शिक्षा

एक डोर में सबको जो है बाँधती, वह हिंदी है।
हर भाषा को सगी बहन जो मानती, वह हिंदी है।

भरी-पूरी हों सभी बोलियां, यही कामना हिंदी है।
गहरी हो पहचान आपसी, यही साधना हिंदी है।

तत्सम, तद्भव, देश विदेशी, सब रंगों को अपनाती,
यही भावना हिंदी है।

दिल्ली एक बार फिर से मिशन मोड में है। यह मिशन है ‘मिशन नर्सरी एडमिशन’। नवंबर के अंतिम सप्ताह में नर्सरी दाखिलों के लिए गाइडलाइंस जारी होने के साथ ही अभिभावकों की दौड़ शुरू हो गई है। दौड़ अपने बच्चों को एक अदद ‘बढ़िया’ स्कूल में दाखिला दिलाने की है। यह सिर्फ घर से ‘पसंद’ के स्कूल तक की ही दौड़ नहीं है, यह दौड़ है उन सभी संभावित विकल्पों को आजमाने की जो उन्हें मनपसंद स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करा सके। इस दौरान अभिभावकों को जिस आर्थिक, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है ये सिर्फ वही जानते हैं। हालांकि गाइडलाइंस जारी करते समय प्रत्ये

काफी इंतजार के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2019 का मसौदा आखिरकार जारी हो ही गया। यह मसौदा 484 पृष्ठों का व्यापक दस्तावेज है जिसे तैयार होने में चार वर्षों का समय लगा। इस मसौदे में स्कूली शिक्षा के संबंध में व्यक्तिगत तौर पर सुझायी गई कुछ अति उत्कृष्ट सिफारिशें भी शामिल हैं। इन सिफारिशों में शिक्षकों के प्रशिक्षण और स्कूली शिक्षा प्रणाली में सुधार, राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना, सरकार द्वारा नीति निर्धारक, संचालक, मूल्यांकनकर्ता और स्कूलों के नियामक सभी की भूमिका निभाने की बजाए इनके शासन की भूमिकाओं का पृथक्कीकरण आदि शामिल हैं। सरकार

नीति आयोग द्वारा तैयार किया गया स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स इन दिनों राष्ट्रव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि इस इंडेक्स में अप्रत्याशित जैसा कुछ भी नहीं है। यह इंडेक्स पूर्व में सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर हुए शोधों और उनके आंकड़ों की एक प्रकार से पुष्टि भर ही करता है। वैसे यह इंडेक्स शिक्षा का अधिकार कानून के उन प्रावधानों की भी कलई खोलता है जो स्कूलों को लर्निंग आऊटकम की बजाए बिल्डिंग और प्ले ग्राउंड के आधार पर मान्यता प्रदान करता है। जबकि दुनियाभर के शोध लर्निंग आऊटकम और क्लासरूम के साइज़ के बीच किसी भी प्रकार के संबंध से इंकार

चीन के सबसे अमीर व्यक्ति जैक मा ने कुछ समय पहले विश्व आर्थिक मंच पर कहा था कि आर्थिक तरक्की जारी रखने के लिए हमें अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देने होगी कि वे मशीनों से मुकाबला कर सकें। उनके मुताबिक शिक्षा में सुधार इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। शिक्षा में सुधार को लेकर भारत को इसलिए भी अधिक सक्रियता दिखाने की जरूरत है, क्योंकि उसके जरिये ही आर्थिक रुप से सशक्त हुआ जा सकता है। एक अर्से सेस यह दिख रहा है कि सरकारी और निजी स्कूलों के शिक्षकों के वेतन में अंतर के बावजूद सरकारी विद्यालयों के परिणाम कमतर हैं। इस वर्ष उत्तर प्रदेश ब

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा हाल ही में समस्याओं से घिरा रहा। स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के पूर्व सचिव, अनिल स्वरूप, जिन्होंने शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने वाली समिति को इनपुट प्रदान किए थे, ने इससे जुड़ी कुछ बड़ी समस्याओं के बारे में प्रज्ञानंद दास से बातचीत की:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रस्तुत मसौदे को लेकर आपकी क्या राय है?

निजी स्कूलों की महंगी शिक्षा का मुद्दा राजनैतिक गलियारे में हमेशा से ‘हॉट’ रहा है। पिछले लगभग एक दशक के दरम्यान इस मुद्दे ने इतना गंभीर रुख अख्तियार कर लिया कि इस मुद्दे पर पूरा का पूरा चुनावी अभियान केंद्रीत होने लगा। वर्तमान की दिल्ली सरकार तो राज्य में स्कूलों की फीस को सख्ती से नियंत्रित करने के कदम को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करती है। दिल्ली की देखा देखी महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी, हरियाणा, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों ने अपने यहां फीस नियंत्रण कानून लागू कर दिए हैं और कई अन्य राज्य इसी प्रकार का कानून लागू करने की दिशा

इस बात से कोई भी इंकार नहीं करेगा कि गुणवत्ता युक्त शिक्षा ही 21वीं सदी के भारत की दशा और दिशा तय करेगी। केंद्र और राज्य सरकारें भी अब इस ओर काफी गंभीर दिखाई प्रतीत होती हैं। मोदी सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसकी एक बानगी है। हालांकि देश में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था विशेषकर प्राथमिक शिक्षा की हालत में सुधार होने की बजाए खराबी ही आई है।

भारत बहु विविधताओं वाला देश है। अर्थात यहां की भौगोलिक और पारिस्थितिक स्थिति, रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, भाषा-संस्कृति, जरूरतें आदि लगभग सभी चीजों में भिन्नताएं हैं। यह एक ऐसी अनूठी विशेषता है जिसपर प्रत्येक देशवासियों को गर्व है और हम सभी का यह फर्ज है कि इस विशेषता को सहेज कर रखें। किसी दार्शनिक ने जब ‘एक कमीज सभी पर बराबर नहीं अंट सकती’ (वन शर्ट डज़ नॉट फिट ऑल) का दर्शन प्रस्तुत किया होगा तो कहीं न कहीं हमारे देश की विविधताएं उसके जेहन में अवश्य रही होगी।

शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों के लाभ दीर्घकाल में दिखाई पड़ते हैं साथ ही इसके लिए निरंतर प्रयास की जरूरत होती है। इसके परिणाम अक्सर आम मतदाताओं के समझ के बाहर होते हैं और राजनीतिक दलों के लिए उन कार्यों का श्रेय लेना भी बहुत मुश्किल होता है। जाहिर है, लोग शिक्षा में बहुत अधिक बदलाव या सुधार की उम्मीद नहीं करते हैं। शिक्षा के मोर्चे पर राज्य की विफलता व्यापक तौर पर स्वीकृत है।

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