शिक्षा

मोदी सरकारी द्वारा नई शिक्षा नीति के मसौदे को तैयार करने के लिए गठित के. कस्तूरीरंगन कमेटी को हाल ही में चौथा विस्तार प्रदान किया गया है। अब इस कमेटी के पास नई शिक्षा नीति से संबंधित फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 15 दिसंबर तक का समय होगा। इसके पूर्व कमेटी को तीसरा कार्य विस्तार 30 अक्टूबर तक के लिए प्रदान किया गया था। मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने सरकार को ‘जीरो ड्रॉफ्ट’ सौंप दिया गया था, लेकिन सरकार की मंशा शायद इसे आम चुनावों तक टालने की ही प्रतीत होती है। खैर..

● स्कूल स्थापित करने और चलाने के लिए आवश्यक मौजूदा कठोर नियमोँ को जितनी जल्दी हो सके आसान किया जाना चाहिए
● शिक्षा के क्षेत्र में नव प्रवेशियों के लिए सरकार को ‘स्कूल खोलने और चलाने की सुगमता’ रैंकिंग अभियान की शुरूआत करनी चाहिए और स्कूलों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने के नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव करना चाहिए

● प्राइवेट स्कूल लर्निंग आउटकम के मामले में सरकारी स्कूलोँ से ज्यादा आगे नहीं हैं
● तो सरकारी स्कूलोँ में होने वाले दाखिलों में गिरावट क्यों देखने को मिल रही है?

वर्ष 2010-11 में, 4,435 सरकारी स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन पर 486 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इन सभी स्कूलोँ में 14,000 शिक्षक अधिक थे। और इन सभी 4,435 स्कूलोँ में पढ़ने वाले बच्चोँ की कुल संख्या करीब शून्य थी।

नए साल में नया संकल्प लेने का वक्त आ गया है। ऐसे में मैं एक नियम में सुधार की बात करूंगी, जो मेरे हिसाब से इस साल के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है और वह है शिक्षा क्षेत्र को स्वतंत्रत किया जाए और स्कूलोँ को लाभ कमाने का अवसर दिया जाए।

आरटीई एक्ट लागू होने के बाद से लगातार सरकारी स्कूलों में नामांकन की संख्या घटी है जबकि नामांकन कराने वाले छात्रों की कुल संख्या में तेजी से ईजाफा हुआ है। पर यदि ऐसा है तो बच्चे जा कहां रहे हैं.. ! जी हां, बच्चे जा रहे हैं निजी स्कूलों, विशेषकर ऐसे स्कूलों में जहां फीस तो न्यूनतम है ही गुणवत्ता भी सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर है। ऐसे में सरकार की फजीहत होना लाजमी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वर्ष 2015 में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ योजना की शुरूआत की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य पक्षपाती लिंग चुयन की प्रक्रिया का उन्मूलन, बालिकाओं के अस्तित्व व सुरक्षा को सुनिश्चित करना और उनके लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था करना था। इसके लिए 100 करोड़ रूपए के आरंभिक कोष का प्रावधान भी किया गया। शुरू में इस अभियान के फायदे भी देखने को मिले। सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड हुए ‘सेल्फी विथ डॉटर’ और इसे मिले व्यापक जनसमर्थन ने पिछड़े व ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को भी विश्वास से ओत प्रोत किया। महिलाएं घरों से बाहर निकलने लग

प्राथमिक शिक्षा ऐसा आधार है जिसपर देश तथा इसके प्रत्येक नागरिक का विकास निर्भर करता है। हाल के वर्षों में भारत ने प्राथमिक शिक्षा में नामांकन, स्कूलों में छात्रों की संख्या बरकरार रखने, उनकी नियमित उपस्थिति दर और साक्षरता के प्रसार के संदर्भ में काफी प्रगति की है। जहाँ उन्नत शिक्षा पद्धति को किसी भी देश के आर्थिक विकास का मुख्य योगदानकर्ता तत्व माना जाता है, वहीं भारत में आधारभूत शिक्षा की गुणवत्ता फिलहाल एक चिंता का विषय है। निजी व सरकारी स्तर पर गुणवत्ता सुधार के लिए काफी प्रयास भी हो रहे हैं, लेकिन क्या ये प्रयास पर्याप्त हैं और क्या धरातल

पढ़े-लिखे बेरोजगारों की विशाल फौज को देखकर लोग अनायास ही कह देते हैं कि शिक्षा को 'रोजगार परक' बनाया जाना चाहिए। उनका तात्पर्य यह होता है कि जिन क्षेत्रों में रोजगार की अधिक संभावाएँ हैं, उनसे संबंधित शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। देश के अधिकांश महाविद्यालयों में शिक्षा के नाम पर भाषा, साहित्य, इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र, विज्ञान, आदि विषय ही पढ़ाए जाते हैं। और इन विषयों की डिग्री लेने से किसी को कोई नौकरी मिलेगी, इसका कोई भरोसा नहीं। अत: ऐसे विषयों की पढ़ाई एवं उन पर होने वाले सरकारी खर्च के औचित्य पर प्रश्न उठना लाजिमी है। आखिर शिक्षा को

सिर्फ शिक्षा नहीं गुणवत्तायुक्त शिक्षा आज अभिभावकों की प्राथमिकता सूची में सर्वोपरि है। अपने बच्चों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अभिभावक अपनी आय का बड़ा हिस्सा स्कूली शिक्षा पर खर्च कर रहे हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी, गणित, विज्ञान आदि का समुचित ज्ञान हासिल करें ताकि उनका भविष्य उज्जवल हो सके जबकि तमाम सरकारी व गैरसरकारी शोध बताते हैं कि सरकारी स्कूलों के 8वीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे 3सरी व 5वीं कक्षा की हिंदी व अंग्रेजी की सामान्य पाठ्यपुस्तक को पढ़ने में सक्षम नहीं हैं। दो अंकों के जोड़ व घटाव करने में भी वे असक्षम हैं..

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