शिक्षा

“एपीजे अब्दुल कलाम की नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का अवसर” देने के लिए द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 400 छात्रोँ के लिए स्कॉलरशिप की शुरुआत की है ताकि उन्हे बेहतरीन शिक्षा हासिल हो सके। यह एक सराहनीय कदम है, लेकिन देश की बढ़ती आबादी और शिक्षा प्राप्त करने के उम्मीदवार छात्रोँ को संख्या की तुलना में यह बेहद कम है। यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि हमारे देश की आने वाली युवा पीढ़ी अच्छी शिक्षा हासिल करने और अपनी क्षमताओँ के अनुकूल अवसर पाने हेतु धर्मार्थ पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। यह सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

जर्मनी में किसी ऐसे छात्र को ढूंढना जो शिक्षा को एक बोझ समझता हो, किसी चुनौती से कम नहीं है। हाल ही में संपन्न हुई जर्मनी की मेरी यात्रा के दौरान ऐसे किसी छात्र को ढूंढना मेरी यात्रा का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया था जबकि मैं वहां एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला ‘क्राइसिस इन एजुकेशन – ए लिबरल वे फॉरवर्ड’ में शामिल होने के लिए गया था। इस कार्यशाला का उद्देश्य पब्लिक पॉलिसी से लेकर नवोचार युक्त खेलों को तैयार करने जैसे शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत 16 देशों के 26 प्रतिस्पर्धियों के मध्य परस्पर संवाद स्थापित को प्रोत्साहित करने के लिए एक मंच

गुरुग्राम स्थित रेयान इंटरनेशनल स्कूल के छात्र प्रद्युम्न की स्कूल परिसर में हुई हत्या और शुरूआती जांच में स्कूल बस कंडक्टर का नाम सामने आने के बाद से जिस प्रकार गैरशैक्षणिक कर्मचारियों विशेषकर ड्राइवरों और कंडक्टरों के साथ सुरक्षा के नाम पर दोयम व्यवहार किया जाने लगा उससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है..

1.3 बिलियन आबादी के साथ भारत की समस्या भी काफी बडी है, यहाँ 1 बिलियन लोग प्रतिदिन 2 डॉलर्स से कम कमाते हैं, 30 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 बच्चोँ के जन्म पर 45 है और मातृत्व मृत्यु दर 1,00,000 जन्म पर 175 है।इन सारी समस्याओँ का समाधान सिर्फ सरकार ही कर सकती है जो कुल जीडीपी का 18% टैक्स के रूप में वसूल करती है। राज्य और केंद्र द्वारा हर साल 40 लाख करोड रुपये खर्च किया जाता है। सरकार के पास प्रमुख समस्याओँ के समाधान हेतु पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन खर्चँ के प्रभावी सिस्टम के अभाव, सरकारी खर्चोँ की उत्पादकता में कम

पिछ्ले हफ्ते आई एक न्यूज रिपोर्ट ने काफी खलबली मचा दी थी, जिसमेँ नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा था कि स्कूल, कॉलेज और जेलोँ को निजी क्षेत्र के हवाले कर देना चाहिए। जैसा कि पहले से पता था, उनके इस वक्तव्य पर बवाल तो मचना ही था, अधिकतर लोग इस क्षेत्रोँ के निजीकरण की बात सुनकर नाराज हुए, परिणाम्स्वरूप कांत को यह स्पष्ट करना पड़ा कि वह सिर्फ स्कूलोँ के भौतिक संसाधनो में निजी क्षेत्र की भागीदारी की बात कर रहे थे।

निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से लागू किए गए शिक्षा का अधिकार कानून के कारण देश यूनिवर्सल इनरॉल्मेंट के लक्ष्य के करीब तो पहुंच गया लेकिन गुणवत्ता युक्त शिक्षा अब भी हमारे यहां दूर की कौड़ी है। छात्रों के सीखने के स्तर व गुणवत्ता को जांचने वाले अंतर्राष्ट्रीय‘प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पिसा)’कार्यक्रम में भारत 74 प्रतिभागी देशों में 72वें स्थान पर रहा। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर) के मुताबिक वर्ष 2010 में सरकारी स्कूलों के चौथी कक्षा के 55.1 फीसदी बच्चे कम से कम घटाव के सवाल हल कर लेते थे, लेकि

समाज के कमजोर तबके की सुरक्षा सुनिश्चित करना हर सभ्य समाज की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। भारत के संदर्भ में बात करेँ तो यहाँ बच्चोँ, महिलाओँ और अल्पसंख्यकोँ की सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सरकार और पूरे समाज के हाथ में है। यहाँ महिलाओँ की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मामले में कई महत्वपूर्ण बाधाएं हैं क्योंकि यहाँ तमाम तरह के पितृसत्तात्मक नियम बना दिए गए हैं जिन्हेँ न सिर्फ महिलाओँ की अधिकतर हिस्से बल्कि तकरीबन सभी पुरुषोँ का समर्थन हासिल है। लेकिन बच्चोँ की सुरक्षा के मामले में सरकारी मशीनरी की शिथिलता, भ्रष्टाचार और जांच के निष्क्रिय व पुरा

वर्ष 2018 के लिए बजट पेश करने का समय नजदीक आ गया है। पूर्ण बजट पेश करने का यह मोदी सरकार के कार्यकाल का आखिरी मौका होगा। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और वित्त मंत्री का ध्यान सभी को खुश करने पर होगा। आर्थिक प्रगति और विकास का नारा देकर सत्ता में आयी मोदी सरकार का ध्यान शुरू से ही शिक्षा पर भी रहा है। नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसी एजेंडे के तहत शुरू किया गया था हालांकि इसमें अबतक सफलता नहीं मिल सकी है। स्मृति ईरानी को केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय से हाथ धोना पड़ा और प्रकाश जावड़ेकर को बड़ी उम्मीदों के साथ यह जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके

- सरकार खुद यह स्वीकार कर चुकी है कि आधार कार्ड के इस्तेमाल से 60,000 करोड रुपये बचे हैं, इसका मतलब है कि सिस्टम में तमाम खामियाँ हैं। 
- सरकार हर बच्चे की स्कूलिंग पर साल में कम से कम 25,000 रुपये खर्च करती है। इसके बावजूद सरकारी स्कूल अच्छी शिक्षा देने में असफल हैं, इसके लिए डिलिवरी सिस्टम ही जिम्मेदार है।

देश में शिक्षा का अधिकार कानून तो लागू हो गया और स्कूलों में छात्रों के नामांकन की संख्या भी वैश्विक संख्या के आसपास पहुंच गई, लेकिन छात्रों के लिए गुणवत्ता युक्त शिक्षा अभी भी दूर की कौड़ी साबित हो रही है। तमाम सरकारी व गैर सरकारी संस्थानों द्वारा जारी आंकड़ें यही बताते हैं कि 8वीं कक्षा के छात्र चौथी और पांचवी कक्षा की किताबें भी नहीं पढ़ पाते। इसके कई कारण हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण सरकारी स्कूलों के अध्यापकों में जवाबदेही की कमी है। इस समस्या के समाधान के लिए थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी छात्रों को डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर माध्यम के तहत स्कूल वाऊचर उपलब्ध कराने की हिमायत करता है..।

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