उदार चीन में माओवाद हाशिए पर

विश्व पटल पर मार्क्सवाद, माओवाद व लेनिनवाद के एकमात्र विशुद्ध (अघोषित) झंडाबरदार चीन में विगत तीन दशकों में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। एक तरफ जहां उदारवाद ने तेजी से पांव पसारे हैं वहीं माओ व माओवाद हाशिए पर पहुंच गया है। वर्तमान चीन व चीनी जनता ज्यादा से ज्यादा धन कमाना चाहती है और वह जान चुकी है कि आर्थिक उदारीकरण ही इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हालांकि इसकी नींव डैंग झायोपिंग और जियांग जिमेन के शासनकाल में ही पड़ गई थी और चीन के बुनियादी स्वरूप में बदलाव का आधार तय हो गया था। इसके साथ यह भी स्पष्ट हो गया था कि माओ जिस चीनी लोक गणराज्य को स्थापित किया था उसकी प्रासंगिकता अब ज्यादा समय तक बरकरार नहीं रह पाएगी। और हुआ भी वैसा ही।

वर्तमान में चीन में पूंजीवाद और बाजारवाद की जड़ें गहरे तक महसूस की जा सकती हैं। जिसका अर्थ यह हुआ कि माओ की हैसियत चीन में अब वास्तविक न होकर महज प्रतीकात्मक रह गयी है। यही कारण है कि इस बदलते रूख को भांपते हुए परंपरावादी विचारकों ने बहुत पहले ही चीन में “कैपिटलिस्टिक रोडर्स” द्वारा डैंग झायोपिंग की स्थापना और “माओ” के विस्थापन की भविष्यवाणी कर दी थी। रही सही कसर चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चीन (सीपीसी) ने पूरी कर दी। मीडिया में आरही खबरों के मुताबिक सीपीसी ने अगले महीने नेतृत्व चयन के लिए होने वाली कांग्रेस से पहले पार्टी के प्रमुख दस्तावेजों से माओ की विचारधारा को हटाने का फैसला लिया है जबकि ये तीनों ही अबतक शब्द कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्येक सैद्धांतिक दस्तावेजों के लिए अवश्यंभावी होते हैं।

हालांकि इस बड़े बदलाव की कई वजहें हो सकती हैं जिसमें चीन के आधारभूत ढांचे में हुआ बड़ा बदलाव महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त चीनी नागरिकों की सोच में आया बदलाव भी इसका एक प्रमुख कारण है। वर्तमान दौर में चीनी युवाओं को यह बात समझ में आ गई है कि प्रसिद्धि पाने के लिए धनी होना और धनी होने के लिए आर्थिक नीतियों का उदार होना भी अत्यंत आवश्यक है। युवा पीढ़ी की धनी बनने की इस अदम्य प्यास ने चीन की विकास दर को तो बढ़ाया ही साथ ही नीति-निर्धारकों पर भी अपने रूख में बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया है।

दरअसल कोमिंतांग की भ्रष्ट सरकार से मुक्ति दिलाने के बाद माओ ने चीन को उस रास्ते पर ले जाने का प्रयास किया था जहां उसके लोग औपनिवेशिक शोषण से हमेशा मुक्त रह सकें। माओ ने 'ग्रेट लीप फारवर्ड' और 'कल्चरल रिवोल्यूशन' का सहारा लिया जिसे चीनी नवजागरण का नाम दिया जाता है। हालांकि माओ की मृत्यु के साथ ही 'कल्चरल रिवोल्यूशन' को दफना दिया गया और खुलेपन की नीति पर जोर दिया जाना शुरू हुआ। 80 के दशक में जड़ता को तोड़ नए सिरे से आर्थिक निर्माण की आधारशिला रखी गई। इसकी शुरूआत 1979 में फ्यूजैन और गोआंगडैंग में 4 स्पेशल इकोनॉमिक जोन (एसईजेड) स्थापित किए जाने के साथ हुई। इसके बाद खुलेपन की कडिय़ां जुड़ती गईं और पूंजीवाद का रास्ता साफ होता गया।

सन 1995 में जहां नियोजन पर आधारित परंपरावादी अर्थव्यवस्था को समाजवादी बाजार अर्थव्यवस्था में रूपांतरित किया गया तो वहीं 1997 में हांगकांग के पाने के बाद चीन ने “वन कंट्री टू सिस्टम” की नीति के साथ उच्च पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को अपनाने के स्पष्ट संकेत दिए। परिणाम यह हुआ कि 1999 में निजी क्षेत्र आधारित अर्थव्यवस्था को समाजवादी बाजार अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा मान लिया गया। 2001 में डब्ल्यूटीओ का सदस्य बनने के बाद चीन ने मोस्ट फेवर्ड नेशन के दर्जे का जमकर फायदा उठाते हुए चीनी उत्पादों से दुनिया को पाट दिया। पूंजीवाद के फायदों ने उसे संपत्ति संबंधी कानूनों को प्रभावी बनाने और व्यक्तिगत संपत्ति की सुरक्षा के अधिकारों को मौलिक अधिकार बनाने के लिए विवश किया। यानी माओ ने जिस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया था, नए चीनी नेतृत्व ने अंतत: उन्हीं के देश में वही व्यवस्था थोप दी।

माओ के बाद तीन दशकों तक चीनी अर्थव्यवस्था औसतन 10 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ी। चीनी निर्यातों ने दुनिया भर में धूम मचाई, भुगतान संतुलन चीन के पक्ष में किया, विदेशी मुद्रा भंडार को समृद्ध बनाया और पीपीपी के आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था को दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्था बना दिया। इससे पूरी दुनिया चीनी अर्थव्यवस्था का लोहा मानने लगी और आर्थिक विशेषज्ञ चीन को वैश्विक अर्थव्यवस्था का भावी नेता घोषित कर बैठे। जानकारों के मुताबिक चीन माओ की आर्थिक नीतियों की अनदेखी तो कर सकता है लेकिन राजनीति में उसे अभी जिंदा रखेगा। दरअसल, इससे चीनी जनता को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखने और प्रेस पर प्रतिबंद्ध लगाने का मौलिक अधिकार जो प्राप्त होता है। यह बात और है कि चीन में भी बहुदलीय प्रणाली की मांग जोरो शोरों से उठने लगी है। चीनी कम्युनिस्टों को भी शायद यह समझ में आ गया है कि राजनीतिक सुधारों के मुद्दे को अब वहां लंबे समय तक टाला जा पाना मुमकिन नहीं है।

- अविनाश चंद्र