बीता दशक और आता दशक

हमारा पिछला दशक मूल्यों के कंफ्यूजन का दशक था। मैं उम्मीद करता हूं कि आगामी दस सालों में हम अपने मूल्यों को लेकर सुस्पष्ट हो पाएंगे। खास तौर पर हमारी नई पीढ़ी के लिए यह बहुत जरूरी है। जब मूल्य स्पष्ट और निर्धारित होते हैं तो हम लोगों को यह बता सकते हैं कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए। तमाम घोटाले और घपले मूल्यों के अभाव में ही होते हैं।

नए दशक की दहलीज पर खड़े होकर एक कॉलम लिखना चुनौतीभरा काम है। एक सीमित स्थान में पिछले दस सालों का लुब्बेलुआब पेश करना या आगामी दस सालों के बारे में पूर्वानुमान लगाना आसान नहीं। बहरहाल, मैं अपना ध्यान उन घटनाओं पर केंद्रित नहीं करूंगा, जो बीते दशक में घटी हैं या आगामी दशक में घट सकती हैं, क्योंकि उस बारे में पहले ही काफी बातें हो रही हैं। मुझे लगता है यह हमारे लिए एक अच्छा अवसर है कि नए दशक का स्वागत करते समय हम इस बारे में विचार करें कि पिछले दस सालों में भारत की संस्कृति में क्या परिवर्तन आए हैं और आने वाले समय में उसमें क्या परिवर्तन आने चाहिए।

किसी भी व्यक्ति के जीवन में एक दशक लंबा समय होता है। संभव है इस अवधि में उसका विवाह हुआ हो, वह पिता बना हो, उसने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली हो या अपना जॉब या शहर बदल लिया हो। मुझे पूरा भरोसा है कि आज आपके लिए स्थितियां वे ही नहीं हैं, जो वर्ष 2000 में थीं। लेकिन जब बात किसी देश या समाज की होती है तो उसके लिए एक दशक की अवधि कोई बहुत लंबी नहीं कही जा सकती। यह सच है कि संस्कृतियां बदलती हैं, लेकिन लोगों की सोच और उनके नजरिये में बदलाव बहुत धीरे-धीरे आता है। संस्कृति का मतलब केवल हमारा खानपान, हमारी कलाएं और परंपरा ही नहीं होता। एक विस्तृत अर्थ में संस्कृति हमें, हमारे जीवन व्यवहार और हमारे सामाजिक मानकों को प्रभावित करती है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हमारी संस्कृति में वे अप्रत्यक्ष नियम सम्मिलित होते हैं, जो हमारे जीवन का निर्माण करते हैं। जो हमारे जीवन की बुनियाद हैं। ये हैं हमारे मूल्य। उदाहरण के तौर पर यह कहा जा सकता है कि संपदा, प्रतिस्पर्धा, वैयक्तिकता और धर्म अमेरिका के मूल्य हैं। ये मूल्य अमेरिकी समाज और संस्कृति की बुनियाद हैं। जब हम भारतीय मूल्यों की बात करते हैं, तो हम कुछ निजी मूल्यों के बारे में विचार करते हैं, जैसे परिवार, धर्म और बुजुर्गो का सम्मान। ये भारतीय मूल्य हैं। लेकिन अगर हम पूछें कि भारत के सामान्य मूल्य क्या हैं तो हमें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलेगा। हम संपदा को महत्व देते हैं या शिक्षा को? हम लोकतंत्र को महत्व देते हैं, जिसमें जनता के हाथ में मताधिकार की ताकत होती है या हम किसी ऐसी प्रणाली को महत्व देते हैं, जिसमें कुछ चुनिंदा लोगों को सत्ता सौंप दी जाती है और जिन पर कोई नियम-कायदे लागू नहीं होते? क्या हम ईमानदारी को महत्व देते हैं या हम येन-केन-प्रकारेण अपना काम करवाने में विश्वास रखते हैं? हम मितव्ययिता और किफायत को महत्व देते हैं या धन-दौलत और संपदा के भौंडे प्रदर्शन को? हम अपनी स्थानीयता को महत्व देते हैं या अपनी राष्ट्रीय पहचान को?

इन सवालों के जवाब देना आसान नहीं है। अगर हम वर्तमान समय में अपने देश की स्थिति को गौर से देखें तो हम पाएंगे कि हमारे सामने संघर्षो से भरे हुए कुछ उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि ये सवाल कितने कठिन हैं? विद्वान इन सवालों के जवाब देने में खुद को असमर्थ पाते हैं, इसलिए वे अपनी सहूलियत के लिए कह देते हैं कि एक ही भारत के भीतर कई तरह के भारत हैं। कुछ विद्वान रूमानी अंदाज में यह भी कह देते हैं कि एक देश के रूप में यही तो भारत की खूबसूरती है कि यहां कुछ भी ऐसा नहीं है, जो पूर्व निर्धारित हो या जो एक तय सांचे में ढला हुआ हो।

वे अपनी धारणाओं को चाहे जो कहें, लेकिन मैं इसे उनका कंफ्यूजन कहता हूं। मूल्य कभी भी अप्रत्याशित और अनिर्धारित नहीं होते। अस्थिर और उथल-पुथल भरे समय में भी मूल्य निरंतर स्थायी बने रहते हैं। हमारा पिछला दशक मूल्यों के कंफ्यूजन का दशक था। मैं उम्मीद करता हूं कि आगामी दस सालों में हम अपने मूल्यों को लेकर सुस्पष्ट हो पाएंगे। खास तौर पर हमारी नई पीढ़ी के लिए यह बहुत जरूरी है। जब मूल्य स्पष्ट और निर्धारित होते हैं तो हम लोगों को यह बता सकते हैं कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए और कौन-सी चीजें ऐसी हैं, जो किए जाने योग्य हैं। मूल्य हमें बताते हैं कि क्या अच्छा और क्या महत्वपूर्ण है। वे समाज को एक सूत्र में बांधकर रखते हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि मूल्यों के बिना कोई भी समाज एकीकृत नहीं रह सकता। वह विघटन की राह पर आगे बढ़ सकता है। भारत जैसे देश में तो विघटन का खतरा हमेशा मौजूद रहता है। धर्मप्रमुखों का मानना है कि मूल्यों के बिना मनुष्य के जीवन का कोई अर्थ नहीं है। दुनियाभर के सुख हमें भीतरी संतोष नहीं दे सकते। घोटाले और घपले भी मूल्यों के अभाव में ही होते हैं।

तो फिर आखिर हम भ्रम की स्थिति में क्यो हैं? हमसे कहां गलती हुई है? ऐसा क्यों है कि धार्मिक देश होने के बावजूद हम अपने मूल्यों में विश्वास नहीं बनाकर रख पाए? भारत ऐसा देश है, जहां गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी अपने मूल्यों के कारण महापुरुष कहलाए। इसका मतलब यह है कि हमारा समाज अच्छाई को परखना जानता है। अगर भारतीयता के मूल्यों में हमें सुस्पष्टता नहीं मिलती है तो उसके पीछे कारण कुछ और है। मात्र छह दशक पहले भारत का स्वरूप अलग था। हम रियासतों में बंटे हुए थे, जिन पर अंग्रेजों का राज था। जब अंग्रेज चले गए तो हमने अपना एक बड़ा हिस्सा विभाजन में गंवा दिया। हमारी सभी रियासतों का एक ही साझा मूल्य था और वह यह था कि अंग्रेज भारत छोड़कर चले जाएं। लेकिन जब अंग्रेज चले गए, तो उसके बाद भी हम मूल्यों के एक संशोधित संस्करण पर कभी पूरी तरह सहमति नहीं बना पाए। इन छह दशकों में भारत ने आधुनिकता के संदर्भ में खुद को परिभाषित करने की कोशिश की है, लेकिन हमें अब भी एक लंबा सफर तय करना है। आज हमारे समाज के विभिन्न वर्गो-उपवर्गो के अपने-अपने मूल्य हैं, जो हमें अपना एक राष्ट्रीय मूल्य निर्धारित करने में मदद नहीं करते। नतीजा कंफ्यूजन।

नए दशक में दाखिल होने के बाद यह कार्यसूची तैयार की जाएगी कि हमें कितनी सड़कों, हवाई अड्डों और पॉवर प्लांटों का निर्माण करना है। लेकिन बुनियादी ढांचे पर काम करने के साथ ही हमें अपने मूल्यों को भी निर्धारित करना होगा। नेताओं, चिंतकों-विचारकों और हम सभी को इस एक सवाल का बार-बार सामना करना चाहिए : एक आम भारतीय को अपने जीवन में किस चीज के लिए संघर्ष करना चाहिए? हाल-फिलहाल तो इस सवाल का कोई आसान जवाब दे पाना संभव नहीं है। लेकिन यदि हम लगातार इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश करते रहें और सही उत्तर प्राप्त करने में अपना योगदान देते रहें तो हम उसे जरूर खोज निकालेंगे। इस बुनियादी सवाल का जवाब ही हमारे संविधान, हमारे कानून और एक देश व समाज के रूप में हमारी दिशा तय करेगा। अगले दस साल में भारत की आर्थिक तरक्की जारी रहेगी, लेकिन यदि हम इस आगामी दशक में अपने सामान्य मूल्यों पर भी ध्यान केंद्रित कर सकें तो यह निश्चित ही एक सुखद नया दशक होगा।

- चेतन भगत