सीबीआई को गुलामी से मुक्त किया जाए

 

उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार को रोकने के लिए देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी में सरकार की दखलंदाजी रोकने की जरूरत।

किसी जमाने में एक राजा ने गंभीर अपराध किया। उसने राज्य का धन चुराया और राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट कर दिया। आक्रोशित नागरिकों ने न्याय की आवाज उठाई। राजा तैयार हो गया। उसने अपने पालतू गुलाम को मामले की जांच का जिम्मा सौंपा। गुलाम का कहना था कि राजा ने कुछ गलत नहीं किया है। मामले को समाप्त कर दिया गया। कुछ दिनों में सब कुछ आम दिनों की तरह चलने लगा। यह कहानी रोचक नहीं है, बल्कि पूरी तरह हास्यास्पद है।

छह साल का बच्च तक बता देगा कि इस कहानी का कोई मतलब नहीं है। लेकिन, भारतीय न्याय और जांच प्रणाली इसी तरह से चलती है। राजा और गुलाम के बदले क्रमश: सरकार और सीबीआई को सामने रखिए। सीबीआई सरकार के प्रति जवाबदेह है। उसके वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्तियां, प्रमोशन, तबादले और रिटायरमेंट के बाद होने वाली नियुक्तियां राजनीतिज्ञों के हाथ में रहती हैं। इसी सीबीआई से सरकार के खिलाफ घोटाले के आरोपों की जांच करने के लिए कहा जाता है। यह कुछ वैसा ही है कि नौकर से उसके मालिक के खिलाफ जांच करने के लिए कहा जाए।

आश्चर्य नहीं कि उससे कोई नतीजा नहीं निकलेगा। ऐसी स्थिति में क्या हम बेवकूफ नहीं हैं, जो इस सिस्टम को स्वीकार करते हैं। वर्तमान कोयला घोटाले की जांच को देखिए। सीबीआई को स्वीकार करना पड़ा कि सुप्रीम कोर्ट में स्थिति रिपोर्ट पेश करने से पहले सरकार ने उसमें फेरबदल किया है।

यह सिस्टम के भयावह तरीके से गलत होने का उदाहरण है। आप सरकार से जवाबदेही की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं, जब वह अपने खिलाफ चल रही जांच में सेंध लगाए। सीबीआई की क्या उपयोगिता है यदि आरोपी राजनीतिज्ञ उसे प्रभावित कर सकते हैं? जाहिर है, अब इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। लेकिन हम ऐसा किस तरह कर सकते हैं? और शक्तिशाली राजनीतिक वर्ग स्वतंत्र सीबीआई को क्या स्वीकार कर सकेगा?

सीबीआई की कार्यप्रणाली में सुधार की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। राजनीतिज्ञों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग में कोई नई बात नहीं है। वर्षो से भारतीय इसे बर्दाश्त करते रहे हैं, बल्कि उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया है। कुछ हद तक भारतीय नागरिक भ्रष्टाचार या भाई-भतीजावाद पर ध्यान नहीं देते हैं। हम इसे सत्ता में बैठे लोगों का अधिकार मानते हैं। जब यह बहुत अधिक हो जाता है, तब हमारी नैतिकता जागती है। हम इसे घोटाला कहते हैं और न्याय की मांग करते हैं।

अर्थव्यवस्था का आकार बड़ा होने के साथ घोटालों की विशालता, उनका दायरा और संख्या बढ़ी है। कोयला आवंटन घोटाले में किसी स्पष्ट मापदंड के बगैर कुछ लोगों के हाथों में अरबों रुपए की संपदा सौंप दी गई। इस तरह के आवंटन नीलामी के तहत किए जाएं, जिनमें संपदा का मूल्य तय किया जा सके। या जिन मामलों में भविष्य में आय अनिश्चित हो, वहां आमदनी की भागीदारी का फॉमरूला अपनाया जाए।

ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। कोयले को तोहफे के बतौर मित्रों, रिश्तेदारों और सरकार के चहेतों को भेंट कर दिया गया। जिन लोगों को कोयला खदानों का आवंटन हुआ, बदले में उन्होंने नकद धन या किसी तरह के अन्य राजनीतिक फायदे पहुंचाए। अगर सरकार कोयले से पर्याप्त राजस्व कमाती तो इस धनराशि का उपयोग भारत के बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य-सेवाओं या सिंचाई के क्षेत्र में हो सकता था।

इसलिए इतने बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ी के मामले में न्याय होना चाहिए। दुर्भाग्य से इस न्याय को करने की जिम्मेदारी सीबीआई जैसे मामूली गुलाम के पास है। अभी हाल की घटनाओं से पता लगता है कि जैसे सीबीआई सरकार की व्यक्तिगत मिल्कियत है। जब तक हम इसे नहीं सुधारेंगे, भ्रष्टाचार के मामले में बहुत अधिक बदलाव नहीं होगा। इस संरचनात्मक परिवर्तन के बगैर सड़कों पर प्रदर्शन, उपवास, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों का समर्थन, अपनी पसंद के राजनीतिक दल का समर्थन और लंबी-चौड़ी बहस निर्थक साबित होंगी।

वस्तुत: अभी हाल में लोकपाल बिल के संबंध में उठी मांग का सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन सीबीआई को स्वतंत्र बनाने से जुड़ा है। सीबीआई को स्वायत्तता देकर हम एक तरह से लोकपाल हासिल कर सकते हैं। लेकिन, ऐसा नहीं हो पा रहा है।

हम ऐसा कैसे कर सकते हैं? सबसे पहले तो हमें इस परिवर्तन की प्रकृति, उसकी महती जरूरत और महत्व को समझना होगा। सीबीआई की स्वायत्तता किसी पार्टी विशेष का मामला नहीं है। प्रत्येक सत्ताधारी राजनीतिक दल को सीबीआई का दुरुपयोग करने का अवसर मिलता है। परिवर्तन की मांग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से होनी चाहिए। दूसरी बात, नौकरशाही को जागना चाहिए।

या तो वह लंबे समय से सो रही है, या उसकी घोटालेबाजों से मिलीभगत है, या वह एकजुट नहीं है। नौकरशाह इस परिवर्तन के पक्ष में आगे आएंगे तो जनता उनका समर्थन करेगी। नौकरशाही का दबाव राजनीतिज्ञों को झुकने के लिए विवश कर सकता है। इस वक्त तो वे अपने मालिकों की सेवा करने और देश की भलाई की अनदेखी करने में जुटे हैं।

तीसरी विवादास्पद बात इस परिवर्तन से राजनीतिज्ञों को होने वाले नुकसान को अलग करने से संबंधित है। सीबीआई की स्वायत्तता भावी मामलों के संबंध में होगी, उसका अतीत से कोई लेना-देना नहीं होगा। आखिरकार हमने ही राजनेताओं को सत्ता के दुरुपयोग की इजाजत दी है। अगर अब हम उन्हें रोकना चाहते हैं तो कम से कम वे यह तो नहीं चाहेंगे कि उन्हें उन कामों के लिए दंड दिया जाए, जो हमने उन्हें करने दिए।

राजनीतिज्ञों को सुरक्षा कवच मुहैया कराना आश्चर्यजनक लगता है, लेकिन इस बात के अवसर कम ही हैं कि पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई करे और वे इस परिवर्तन के लिए तैयार हो जाएं। चौथी बात, हमें सुनिश्चित करना होगा कि नई स्वायत्त सीबीआई खुद सत्ता का दुरुपयोग न करने लगे। वह अपनी तरफ से जांच-पड़ताल कर सकती है लेकिन, नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि वह अपनी नई स्वायत्तता का किसी के खिलाफ दुरुपयोग न कर सके।

अच्छे इरादे से लाए गए अति महत्वाकांक्षी लोकपाल विधेयक में सीबीआई की स्वायत्तता का मसला गुम हो गया। वर्तमान कोयला घोटाला और सीबीआई की भूल ने हमें इस पर फिर से बहस का सुनहरा अवसर मुहैया कराया है। उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सीबीआई को स्वायत्तता देने का समय आ गया है।

अच्छे इरादे से लाए गए अति महत्वाकांक्षी लोकपाल विधेयक में सीबीआई की स्वायत्तता का मसला गुम हो गया। वर्तमान कोयला घोटाला और सीबीआई की भूल ने हमें इस पर फिर से बहस का सुनहरा अवसर मुहैया कराया है।

 

- चेतन भगत, अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं

सभारः दैनिक भास्कर

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