मौत के भंवर में नौनिहाल

कभी महाराष्ट्र औद्योगिक दृष्टि से अव्वल और सामाजिक दृष्टि से प्रगतिशील राज्य के रूप में मशहूर था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसकी चर्चा किसानों की आत्महत्याओं के कारण ज्यादा होने लगी। अब महाराष्ट्र में एक और गंभीर समस्या सिर उठा रही है और वह है- बड़े पैमाने पर बालमृत्यु ।पिछले कुछ वर्षों में बालमृत्यु राज्य की राजनीति में सबसे चर्चित मुद्दा बनता जा रहा है। सुप्रसिद्ध समाजसेवी और महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के सुदूर आदिवासी इलाकों में पिछले कई दशकों से काम करनेवाले अभय कुमार बंग की अध्यक्षता में बालमृत्यु की समस्या का अध्ययन करने के लिए बनी समिति की रपट में तो कई चौकानेवाले तथ्य सामने आए और एक बात उजागर हुई कि महाराष्ट्र सरकार समृद्धि के कितने ही दावे क्यों न करती हो लेकिन जमीनी हकीकत बहुत अलग है। राज्य के ग्रामीण और खासकर आदिवासी इलाके गरीबी और भुखमरी की मार झेल रहे हैं। बालमृत्यु अचानक फैली किसी संक्रामक बीमारी का नतीजा नहीं चरम गरीबी से उपजे कुपोषण का नतीजा है।

पिछले दिनों महाराष्ट्र महिला व बाल विकास मंत्री वर्षा गायकवाड ने विधानसभा में स्वीकार किया कि  पिछले एक वर्ष में 24 हजार 365 बालकों की मौत होने की सनसनीखेज जानकारी सामने आई है जो आंशिक रूप से सही है। विधानसभा में कुपोषण के कारण बालकों की मौत होने का मामला तारांकित प्रश्न के जरिए भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सुधीर मुनगंटीवार, राकांपा विधायक जितेंद्र आव्हाड, शशिकांत शिंदे व अन्य ने उठाया था। इन विधायकों का आरोप है कि महाराष्ट्र में जनवरी 2012 के आखिर में सूबे में करीब 10 लाख 67 हजार 659 कुपोषण बालक पाये गये थे। जिसमें से 9 लाख 43 हजार 218 मध्यम रूप से कुपोषित थे जबकि 1 लाख 24 हजार 441 तीव्र कुपोषित बालक थे। जिसमें से 24 हजार 365 बालकों की मई 2012 के आखिर में मौत हो गई। विधायकों के इस आरोप में अंशतः सच्चाई होने की बात महिला व बाल विकास मंत्री गायकवाड ने स्वीकारी है।

हालांकि मंत्री महोदया ने अपने लिखित जवाब में सफाई दी है कि बाल मृत्यु सिर्फ कुपोषण की वजह से ही नहीं हुई है। बल्कि बालकों की मौत की वजह अलग-अलग बीमारियां भी है। उन्होंने कहा कि राज्य में राजमाता जिजाऊ कुपोषणमुक्त गांव अभियान शुरू किया गया है।जिसकी वजह से महाराष्ट्र में कुपोषण के कारण बालमृत्यु की दर घटी है।

सरकार के इस दावे की कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ पुष्टि करते हैं । चीन की बालमृत्यु दर 16 है। महाराष्ट्र आरोग्य विज्ञान विद्यापीठ,नाशिक के व्यवस्थापन बोर्ड के सदस्य व वरिष्ठ चिकित्सक डॉ.उदय बोधनकर ने जानकारी दी कि  राज्य में बालमृत्यु दर में आंशिक गिरावट आई है। वर्ष 2004 में राज्य की बालमृत्यु दर 36 थी, जो वर्ष 2010-11 में घटकर 32 हो गई है। पर यह अभी भी चीन जैसे सर्वाधिक आबादी वाले देश से काफी अधिक है। दूसरी तरफ कई विशेषज्ञों का कहना है कि बालमृत्यु की दर में कमी आने के बावजूद हजारों की संख्या में बच्चे मर रहे हैं यह बतलाता है कि राज्य में स्वास्थ्य की स्थिति कितनी भयावह है।

लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि ये सरकारी आंकड़े है जिनमें हालातों के गुलाबी पक्ष को ही ज्यादा उजागर किया जाता है। असलियत यह है कि कुछ समय पहले जब राज्य में बड़े पैमाने पर हुई बाल मृत्यु का मामला उठा तो  राज्य सरकार ने जाने माने बालरोग विशेषज्ञ और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल और पिछड़े जिले गढ़चिरौली में सेवा कार्य करनेवाले अभय बंग की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई थी। उसकी रपट बहुत चौंकानेवाली थी।

दरअसल बालमृत्यु की समस्या राज्य के आदिवासी बहुल जिलों मेलघाट,नंदुरबार ,गढ़चिरौली,यवतमाल आदि में बहुत गंभीर है। कुछ दिनों पहले ही एक रपट छपी थी कि कुपोषण के कारण आदिवासी बच्चे छह वर्ष की उम्र तक पहुंचने से  पहले ही तेजी से मर रहे हैं। वर्ष 2004 और2012 के दौरान 51461 बच्चों की मौत हो चुकी है।

हाल ही में साथी नामक एनजीओ ने अपने शोध के आधार पर जारी की गई –ए रिपोर्ट आन न्यूट्रीशनल क्राइसिस इन महाराष्ट्र – रपट में दिए आंकडे तो और भी चौंकानेवाले हैं। उसके मुताबिक हर साल राज्य में पैतालिस हजार बच्चे कुपोषण के कारण मरते हैं। राज्य में बाल कल्याण के लिए मिडडे मील और आईसीडीएस ये दोनों योजनाएं चलती है लेकिन उन पर सरकार इतना कम पैसा खर्च करती है उसका लाभ राज्य के ज्यादातर बच्चों को नहीं मिल पाता।

मेलघाट जिले में  बच्चों की मौत के आंकड़े बढ़ते  चले जा रहे हैं. साल दर साल कोरकू आदिवासियों के हजारों बच्चे असमय काल के गाल में समाते चले जा रहे हैं. मेलघाट में 1993 को पहली बार कुपोषण से बच्चों के मरने की घटनाएं सामने आई थीं. तब से अबतक अब तक कुल 10 हजार 762 बच्चों की मौत हो चुकी है. तब से अब तक सरकार द्वारा यहां अरबों रूपए खर्च किए जाने के बावजूद मौत का तांडव है कि रूकने के बजाय और तेज़ होता जा रहा है. कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या में दोगुनी बढ़ोतरी होने की आशंकाएं जतायी जा रही हैं.

मेलघाट में बीते 5 सालों में 0 से 6 साल तक के बच्चों की मृत्यु दर के सरकारी आंकड़ों को देखा जाए तो यहां 2005-06 में बाल मृत्यु का आंकड़ा 504 था, 2006-07 में जो 490 पर अटका, 2007-08 में यह 447 तक तो जा पहुंचा, मगर 2008-09 में यह बढ़कर 467 हो गया, और 2009-10 में यह और बढ़कर 510 तक आ पहुंचा. गौरतलब है कि बीते तीन सालों से यहां बच्चों की मृत्यु दर लगातार बढ़ रही है. इस साल कुपोषण के ग्रेड-4 में 39 बच्चे पाये गए हैं, जो कि बीते साल के मुकाबले 10 ज्यादा हैं. बीते 17 सालों के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मेलघाट में सलाना 700 से 1000 बच्चे कुपोषण के कारण दम तोड़ देते हैं है.

महाराष्ट्र जैसे राज्य में भी कुपोषण ने अपना साम्राज्य कायम रखा है। हर साल यहां हजारों बच्चे मरने को मजबूर हैं। राज्य के नंदूरबार जिले में पिछले साल 49 हजार, नासिक में एक लाख, मेलघाट में चालीस हजार, औरंगाबाद में 53 हजार, पुणे जैसे विकसित शहर में 61 हजार और मराठवाड़ा में 24 हजार बच्चे कुपोषण का शिकार हुए हैं।

यकीन करना मुश्किल है। लेकिन ये सच है। मुंबई भी भुखमरी का शिकार है। यहां के अस्पतालों में हर रोज 100 से ज्यादा कुपोषण के शिकार बच्चे भर्ती हो रहे हैं। यही नहीं 40 से ज्यादा बच्चों की साल भर में कुपोषण से मौत भी हो रही है। ये उस शहर का सच है जो देश को हर साल दस लाख करोड़ रुपए से ज्यादा टैक्स के तौर पर देता है। धारावी की एक झुग्गी में रहने वाले रामसागर के लिए जिंदगी का नाम भूख और गंदगी है। इस भूख और गंदगी ने उनके बेटे को बीमार कर दिया है। अपने आठ साल के बेटे सौरव को लेकर वो अस्पताल का चक्कर काट रहे हैं। पिछले एक महीने में सौरव का वजन 4 किलो ज्यादा घट गया है। अस्पताल में आए तो डॉक्टरों ने कहा बेटा कुपोषण का शिकार हो गया है।

राज्य चल रहे बाल मृत्यु के इस तांडव में कुपोषण सबसे बड़ा खलनायक बन कर उभर रहा है ।यह इस बात का प्रतीक है कि इस संपन्न राज्य का विकास केवल कुछ इलाकों तक ही सीमित है। राज्य के ज्यादातर इलाके गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी के शिकार हैं। इसलिए लोगों को भरपेट और पौष्टीक भोजन मिलना मुश्किल हो गया है। इसका सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं मासूम बचचे जो अपनी शुरू करने से पहले ही दम तोड़ देते हैं

- सतीश पेड़णेकर

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