'बेक इन इंडिया' अभियान की जरूरत

इस लेख को पढ़ने वाले अधिकतर लोगों ने इससे पहले अपने भोजन में देश के खेतों में पैदा हुआ खाद्यान्न खाया होगा। हमारे भोजन में शामिल चावल या गेहूं की बनी चपाती, ये सब इन्हीं खेतों में पैदा होते हैं और हमारी रोजाना की जिंदगी में इनका असर होता है। लेकिन अनाज खाते समय शायद ही हम कभी सोचते हों कि इसके लिए किसी की जान भी गई होगी। जबकि सच्चाई यह है कि इस वर्ष ही हजारों किसान अपनी जान देने के लिए मजबूर हो सकते हैं।
 
बेमौसम बारिश से खेतों में लगी फसल खराब हो रही है और किसानों के लिए खेती से कमाई करना मुश्किल है। उनकी हालत इतनी खराब है कि उधार लिए 50 हजार रु. की छोटी रकम लौटाने में असमर्थ होने के चलते वे अपनी ही जान ले रहे हैं। यह ऐसे देश में हो रहा है जहां किसानों को सब्सिडी और करों में छूट मिलती है।उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती हैं। जहां हर राजनीतिज्ञ किसानों का हितैषी होने का शोर करता है, हजारों गैर-सरकारी संगठन उनका प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं और जहां हर कोई मानता है कि किसानों का ध्यान रखना जरूरी है।
 
फिर, ऐसा हो क्यों रहा है? हम वर्ष 2015 में हैं, लेकिन देश के लाखों नागरिकों की आजीविका का जरिया इतना जोखिम भरा है कि एक सप्ताह की बेमौसम बारिश भी एक परिवार को आर्थिक रूप से तोड़ सकती है और उन्हें जान के लाले पड़ सकते हैं। मानसून अच्छा हो तो किसान खुशहाल रहता है, लेकिन इतना नहीं कि बचत कर सके या समृद्ध वर्ग में शामिल हो सके। आखिर समस्या क्या है? विशेषज्ञों के पास इसका जवाब तैयार होता है।
छोटे भूखंड, सिंचाई की कमजोर व्यवस्था (खेती योग्य एक तिहाई जमीन में ही सिंचाई होती है), क्षतिपूर्ति और बीमा योजनाओं में भ्रष्टाचार, कम ब्याज पर कर्ज नहीं मिलना, स्टोरेज की अपर्याप्त व्यवस्था, बिचौलियों की मनमानी, नई तकनीकों का अभाव, मार्केटिंग सुविधाओं का न होना- तकरीबन हर विशेषज्ञ के जवाब में ये कारण शामिल होते हैं। ये सभी जायज कारण हैं और इन पर बहस होनी चाहिए। लेकिन इस तमाम विचार-विमर्श के बीच हमें सबसे महत्वपूर्ण सच को स्वीकार कर लेना चाहिए कि हम अपने किसानों की हालत बेहतर करने में असफल रहे हैं।
 
हमारा पेट भरने के लिए वे अपना खून-पसीना बहाते हैं, लेकिन हमने उन्हें उनके हाल पर इस कदर छोड़ दिया है कि वे जीने के लिए प्रकृति की उदारता पर आश्रित हैं। हमारे नकली समाजवाद, गलत नीतियों और उनके क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार के चलते किसान अभी भी गरीब बने हुए हैं। हालिया बारिश के चलते बर्बाद हुई फसल के बाद क्षतिपूर्ति योजनाएं शुरू होंगी और वादों की भरमार लग जाएगी, लेकिन उन्हें इसका फायदा नहीं मिलेगा। दरअसल, किसानों को जानबूझकर इस हालत में रखा जाता है।
 
इसके दो कारण हैं- पहला उच्च और मध्यवर्ग को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के लिए और चुनावों में वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने के लिए। यदि हमें वास्तव में किसानों की चिंता होती तो हम उन्हें वैश्वीकरण का फायदा उठाने की अनुमति देते। लेकिन खाद्य सुरक्षा (इस असुरक्षा कहना ज्यादा मुनासिब है) के नाम पर और विकास तथा बदलाव विरोधी हमारी मानसिकता के कारण हम उन्हें बाकी दुनिया से जुड़ने का मौका ही नहीं देते। उनकी फसलें वैश्विक बाजार तक पहुंचेंगी कैसे।
 
रोचक तो यह है कि भारत के लिए यह एक बेहतरीन मौका है। मेक इन इंडिया के साथ देश में एक और अभियान छेड़ने की जरूरत है-बेक इन इंडिया। हमारी आधी आबादी कृषि कार्य में लगी है, फिर हम पूरी दुनिया के लिए भोजन की व्यवस्था क्यों नहीं कर सकते। हम अपने किसानों को बंधुआ मजदूर क्यों समझते हैं जो केवल भारत के लिए ही अनाज पैदा करें? कृषि क्षेत्र की बहुराष्ट्रीय कंपनियों से इतनी घृणा क्यों करते हैं कि उन्हें किसानों के नजदीक भी नहीं जाने देना चाहते। हम किसानों को देशी बिचौलियों और भ्रष्ट अधिकारियों के भरोसे छोड़ देते हैं, लेकिन विदेशी कंपनियों को उनका सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं।
 
सरकार द्वारा शुरू किए गए मेक इन इंडिया अभियान के इरादे अच्छे हैं, लेकिन इसके क्रियान्वयन में तमाम मुश्किलें हैं। हम चाहते हैं कि लोग भारत में निर्माण करें, लेकिन हमारे पास ढंग का एक भूमि अधिग्रहण कानून तक नहीं है। फिर मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए जमीन कैसे मिलेगी? आधारभूत संरचनाएं इतनी विकसित नहीं हैं कि उत्पादन व्यवस्था वैश्विक मापदंडों के अनुरूप हो। हमारे नियम-कायदे और कर-संबंधी कानून भी इतने सरल नहीं हैं कि विदेशी उत्पादक आकर्षित हो सकें।
 
हमारे पास करोड़ों किसानों की फौज है जो कम लागत पर अनाज पैदा करने को तैयार है, बशर्ते उसकी स्थायी कमाई की व्यवस्था हो सके। दुनिया को खाद्यान्न की जरूरत है। क्या हम किसानों की मदद से बेक इन इंडिया क्रांति की शुरुआत नहीं कर सकते? कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक समस्याएं हैं और सब्सिडी या कल्याणकारी योजनाओं से इन पर काबू करना असंभव है। सरकार अपने कर्तव्य में विफल रही है तो क्या यह कृषि में निजी क्षेत्र, खासकर बड़ी विदेशी कंपनियों, के प्रवेश की अनुमति देने का माकूल समय नहीं है?
 
क्या यह बेहतर नहीं होगा कि संसाधनों से परिपूर्ण बड़ी कंपनियां हमारे किसानों के साथ मिलकर खेतों में काम करें? यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पूरा नियंत्रण हमें पसंद नहीं तो किसान को-ऑपरेटिव या जॉइंट एमएनसी का तरीका अपना सकते हैं। इसका स्वरूप विचार-विमर्श से तय किया जा सकता है, लेकिन हमें पहले यह स्वीकार करना होगा कि कृषि क्षेत्र में तमाम समस्याएं हैं और इसके लिए कुछ लीक से हटकर करने की जरूरत है।
कृषि क्षेत्र में विदेशियों को आमंत्रित करना ऐसा ही विचार है। मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में क्रांति से पहले इसी पर ध्यान देने की जरूरत है। पूरी दुनिया के लिए सेमीकंडक्टर और एलईडी टेलीविजन बनाने का विचार अच्छा है, लेकिन हम अभी इससे मीलों दूर हैं। लेकिन हम दुनिया को कुछ और भी दे सकते हैं जो इतना ही महत्वपूर्ण है। हम दुनिया के लिए अनाज, दूध, घी, सब्जियां और फल उगा सकते हैं। ऐसा हुआ तो हमारे किसानों के जीवनस्तर में सुधार होगा। इसके चलते उच्च और मध्यवर्ग को खाने के लिए थोड़े ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे।
 
किसानों की खून लगी रोटी खाने से बेहतर है कि हम आटा खरीदने के लिए कुछ ज्यादा पैसे दे दें। भारत एक कृषि प्रधान देश है और खेती ही ऐसा क्षेत्र है जिसमें हम आगे निकल सकते हैं। दुनियाभर के रसोई घरों में अनाज पहुंचाने से किसान के साथ देश की अर्थव्यवस्था भी आगे बढ़ेगी। कोई संदेह नहीं कि मेक इन इंडिया से बेक इन इंडिया अभियान शुरू करना चाहिए।
 
- चेतन भगत (अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार)
साभारः दैनिक भास्कर