अपने नेताओं को राजा महाराज न समझें: चेतन भगत

मुझे वह दिन याद आता है। दोपहर बाद का वक्त था। मुंबई के एक्सप्रेस हाईवे पर ट्रैफिक जाम था। यह महत्वपूर्ण उपनगरीय हाईवे एयरपोर्ट सहित महानगर के महत्वपूर्ण स्थानों को जोड़ता है। सड़क पर फंसे पड़े कई अन्य लोगों की तरह मुझे भी फ्लाइट पकडऩी थी। कोई सामान्य दिन होता तो टर्मिनल तक पहुंचने में दस मिनट लगते। पर उस दिन आधे घंटे से ट्रैफिक एक इंच भी आगे नहीं बढ़ा था। कोई सड़क नहीं बन रही थी और न कोई दुर्घटना हुई थी। पर कुछ पुलिसवालों ने ट्रैफिक रोक रखा था। मैंने कारण पूछा तो छोटा सा जवाब मिला, 'वीआईपी मूवमेंट।'

हममें से कुछ ने कहा कि भाई जाने दो हमारी फ्लाइट छूट जाएगी। पर पुलिसवाले ने हमें भगा दिया। लोग हमें देख हंसने लगे मानो कह रहे हो कि कैसे मूर्ख हैं, पुलिसवाले से रियायत की उम्मीद कर रहे हैं। मैंने बाइक, कारों, बसों और आटो रिक्शा में फंसे बैठे लोगों के चेहरे देखे। हजारों लोग आगे बढऩे का इंतजार कर रहे थे। हर किसी को कहीं न कहीं वक्त पर पहुंचना था और उन्हें देर हो रही थी। मजे की बात यह थी कि हर कोई बेचैन तो था, लेकिन कोई भी उत्तेजित नहीं था। क्योंकि यह तो भारतीय जीवन में आम है। जब नेता गुजरता है तो आसपास की दुनिया ठहर जाती है।

मैंने दीवानों की तरह एयरलाइन स्टाफ को फोन पर फोन किए और किसी तरह बोर्डिंग पास हासिल किया। जब ट्रैफिक छोड़ा गया तो सौभाग्य से मैं फ्लाइट पकडऩे में कामयाब रहा। एयरलाइन को जाम का पता चल गया था और उसने फ्लाइट कुछ देर के लिए रोक ली थी। अब इसकी वजह से देश के अन्य स्थानों पर फ्लाइट में देरी होनी थी। हालांकि उड़ान को कुछ देर रोकने के बावजूद बहुत से यात्री पीछे छूट ही गए। इन बेचारों ने रिबुकिंग में काफी वक्त, कोशिश व पैसा बर्बाद किया ताकि वे अपनी जगह पहुंच सकें। मुझे तो एक शहर में जाकर लोगों से मुखातिब होना था। यदि मैं नहीं पहुंचता तो कार्यक्रम ही रद्द हो जाता।

इस सारे झमेले के बीच नेताजी मुंबई आ गए होंगे। लोगों ने उन्हें सलामी ठोकी होगी और उनकी कार उन्हें कहीं पर फीता काटने या किसी मीटिंग में पहुंचाने के लिए हाईवे पर सनसनाती हुर्ई निकल गई होगी। हो सकता है उनके कार्यक्रम महत्वपूर्ण हो, लेकिन अर्जेंट नहीं थे। यदि उनके लिए ट्रैफिक नहीं रोका जाता तो अन्य लोगों की तरह वे भी अपने नियत स्थान पर पहुंच ही जाते, शायद दस मिनट देरी से ( तब उन्हें मुंबई की सड़कों व ट्रैफिक की असली स्थिति देखने को मिलती)। हालांकि उनकी सुविधा के लिए हजारों लोग घंटे भर तक इंतजार करते रहे, एयरलाइंस का शेड्यूल गड़बड़ा गया और कम से कम किसी एक इवेंट प्लानर को तो पैनिक अटैक आया ही होगा।

यह वीआईपी कौन है? वह कोई सांसद, एक मंत्री था। वह न तो देश का राजा था और न गुलाम भारत का कोई शासक। अब तो वे लोग नहीं रहे। यह व्यक्ति तो जनता का चुना हुआ प्रतिनिधि था। ऐसा व्यक्ति जिसे कोई काम करने के लिए लोगों ने चुना है। यह सही है कि इतने विशाल देश का कोई मंत्रालय संभालना कोई छोटा-मोटा काम नहीं है। इसके लिए वह वाकई सम्मान का हकदार है। पर क्या सम्मान का अर्थ गुलामी है? किसी के पास कोई महत्वपूर्ण पद है तो क्या इसका अर्थ यह है कि उसके द्वारा किया गया सत्ता का किसी भी तरह का दुरुपयोग हमें सहना होगा, स्वीकार करना होगा? क्या हमें यह सही लगता है कि एक व्यस्त शहर इसलिए ठप पड़ जाए क्योंकि लोगों द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि अपनी मीटिंग तक बिनदिक्कत पहुंचना चाहता है? यदि ऐसा है तो किसी स्तर पर क्या हम दासता स्वीकार नहीं कर रहे हैं? इस जुर्म में मददगार नहीं हो रहे हैं?

कोई पूछ सकता है कि हमारे सामने विकल्प क्या है? जाम सड़क पर कोई उपद्रव खड़ा करने से तो हालात और खराब ही होते। फिर पुलिस अलग से परेशान करती। सारे मिलकर सिर्फ विरोध भी करते तो भी उपद्रव जैसी स्थिति पैदा हो जाती। यह कोई समाधान नहीं है। सत्ता के दुरुपयोग का जवाब अराजकता नहीं है। तो हम करें क्या? इसके पहले कि हम इस सवाल का जवाब दें हमें यह देखना होगा कि क्यों हमारे चुने हुए प्रतिनिधि खुद को छोटे-मोटे राजा से कम नहीं समझते।

हमारे राजनीतिक वर्ग को अंग्रेजों से औपनिवेशिकालीन व्यवस्था विरासत में मिली थी। इस व्यवस्था की अपने शासितों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं थी। हमारे राजनीतिक वर्ग ने जवाबदेही लाने के लिए कानूनों में बदलाव नहीं किया। जबकि जवाबदेही ही लोकतंत्र की नींव होती है। अब तक हमारे राजनेता औपनिवेशकालीन शासकों की तरह ही शासन चलाते रहे हैं और वे उनकी ताकत कम करने या जवाबदेही लाने के किसी भी प्रस्ताव को तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं।

जहां एक ओर इसके लिए कानूनी व नीतिगत संघर्ष जारी है, भारतीय मानसिकता भी एक बड़ी समस्या है। हम भी उन्हें अपने राजा-महाराजा ही समझते हैं। हमारी सोच यह है कि वे सत्ता में है इसलिए वे कुछ भी कर सकते हैं। हमें यह अहसास नहीं है कि सत्ता में होने का मतलब है राष्ट्रहित में काम करने के लिए सत्ता में होना। यदि भारतीय यह मानसिकता बदल सकें तो कानून व नीतियों में बदलाव भी आएगा। खास बात यह है कि यदि बड़ी संख्या में हम नेताओं को शासक के नजरिये से न देखकर उन्हें जनसेवक की तरह देखें और उनसे यही अपेक्षा रखें तो राजनीतिक वर्ग के व्यवहार में इससे बड़ा बदलाव आएगा।

देश भर में लोगों की मानसिकता में बदलाव लाया कैसे जाए? आप अपने से शुरुआत कीजिए और फिर आसपास के लोगों में परिवर्तन लाने की कोशिश करें। यदि आप ऐसी किसी परेशानी से गुजरते हैं तो इसके बारे में बातचीत कीजिए। सोशल नेटवर्क पर इजहार कीजिए। यदि कहीं सत्ता का दुरुपयोग नजर आता है तो हर किसी को बताइए खासतौर पर तब जब आपका जनसेवक नेता किसी राजकुमार की तरह व्यवहार करे।

यदि कैंटीन वाला खराब भोजन दे तो आप इसका विरोध करेंगे। यही बात राजनेता के साथ है। यह सही है कि वे देश चलाते हैं पर असल में यह वैसी ही एक सेवा है जैसे कोई ड्राइवर बस चलाता है। ड्राइवर खुद को बस मालिक नहीं समझ सकता। उसे मालूम होना चाहिए कि यदि वह ठीक से ड्राइव नहीं करता तो उसे हटा दिया जाएगा। यदि हम बेहतर भारत चाहते हैं तो आइए हम इस मानसिकता को बदलने की कोशिश करें। राजा-महाराजा और विदेशी शासक विदा हुए छह दशक से ज्यादा वक्त हो गया है। अब समय आ गया है कि वे हमारे दिमाग से भी विदा हो जाएं।

 

- चेतन भगत (अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार)

साभारः दैनिक भास्कर