सेंसरशिप के बढ़ते कदम

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  न होने की तुलना में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों गुना बेहतर होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आत्यंतिक महत्व को प्रतिपादित करने के लिए चार्ल्स ब्रेडला के इस उद्धरण का अक्सर हवाला दिया जाता है। लेकिन हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है। हमारे देश की सरकार और अदालतें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित दुरूपयोग को रोकने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही नकेल कसने पर आमादा हैं। वे शायद यह भूल गए हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। उसके बगैर लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हम अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं लेकिन हमारे देश की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों में अक्सर तानाशाहों की आत्माएं घुस जाती हैं और वे बोलने की आजादी को जंजीरों में जकड़ने के हसीन सपने पालने लगती हैं। इन दिनों हमारी सरकार पर इंटरनेट पर अपना शिकंजा कसने का खब्त सवार हो गया है।

निकम्मी और भ्रष्ट सरकारों को हमेशा ही आभिव्यक्ति की आजादी अपने लिए सबसे बड़ा खतरा लगती है। पिछले दिनों भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए अन्ना हजारे के जनआंदोलन को भारी जनसमर्थन मिला है और यह समर्थन जुटाने में सोशल नेटवर्क साइटों ने महत्वबूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा सरकार के कुछ मंत्रियों और कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ बहुत तीखी प्रतिक्रियाएं टिप्पणियां और कार्टून देखने को मिले। दिग्विजय सिंह ने कुछ वेबसाइटों पर मुकदमा दायर कर दिया है। तबसे सरकार सोशल नेटवर्क साइटों से खौफ खाने लगी है और उसे उनपर अंकुश लगाने की जरूरत महसूस होने लगी है। सबसे पहले केंद्र सरकार के मंत्री कपिल सिब्बल ने सोशल नेटवर्क साइटों पर लगाम लगाने का इरादा जाहिर किया था। लेकिन जब इसका बेहद विरोध हुआ तो सरकार लीपापोती करने लगी। कई क्षेत्रों में यह आशंका जताई जा रही है कि अब सरकार अदालतों के जरिये अपना इरादा पूरा करने की कोशिश रही है। सरकार का नापाक इरादा तो फिर भी समझ में आ सकता है लेकिन अदालतें क्यों उसकी इस मुहिम का हिस्सा बन रही हैं यह समझ से परे है। शायद वे कानूनों के प्रति बहुत तकनीकी रवैया अपना रही है।

यह सारा नजारा देखकर यह लगता है कि भारत सोशल नेटवर्क साइटों को सेंसर करने के मामले में चीन के नक्शेकदम पर चल रहा है। लेकिन हम भूल गए है कि हमारा देश लोकतांत्रिक देश है जबकि चीन साम्यवादी और अधिनायकवादी देश है जहां अभिव्यक्ति की आजादी नाम की कोई चीज ही नहीं है। उसके रास्ते पर चल कर तो हम अपने पैरों पर कुल्हाडी मार लेंगे। भारत की ताकत तो उसकी लोकतांत्रिक चेतना ही है। इंटरनेट से जन्मी सोशल नेटवर्क साइटों और न्यू मीडिया की विशेषता यह है कि उसने लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी को व्यापक और सशक्त बनाया है। अब लोगों के पास जानकारी जुटाने और अपनी बात कहने के लिए ज्यादा प्रभावी साधन है। अब जिस किसी के पास एक अदद कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन है वह वेबसाइटों से दुनियाभर की जानकारी इकट्ठा कर सकता है। अखबार और टीवी जैसे परंपरागत मीडिया का सहारा लिए बगैर अपनी बात दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचा सकता है। अब वह अपनी अभिव्यक्ति को दूसरों तक पहुंचाने के लिए अखबारों के संपादकों की मेहरबानी या टीवी एंकरों का मोहताज नहीं है। इंटरनेट साइटों पर लोग केवल अपने विचार प्रगट भर ही नहीं करते वरन दुनियाभर के विषयों पर बहस भी करते हैं और ये बहसें बहुत तीखी,जीवंत और विचारोत्तेजक होती है। बहस के ऐसे खुले मंच कम ही देखने को मिलते हैं। सारे मानव इतिहास में आम लोगों को अभिव्यक्ति का ऐसा अद्भुत माध्यम कभी नहीं मिला था। ये आलोचनाएं और बहसें लोकतंत्र को और ज्यादा सार्थक और मजबूत बनादी है। इस तरह लोगों की लोकतांत्रिक चेतना को विकसित करने में सोशल नेटवर्क साइटों की भूमिका है इसलिए भारत जैसे लोकतांत्रिक देश को उसे बढ़ावा देना चाहिए था नकि उसे नियंत्रित करने की कोशिश करनी चाहिए।

लेकिन हो उल्टा रहा है। सरकार ने कहा है कि सोशल साइटस के खिलाफ मुकदमों की अनुमति देगी। एक तरह से वह इन साइटों के खिलाफ कानून का डंडा भांजेगी। सीआरपीसी की जिन धाराओं में सरकार ने सोशल साइटस् के खिलाफ मुकदमें की इजाजत दी है वे बहुत गंभीर हैं। सरकार की दलील है कि इन पर बहुत सारी नफरत फैलानेवाली, लोगों की धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुंचानेवाली, अवमानना करनेवाली सामग्री है। सोशल नेटवर्क साइटों को उसे साइट पर डालने से पहले सेंसर करना चाहिए वरना उनपर मुकदमा चलाना पड़ेगा। सरकार और अदालतों दोनों को यह समझ में नहीं आ रहा कि सोशल मीडिया की साइटस् पर जो सामग्री डाली जा रही है वह किसी की प्रशंसा या आलोचना का कोई संस्थागत प्रयास नहीं होता। वह लोगों के निजी विचार होते हैं जो एक ग्लोबल प्लेटफार्म पर रखे जाते हैं।

सरकार के इस कड़े ऱूख की एक वजह यह भी है कि वह और अदालतें सोशल नेटवर्क साइटों के चरित्र को समझने में असफल रही है। वे उसे पुराने माध्यमों के लिए बनी कसौटियों के आधार पर कस रही हैं जबकि सोशल नेटवर्क साइटों का कहना है कि उन पर आने वाली सामग्री के लिए वे जिम्मेदार नहीं है क्योंकि वह तो केवल मंच प्रदान करती हैं सामग्री तो लोग तैयार करके लगातार भेजते रहते हैं जिसे पहले देख पाना या उसे सेंसर कर पाना संभव नहीं है। लेकिन यह तर्क सरकार के गले नहीं उतर रहा। अभिव्यक्ति की आजादी का तर्क भी सरकार को रास नहीं आ रहा । सरकार और सेसरशिप के समर्थक जवाबी दलील देते हैं कि कोई भी स्वतंत्रता संपूर्ण नहीं होती। उनका यह भी कहना है कि समुदायों के बीच वैमनस्य फैलानेवाली, लोगों की धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुंचानेवाली, लोगों की अवमानना करनेवाली सामग्री सोशल नेटवर्क साइटों पर है जिससे न केवल तनाव पैदा हो सकता है वरन हिंसा भी हो सकती है। लेकिन यह तर्क बहुत लचर है। शायद सरकार यह मानती है कि लोग इतने अज्ञानी हैं कि साइबर स्पेस की ऐसी सामग्री के कारण दंगा फसाद पर उतर आएंगे। कम से कम आजतक तो इस तरह का कोई उदाहरण नहीं मिला है। लेकिन इसका सहारा लेकर सरकार सेंसरशिप लागू करके लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी का हनन जरूर करना चाहती है।

एक अजीब विडंबना यह है कि हमारे जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में हम लोगों की धार्मिक आस्थाओं को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गए हैं। धर्मों की या उनके देवताओं, पैगंबरों और मसीहाओं की आलोचना करना उन पर व्यंग्य करना, धर्म के कर्मकांड़ों की निंदा करना अपराध बनता जा रहा है। यह कहा जाने लगा है आप लोगों की आस्थाओं को ठेस नहीं पहुंचा सकते। जबकि आभिव्यक्ति की आजादी में आलोचना, निंदा और मजाक उड़ाने और व्यंग्य करने की आजादी निहित है। यदि ये आजादी न हो तो अभिव्यक्ति की आजादी दो कौडी की है। दरअसल धर्मों को अनावश्यक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए वे भी एक तरह कि विचारधाराएं ही है। उनकों भी हरेक को तर्क की कसौटी पर कसा जाना चाहिए। कुछ भी तर्क और आलोचना के परे नहीं हो सकता। फिर कुछ धर्म के बुनियादी सिद्धांत ही ऐसे हैं जो दूसरे धर्म के विरोधी है मसलन इस्लाम और आर्यसमाज मूर्तिपूजा के घोर विरोधी है वे अगर अपने धर्म का प्रचार करेंगे तो वह अपने आप में सतानत धर्म की निंदा आलोचना होगी तो क्या उन्हें अपने धर्म के प्रचार करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए। जाहिर है उन्हें उपने धर्म की बात कहने की आजादी होनी चाहिए तो दूसरों को उसका शांतिपूर्र्ण विरोध करने की और दोनों को बहस के द्वारा सत्य का स्वरूप जानने की कोशिश करना चाहिए । हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है –वादे –वादे जायते तत्वबोध:यानी वाद विवाद से ही सत्य निकलता है। कई बार तो ऐसा लगता है कि हमारे देश में सांप्रदायिक दंगे इसलिए ज्यादा होते हैं क्योंकि हमने धार्मिक मुद्दों पर बहस करना छोड़ं दिया और दंगे करके अपनी भड़ास निकालते हैं।

हाल ही में हमें इस तरह के उदाहरण बार-बार देखने को मिल रहे हैं। कुछ उग्रवादी या धार्मिक कट्टरतावादी ताकते हमें झुकने के लिए कहती है और हम रेंगने लगते हैं। इसलिए हाल के कुछ बर्षों के दौरान ऐसे दर्जनों उदाहरण मिल जाएगे जब हमारी सरकार और सिविल सोसाइटी उसे तमाशबीन बनकर देखते रहे या कहीं न कहीं इस घिनौने कृत्य के भागीदार बन गए। तसलीमा नसरीन का मामला हो या एमएफ हुसैन का, अहमदिया की कुरान प्रदर्शनी का सवाल हो या सलमान रूशदी का। हर बार यह साबित हो गया कि या तो अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर हम कंफ्यूज हैं या फिर हमारी प्रतिबद्धता ढुलमुल है। तभी तो हर बार लोकतंत्र की दुहाई देनेवाले राजनीतिक दलों में से किसी ने भी सरकार से अपील नहीं की कि उसे रूशदी की भारत यात्रा सुरक्षित हो इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। चंद कट्टरतावादियों के कारण ऱूशदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नजरंदाज नहीं किया सकता। लेकिन सारे राजनीतिक दलों की नजरें चुनावी वोटों पर है इसलिए सबने अवसरवादिता का परिचय देते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों को तिलांजलि दे दी। लेकिन यदि हम अपने देश में लोकतंत्र को उसके वास्तविक अर्थों में जीवित रखना चाहते हैं तो हमें उसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए और सतत जागरूकता ही लोकतंत्र की कीमत है।

- सतीश पेडणेकर