आयकर में राहत के नाम पर वित्तमंत्री की बाजीगरी

आर्थिक मंदी की स्थिति से जूझ रही अर्थव्यवस्था में तेजी लाने का प्रयास पिछले कई महीनों से जारी है। इस प्रयास के तहत कॉर्पोरेट टैक्स में कमी करने से उद्योगों को कुछ राहत अवश्य मिली। लेकिन बाजार में वस्तुओं की मांग अपेक्षानुरूप नहीं बढ़ी। उम्मीद की जा रही थी कि बजट में आम जनता विशेषकर कर दाताओं को बड़ी राहत दी जाएगी जिससे उनके पास पैसे बचे और बाजार में मुद्रा की आवक बढ़े। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 5 लाख तक के वार्षिक आय वालों को जीरो टैक्स, 5 लाख से 7 लाख तक वार्षिक आय पर टैक्स को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने की घोषणा की तो यह एक बड़ी राहत सरीखी थी।

हो भी क्यों न! टैक्स स्लैब को 10 प्रतिशत तक घटाने के फैसले के लिए दिल भी बड़ा होने की जरूरत है और कलेजा भी। 7.5 लाख से 10 लाख तक की आय पर टैक्स की दर 20 प्रतिशत से 15 प्रतिशत करना, 10 लाख से 12.5 लाख तक की आय पर टैक्स को 30 प्रतिशत से 20 प्रतिशत पर लाना और 12.5 लाख से 15 लाख तक के वार्षिक आय पर कर की दर को 25 प्रतिशत करना आयकर सुधार प्रक्रिया की राह में बड़ा और क्रांतिकारी फैसला था। 15 लाख से ऊपर की आय पर 30 प्रतिशत टैक्स के पुराने दर को जारी रखा गया।

हालांकि वेतनभोगी आयकर दाताओं की यह खुशी क्षणिक ही साबित हुई जब पता चला कि नई कर प्रणाली में निवेश पर मिलने वाला छूट प्राप्त नहीं होगा। यदि करदाताओं को विभिन्न मदों में किए गए निवेश की छूट का फायदा लेना है तो उन्हें पुरानी दरों पर ही कर की अदायगी करनी होगी। विदित हो कि वर्तमान में करदाता अपनी वार्षिक आय के हिसाब से आयकर कानून के सेक्शन 80सी, 80सीसीसी, 80सीसीडी, 80डी, 80डीडी, 80डीडीबी, 80यू, 80ईई, 80टीटीए, 80जी, 80जीजी, 87ए, 80ई, 80जीजीसी, 80आरआरबी आदि के तहत 1.5 लाख की छूट हासिल कर सकते हैं जिसमें पीपीएफ/ईपीएफ, पांच वर्ष के बैंक/पोस्ट ऑफिस कर बचत जमा, एनएससी, इक्विटी युक्त बचत योजनाएं, बच्चों का ट्यूशन फी, जीवन बीमा के प्रीमियम, होमलोन (प्रिंसिपल) की देनदारी, नेशनल पेंशन सिस्टम, नए घर की खरीद के लिए स्टॉम्प ड्यूटी चार्ज आदि शामिल होते हैं। टीए, एचआरए, एलटीसी आदि से संबंधित छूट को भी जोड़ लिया जाए तो हिसाब में अधिक का फर्क नहीं पड़ता है।

विशेषकर उन पुराने करदाताओं को जिन्होंने कर में छूट हासिल करने के लिए कई सारे प्लान पहले ही ले रखें हैं। अब यदि वे पु।राने प्लान को बंद कराते हैं तो भी नुकसान और और नहीं कराते हैं तो भी नुकसान

इसलिए आयकर में छूट के माध्यम से आम जनता को राहत और इसके माध्यम से खरीद बिक्री को बढ़ाकर बाजार में मुद्रा के प्रवाह को बढ़ाने का उद्देश्य पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा है। इस प्रकार इसे सीता ताई के आंकड़ों की बाजीगरी कहना ही अधिक तार्किक प्रतीत होता है। हालांकि इस बात से राहत महसूस की जा सकती है कि करदाताओं के पास दोनों विकल्प मौजूद रहेंगे और वे नए या पुराने स्लैब में से किसी भी स्लैब को चुनने के लिए स्वतंत्र होंगे।