शुभ लक्षण है ‘देसी ब्वायज’ में चैरिटी का बढ़ता प्रचलन

धर्मार्थ कार्य के क्षेत्र में सक्रिय ग्लोबल बिजनेस कंसल्टेंसी फर्म बेन एंड कंपनी द्वारा विगत दिनों विश्व के अनेक देशों में एक अध्ययन कराया गया। यह अध्ययन अलग-अलग राष्ट्रों के नागरिकों द्वारा किए जाने वाले धर्मार्थ कार्यों व उनकी रूचियों से संबंधित था। वैसे तो संस्था द्वारा यह अध्ययन समय-समय पर कराया जाता है और इसकी रिपोर्ट भी जारी की जाती है लेकिन संस्था द्वारा इस वर्ष जारी अध्ययन रिपोर्ट भारत के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। संस्था की रिपोर्ट में भारतीयों विशेषकर यहां के युवाओं में धर्मार्थ कार्यों के लिए दान देने की प्रवृत्ति में सकारात्मक परिवर्तन आने की बात कही गई है। संस्था के मुताबिक हाल के कुछ वर्षों में भारतीयों युवाओं में अपनी वार्षिक आय का एक निश्चित हिस्सा चैरिटी के लिए दान में देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। चैरिटी में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेने वालों में अधिसंख्य युवा दानकर्ता हैं जबकि 30 वर्ष अथवा इससे कम आयु वालों की संख्या भी एक तिहाई है। सुखद यह है कि चैरिटी करने वालों ने आगामी वर्षों में धनराशि में वृद्धि करने का संकल्प लिया है।

चैरिटी कार्यों को पश्चिमी देशों के धनाड्य लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले व्यवहार के तौर पर देखने वाले भारतीय लोगों की प्रवृत्ति में सकारात्मक बदलाव देश के लिए शुभ संकेत माना जाना चाहिए। वैसे तो प्राचीन काल से ही हमारे यहां गरीबों की सेवा व दान का खासा महत्व रहा है। यहां के लोगों के जीवन में दान एक संस्कार के तौर पर शामिल है। हालांकि कालान्तर में यह परंपरा केवल ब्राह्मणों को दान देने, मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाने व दानपत्र में कुछ धन अर्पित करने तक ही सिमट कर रह गयी। यह ठीक वैसे ही हुआ जैसे कि कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित व्यवस्था में तब्दील हो गई। दान आदि कार्यों का मंदिरों तक सिमट कर रह जाने से इसका फायदा जरूरतमंद लोगों की बजाए कुछ समूह विशेष तक ही सिमट कर रह गया। धर्मस्थल कुबेर के खजानों में तब्दील होने लगे जबकि गरीब-लाचार असहाय ही रह गए।

वर्तमान में लोगों का दान करने का नजरिया व्यापक तौर पर उदार हुआ है। लोग अब दान किसी संस्था, ट्रस्ट, आश्रम अथवा प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा कराना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। कम से कम इन संस्थाओं, ट्रस्टों व आश्रमों द्वारा आय व्यय का पूरा न सही कुछ तो हिसाब अवश्य रखा जाता है। इससे दान देने वालों को कम से कम यह पता होता है कि उनका धन किस मद में खर्च हो रहा है।

बेन एंड कंपनी के अध्ययन के रिपोर्ट के आधार पर यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि पश्चिमी देशों की देखादेखी ही सही, भारतीय दौलतमंदों का दिल भी अब बड़ा हो रहा है। रिपोर्ट क मुताबिक देश के अमीरों ने वर्ष 2011 में अपनी आमदनी का 3.1 प्रतिशत हिस्सा धर्मार्थ कार्यो के लिए दान किया। इनमें से आधे से अधिक ने इस साल धर्मार्थ कार्यो के लिए ज्यादा राशि देने की प्रतिबद्धता भी जताई है। फर्म की 2012 की भारत धर्मार्थ रिपोर्ट में कहा गया है कि 2011 में धर्मार्थ कार्यो के लिए दान देने के प्रतिशत में इजाफा हुआ है। वर्ष 2010 में अमीर भारतीयों ने अपनी आमदनी का 2.3 प्रतिशत धर्मार्थ कार्यो के लिए दिया था। भारतीयों की ओर से दिया गया दान उनकी आमदनी के प्रतिशत के हिसाब से काफी अच्छा है, लेकिन इसके बावजूद वे पश्चिमी देशों के अमीरों से इस मामले में काफी पीछे हैं। अमेरिकी दौलतमंद और प्रभावशाली लोग अपनी आय का 9.1 प्रतिशत तक धर्मार्थ कार्यो के लिए दे देते हैं। सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि भारत में सभी आयु वर्गो में धर्मार्थ दान की प्रवृत्ति बढ़ी है। युवा धनी भारतीय आमदनी का मात्र दो फीसद धर्मार्थ कार्यो के लिए देते हैं, वहीं बड़ी उम्र के अमीर 3.9 प्रतिशत आमदनी दान करते हैं। वैसे, 60 प्रतिशत युवा अमीरों का कहना है कि उनकी योजना 2012 में दान की राशि बढ़ाने की है। इस सर्वे में भारत के 400 अमीरों के विचार लिए गए। इनमें उन्हें शामिल किया गया, जिनकी सालाना आमदनी 4 लाख डॉलर से अधिक है। सर्वे में शामिल 60 प्रतिशत 40 साल से कम के हैं, जबकि एक-तिहाई से अधिक 30 साल या उससे कम के हैं। यदि जारी रिपोर्ट के आंकड़ें विश्वसनीय हैं तो भारत जैसे आर्थिक विषमता वाले देश के लिए इसे शुभ संकेत माना जाना चाहिए। देश में रईसों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है यदि उसी तेजी से लोगों में दान की प्रवृत्ति भी बढ़ती जाए तो समस्याओं के जंजाल में जकड़े देश की थोड़ी सी ही सही समस्या दूर तो होगी। हालांकि यह देखने वाली बात होगी कि दान के पैसे कहां जाते हैं और समस्याओं के निवारण में इनका कितनी बुद्धिमता से प्रयोग किया जाता है।

- अविनाश चंद्र