शिक्षा

14वर्ष तक की आयु के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया। इस कानून के आने के बाद स्कूलों में छात्रों का नामांकन वैश्विक स्तर (औसतन 95%) के लक्ष्य के पास तो पहुंच गया लेकिन सीखने के परिणामों के मामले में स्तर रसातल में पहुंच गया।

हर कोई जानता है कि भारत में शिक्षा प्रणाली कितनी खराब है – लेकिन कितना अजीब है कि, जब चुनाव होते हैं तो यह एक बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में राज्य की विफलता माता-पिता के वोट देने के तरीके को बदलती नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में गड़बड़ी की स्थिति का सामान्यीकरण हो गया है - जो उदासीनता को स्पष्ट करती है। लेकिन हमारे देश का भविष्य हमारे बच्चों को मिलने वाली शिक्षा पर निर्भर करता है। हमें इसे ठीक करने की जरूरत है।

आश्चर्यजनक है कि तमाम प्रांतीय और राष्ट्रीय आंदोलनों, सत्याग्रहों और क्रांति के लिए जाने जाने वाले भारत देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार को लेकर हुए किसी बड़े जन-आंदोलन का वाक्या याद नहीं आता। कुछ-एक आंदोलन (ज्योतिबा फुले/सावित्री बाई फुले का अभियान) जो शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर बदलाव लाने में कामयाब हुए भी तो उनका प्राथमिक उद्देश्य महिला उत्थान, समाज सुधार अथवा वर्ण/जाति व्यवस्था में बदलाव ज्यादा रहा। स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात के काल में भी कुछ बड़े आंदोलन अवश्य हुए लेकिन उनकी परिणति भी राजनैतिक बदलाव अधिक और शैक्षणिक सुधार कम

कोई भी राष्ट्र तब तक प्रगति और उन्नति नहीं कर सकता जब तक कि सभी बच्चों के लिए अच्छे स्कूल न हों। ऐसे में और स्कूलों का होना लाजमी है। ढेरों नए सरकारी स्कूलों के आने की उम्मीद बहुत कम है, क्योंकि हमारे यहां के सत्ताधारी स्कूलों और अन्य सामाजिक ज़रूरतों पर खर्च करने के बजाए वोट पाने की उम्मीद में लोकलुभावने ‘लॉलीपॉप’ देने के प्रति अधिक आशक्त हैं।

मैं एक अभिभावक हूं और अपने बच्चे की शिक्षा और व्यापक शिक्षा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण हितधारक हूं। मेरी आवाज नहीं सुनी गई।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल अगले चार महीने में पूरा करने जा रही है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि सरकार इन पांच वर्षों में क्या हासिल करने में सफल रही। सरकार ने कई क्षेत्रों में सुधार पेश किए हैं लेकिन देश भर में स्कूली शिक्षा प्रणालियों में एक बड़ा बदलाव लाने में विफल रही है।

दिल्ली के कम शुल्क वाले बजट स्कूल सरकार से सहयोग की उम्मीद रखते हैं जबकि बदले में उन्हें नियमन संबंधी बाधाएं ही मिलती हैं। स्कूल संचालक सभी नियमों का पालन करना तो चाहते हैं लेकिन दिक्कत उन नियमनों को पूरा करने की कठिन प्रक्रिया है। इस मुद्दे पर दिल्ली के बजट स्कूलों के प्रतिनिधि से विस्तृत बातचीत के कुछ मुख्य अंश.. - आजादी.मी

- अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतियोगिता में ‘ड्रीमर्स ऑफ ब्रेसवाना’ और ‘ब्रिंगिग स्कूल्स वेयर देयर इज नन’ को क्रमशः दूसरी और तीसरी श्रेष्ठ फिल्म का खिताब

- एडुडॉक फेलो वर्ग में विकिरण को श्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म का पुरस्कार

क्या देश की शिक्षा व्यवस्था अबतक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है? क्या ऐसा नीति निर्माताओं की बुरी नीयत का परिणाम है? या यह सेक्टर बुरी नीतियों का परिणाम भुगत रहा है? क्या सुधार के लिए सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रयास सही दिशा में जा रहे हैं?? इन सब का जवाब ढूंढने के लिए आइए जानते हैं विशेषज्ञों का क्या मानना है..

आजादी.मी

देश में सभी छात्रों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा आसानी से, पड़ोस में और कम खर्च में प्राप्त हो सके, अफोर्डेबल अर्थात बजट स्कूलों का यही ध्येय है। स्वप्रेरित एडुप्रेन्योर्स (शिक्षा प्रदाता) इसी उद्देश्य से काम करते हैं लेकिन सरकारी तंत्र और नियमन संबंधी बाधाएं उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं। कम से कम बजट स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा का यही मानना है। इस वीडियो में देखिए कुलभूषण शर्मा और क्या क्या आरोप सरकार और सरकारी तंत्र पर लगा रहे हैं.. आजादी.मी

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