चालाकी नहीं, उपचार है एफडीआई

कोयला घोटाले से पस्त सरकार, पिछले एक पखवाड़े के भीतर लंबे समय से अपेक्षित कुछ सुधारों पर आगे बढ़ी है। इनमें मल्टी ब्रांड रिटेल और विमानन क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति शामिल है। एफडीआई के मुद्दे पर देश में तेज प्रतिक्रिया हुई और “वाद विवाद के लिए तैयार भारतीयों” के बीच यह हमेशा बनी रह सकती है।

दो प्रकार के ध्रुवीकृत प्रतिक्रियाएं उभरी और दोनों जरूरत से ज्यादा। पहले समहू ने इसकी जबरदस्त तारीफ की। अखबारों की सुर्खियां चीख-चीख कर बताने में जुट गईं कि प्रधानमंत्री ने अब व्यवसाय पर ध्यान दिया है और अब नीतिगत मोर्चे पर सबकुछ ठीक हो जाएगा। कुछ लोगों का यहां तक कहना कि कोयला घोटले का रोना रोने वाले, पीएम को इसमें न घसीटे, क्योंकि अब संकेत मिलने लगा है कि उन्होंने अंततः अपना कर्तव्य निभाया था, यह उन्हें देश के प्राकृतिक संसाधनों के कुप्रबंधन के आरोपों से दोषमुक्त कर देगा। प्रधानमंत्री से हमारी उम्मीदें इतनी कम हैं, कि कुछ लोग यहांतक मानते हैं कि जितनी बार वे किसी फाइल पर हस्ताक्षर करें, उनका खड़े होकर तालियों से स्वागत किया जाए।

खैर, भले ही यह हिरोईक न हो लेकिन यह एक बढ़िया फैसला है। वैश्विक मानसिकता देश के लिए लाभदायक है। 1991 के सुधारों के लाभ को हम देख चुके हैं। जो सेलफोन हम लेकर चलते हैं, टीवी चैनल हम देखते हैं, वाहन हम चलाते हैं, उपकरण हम प्रयोग करते हैं- सभी दो दशक पहले अपनाए गए उदारवाद के परिणाम हैं। इसके पूर्व सरकार को यह लगता था कि लोगों को एक लैंडलाइन फोन और सरकारी टीवी चैनल देखने के लिए वर्षों का इंतजार करना पूरी तरह से ठीक है। मध्य वर्ग द्वारा ऐसा परिवर्तन देखने के बाद भी, आश्चर्य है कि सुधारों के लाभ के प्रति लोगों को समझाने की जरूरत है।

प्रशंसा से इतर, अड़ंगा भी है। भाजपा ने, संभवतः अपने समर्थक व्यवसायी समुदाय को खुश करने के लिए नई नीतियों की निंदा की। तृणमूल कांग्रेस ऐसे सुधारों की जनविरोधी प्रकृति के कारण कर्कश शोर मचा रही है। सुधारों से अछूते रहे लोगों पर ममता बनर्जी की आशा केंद्रीत है।

अन्य खिलाफत करने वाले बहस कर रहे हैं कि यह किस प्रकार किराना दुकानों को बर्बाद कर देगा। इन लोगों को लगता है कि अत्यधिक नियमित भारतीय उद्यम में 51 फीसदी की इक्विटी के साथ, वाल-मार्ट वह कर पाएगा जो रिलायंस फ्रेश और बिग बाजार नहीं कर सके। भारतीय कार्पोरेट रिटेल स्टोर्स कई वर्षों से यहां है। और इसके बाद भी, किराना दुकानों की देशभर में भरमार है। खिलाफत करने वालों से जब यह पूछो कि वाल-मार्ट जो काम भारतीय श्रृंखलाएं नहीं कर पायीं वह वाल-मार्ट कैसे कर सकेगी तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता। जब उनसे पूछों कि भारत के लोगों को खुदरा खरीददारी का अनुभव और श्रेष्ठ कीमत क्यों नहीं मिलनी चाहिए तब वे चुप रहते हैं।

चीन, मलेशिया, थाईलैंड, फिलिपिंस कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं जिन्होंने मल्टी ब्रांड रिटेल की अनुमति दी है और वहां कोई बड़ा उथल-पुथल या बड़े पैमाने पर बेरोजगारी जैसा कुछ नहीं हुआ। एक स्तर पर, यह केवल मल्टी ब्रांड रिटेल, जो देश में आवश्यक बड़े स्तर पर आर्थिक सुधार का महज एक पक्ष है, के बारे में है। क्या हम हर सुधारों पर यूं ही ध्रुवीकृत बहस करते रहेंगे? क्या सुधारों के लिए हमारे पास कुछ जमीनी (आधारभूत) नियम नहीं होने चाहिए?  क्या सरकार, सहयोगी और विपक्ष दलों के बीच इस बात पर सहमति नहीं बन सकती कि- यदि हम धनार्जन करना चाहते हैं तो देश में आर्थिक सुधारों को लाना जरूरी है। क्या हम यह स्वीकार कर सकत हैं कि सुधार अंततः लोगों के हित के लिए है।

विपक्ष ने विभिन्न घोटालों का खुलासा कर सरकार पर दबाव बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। फिर भी, हर बात का विरोध, और केवल अड़ंगा लगाने से अधिक कुछ नहीं करना भी ठीक नहीं है। विदेशी का भय विश्व भर में गुजरे जमाने की बात हो गई है और अस्सी के दशक में ही पीछे छूट चुकी है। आज, भारत को व्यापार के प्रति खुला होना चाहिए। भारत को विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा में बने रहने की योग्यता भी सीखने की जरूरत है। भारत में आने वाले हर कोस्टा कॉफी के लिए हमें कैफे कॉफी डे और बरिस्ता स्थापित करने की जरूरत है जो अपने को संभाल सके। विदेशियों को आने न देना और अपने साथ व्यापार न करने देना कमजोरी की निशानी है। यह वैसे ही जैसे ओलंपिक की मेजबानी करें और श्रेष्ठ देशों को भाग न लेने दें।

भारतीय उद्योग को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने की आवश्यकता जैसी दलीले पुरानी हो चुकी हैं। अधिक नहीं तो कम से कम 20 सालों से तो हम तैयार ही हो रहें है। चलिए विश्वास जताएं कि नई चुनौतियों को सामना करने के लिए किराना दुकानें भी सुधार करेंगी।

फिरभी, एफडीआई और पीएम की कुछ नीतियों के समर्थन का यह अर्थ नहीं कि विभिन्न घोटालों में फंसी सरकार इससे मुक्त हो गी है। अबतक, सरकार की तरफ से ग्राफ्ट पर सही कदम उठाने के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई गई है। वास्तव में, यह अबतक घोटाला होने की बात से ही इंकार कर रही है। उदारवाद का मतलब केवल बेहतर आर्थिक नीतियों का होना ही नहीं बल्कि बेहतर नैतिक मूल्यों का भी होना है। बड़े पैमाने पर फैला भ्रष्टाचार हमें इतना नुकसान पहुंचाएगा जितना कुछेक वाल-मार्ट स्टोर कभी नहीं कर सकते। इसलिए यदि हमें कभी बहस करनी ही है तो आइए हम कम से कम सही मुद्दों पर करें। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और वाल-मार्ट भारत में आपका स्वागत है!

- चेतन भगत (लेखक जाने माने उपन्यासकार हैं)
साभारः टाइम्स ऑफ इंडिया
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