेट के दृष्टिकोण से देखें तो मेरा पूरा विश्वास है कि रीयल इस्टेट के खिलाड़ियों को मेगा सिटी के भीतर माइक्रो सिटी के विकास में निवेश करना चाहिए। रीयल एस्टेट की कीमतें माइक्रो सिटी की इमेज के साथ बढ़ेंगी। मैं तो रीयल एस्टेट के हर खिलाड़ी से कहूंगा कि वे माइक्रो सिटी मूवमेंट की ‘सोच’ पर निवेश करें। पहले तो सोच के स्तर पर ही निवेश जरूरी है।
 
आखिर में यह जरूरी है कि माइक्रो सिटी को भी अपने ब्रैंड को बहुत आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाना चाहिए। दुर्भाग्य से जब किसी शहर के ब्रैंड के बारे में सोच की बात आती है तो इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इस सौदेबाजी में शहर साधारणता में बंधकर रह जाता है। और ठीक यही हमारे बड़े से बड़े शहर के साथ हो रहा है।
 
- हरीश बिजूर
ब्रैंड एक्सपर्ट एवं सीईओ हरीश बिजूर कंसल्ट्स
साभारः दैनिक भास्कर