शासन

‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

जब नीतियां करोड़ों लोगों को भोजन, जो पहले भी भरपेट नहीं मिलता था, में कटौती करने के लिए मजबूर करती हैं, ऐसे में क्या उन पर चर्चा हो सकती है? जब नीतियां लोगों के अधिकारों को रौंदती हैं, और लोग अपने अधिकारों की बहाली के लिए अदालतों की शरण में जाते हैं, तब अदालतें क्या करें, प्रधानमंत्री?

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हाउसिंग ऐंड लैंड राइट्स नेटवर्क के भारतीय चैप्टर द्वारा तैयार और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस ए.पी. शाह द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक, 2003 में भारत के राष्ट्रमंडल खेल के बिड डॉक्युमेंट में मेजबानी की लागत का अनुमान 1,899 करोड़ रु. का लगाया गया था. कई संशोधनों के बाद सरकारी आंकड़ों के बाद अनुमान 10,000 करोड़ रु. पर पहुंच गया है जबकि स्वतंत्र सूत्र इसे 30,000 करोड़ रु. बताते हैं. इन आंकड़ों के साथ 2010 के खेल अभी तक के सबसे महंगे राष्ट्रमंडल खेल साबित होंगे.

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दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ

भारत एक बार फिर सबसे भ्रष्ट देशों की सूची में है। भ्रष्टाचार विरोधी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक इस बार इस सूची में भारत का 84वां स्थान है। विश्व के सबसे भ्रष्ट और सबसे ईमानदार देशों से जुड़ी इस सालाना रिपोर्ट को 17 नवंबर के बर्लिन में जारी किया गया। पेश है भ्रष्टाचार के कारणों और परिणामों की विवेचना:

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यूरोप और अमेरिका में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या कम होती जा रही है, भारत में यह बढ़ रही है

‘‘सोवियत संघ के पतन और शीत युद्ध के अंत के बाद बर्लिन की दीवार एकमात्र बाधा नहीं थी जो दूर हुई बल्कि इसके साथ ही धन, व्यापार, लोगों और विचारों के प्रवाह को बाधित करने वालो अवरोधों का भी पतन हो गया।’’

भारत को ऐसे थिंक टैंकों की जरूरत है, जो असरकारी, कम खर्चीले और टिकाऊ नीतिगत समाधानों की खोज कर सके. -पार्थ जे शाह

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