शासन

ताकत हासिल कर लेना एक बात है और उसका इस्तेमाल करना दूसरी। पिछले दिनों जब दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भेंट हुई तो यह दो निराश नेताओं की भेंट थी। ओबामा जहां अमेरिका में मध्यावधि चुनावों में नाटकीय हार से हैरान थे, वहीं मनमोहन सिंह एक के बाद एक हो रहे घोटालों के खुलासों से परेशान थे।

Author: 
गुरचरण दास

बिहार में नीतीश कुमार की लहर चली है। उन्हें इस बार जीत पांच साल पहले के विधानसभा चुनाव और पिछले साल के लोकसभा चुनाव से भी बड़ी मिली है। पिछले साल भी उनके नेतृत्व वाले एनडीए को 171 विधानसभा सीटों पर बढ़त मिली थी। मगर अब आंकड़ा उसके पार चला गया है।

बेशक, विजेता के जयगान की परंपरा के तहत अब बिहार के चुनाव नतीजों को नीतीश कुमार और उनके गठबंधन के दावों के नजरिए से देखा जाएगा। और इसे विकास की जीत बताया जाएगा। जीत इतनी बड़ी है कि इस वक्त इस दावे को चुनौती देने की हिम्मत शायद ही कोई दिखा सके। लेकिन इस दावे को चुनौती दिए जाने की जरूरत है।

यह ठीक है कि लालू-राबड़ी राज के आखिरी पांच वर्षों में बिहार में जैसी अराजकता रही और विकास के साधारण पैमानों की जैसी अनदेखी की गई, उसकी तुलना में नीतीश कुमार के राज में हालत में सुधार हुआ। कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार शायद उनकी सबसे बड़ी कामयाबी रही। इसके अलावा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण और लड़कियों को साइकिल बांटने जैसे प्रगतिशील कदमों ने भी उनकी लोकप्रियता बढ़ाई। मगर यह जीत सिर्फ ऐसे कदमों का नतीजा नहीं है।

हाल ही में अमेरिका के ओहायो प्रांत के गवर्नर स्ट्रीकलैंड ने नौकरियों के सृजन के लिए उन कंपनियों के लिए आउटसोर्स पर प्रतिबंध लगा दिया जिन्हें सरकारी फंड्स के जरिए मदद नहीं पहुंचाई जाती है। ओहायो के गवर्नर के इस फैसले का भारत में काफी विरोध हुआ। हालांकि इस हो हल्ले का कोई फायदा नहीं मिला। गौर करने वाली बात ये भी है कि अमेरिका और अमेरिकी राज्यों में हमारी देसी आईटी कंपनियों का निर्यात सीमित मात्रा में ही होता है।

हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने कहा कि वे अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान इस फैसले पर अमेरिकी प्रशासन के साथ अपना एतराज दर्ज करवाएंगे। लेकिन ये एक कूटनीतिक खाना पूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं था।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

मशहूर लेखिका और बुकर प्राइज़ विजेता अरुंधती रॉय का हाल ही में श्रीनगर में कश्मीर के ऊपर दिया हुआ बयान काफी विवादस्पद साबित हुआ. नाराज़ लोगों नें उन्हें देशद्रोह के अपराध में दण्डित करने की पुरजोर वकालत की. अरुंधती का विवादों में पड़ना कोई नयी बात नहीं है. देश से जुडे कई संवेदनशील मुद्दों पर अपने क्रन्तिकारी विचारों को प्रगट कर वो पहले भी घेरे में आ चुकी हैं.

 

दिल्ली के ऑटो रिक्शा चालाक इस वीडिओ में अपनी परेशानियों का वर्णन कर रहे हैं. उनका कहना है कि मीटर न चलाना उनकी मजबूरी है. मीटर सहित ऑटो के सभी पार्ट्स काफी महंगे आते हैं और उन का नियमित  रख रखाव भी काफी महंगा है. दिल्ली में 10 में से 9 ऑटो निजी वित्तदाताओं के होते हैं, जो हर रोज़ उन्हे किराए पर देते हैं. जितना पैसा ऑटो चालाक एक महीने में कमाते हैं, वो उनकी घर गृहस्थी चलाने के लिए भी काफी नहीं है, बचत तो बहुत दूर की बात है.  और सरकार का शहर में चलने वाले ऑटो की संख्या निर्धारित करना भी जीविका के अधिकार का हनन प्रतीत होता है.

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‘किलर लाइन’ के नाम से कुख्यात ब्लू लाइन बसों का दिल्ली की सड़कों से हटाया जाना एक संवेदनशील मुद्दा है जिस पर अलग अलग किस्म की राय व्यक्त की जा रही हैं. जहां कई यह मानते हैं कि सैंकड़ों जानें ले चुकी इन बसों का दिल्ली की सड़कों से चले जाना ही अच्छा है, एक ऐसा वर्ग ये भी समझता है कि तेज़ रफ़्तार और समय से चलने वाली ब्लू लाइन बसें दिल्ली की लाइफ लाइन थीं और उन का चला जाना एक नुकसान है.

पर यहाँ हमें सार्वजनिक नीति के दोषों के बारे में भी सोचना चाहिए जिन की वजह से शहर में पब्लिक यातायात इतना त्रुटिपूर्ण है.

जब नीतियां करोड़ों लोगों को भोजन, जो पहले भी भरपेट नहीं मिलता था, में कटौती करने के लिए मजबूर करती हैं, ऐसे में क्या उन पर चर्चा हो सकती है? जब नीतियां लोगों के अधिकारों को रौंदती हैं, और लोग अपने अधिकारों की बहाली के लिए अदालतों की शरण में जाते हैं, तब अदालतें क्या करें, प्रधानमंत्री?

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हाउसिंग ऐंड लैंड राइट्स नेटवर्क के भारतीय चैप्टर द्वारा तैयार और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस ए.पी. शाह द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के मुताबिक, 2003 में भारत के राष्ट्रमंडल खेल के बिड डॉक्युमेंट में मेजबानी की लागत का अनुमान 1,899 करोड़ रु. का लगाया गया था. कई संशोधनों के बाद सरकारी आंकड़ों के बाद अनुमान 10,000 करोड़ रु. पर पहुंच गया है जबकि स्वतंत्र सूत्र इसे 30,000 करोड़ रु. बताते हैं. इन आंकड़ों के साथ 2010 के खेल अभी तक के सबसे महंगे राष्ट्रमंडल खेल साबित होंगे.

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