शासन

नहीं, कोई ऐसा नहीं कर सकता कि वह डॉ. विनायक सेन और उनके साथियों को रायपुर की एक अदालत द्वारा आजीवन कारावास दिए जाने पर खुशी मनाए। वैचारिक विरोधों की भी अपनी सीमाएं हैं। इसके अलावा देश में अभी और भी अदालतें हैं। हमें अपनी अदालतों और अपने तंत्र पर भरोसा तो करना ही होगा। आखिर क्या अदालतें हवा में फैसले करती हैं? क्या इतने ताकतवर लोगों के खिलाफ सबूत गढ़े जा सकते हैं? ये सारे सुविधा के सिद्धात हैं कि फैसला आपके हक में हो तो सब कुछ अच्छा और न हो तो अदालतें भरोसे के काबिल नहीं हैं। भारतीय सविधान, जनतंत्र और अदालतों को न मानने वाले विचार भी यहा राहत की उम्मीद करते हैं। दरअसल यही लोकतत्र का सौंदर्य है।

2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की जेपीसी से जांच कराने की मांग पर सरकार और विपक्ष के बीच गतिरोध के चलते संसद का पूरा शीतकालीन सत्र बिना किसी काम काज के समाप्त हो गया. इसी के साथ पूरे सत्र के दौरान एक भी दिन कामकाज नहीं हो पाने का देश के संसदीय इतिहास में एक रिकॉर्ड बन गया.

प्रसिद्ध उद्योगपति अजीम प्रेमजी ने समृद्ध और गहन सामाजिक सरोकारों का परिचय देते हुए महादान का प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। दुनिया के 28वें तथा देश के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति अमीन अजीम प्रेमजी ने शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए 8846 करोड़ रुपयों का दान देकर दान परंपरा को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। उन्होंने 21.3 करोड़ शेयर अजीम प्रेमजी फाउंडेशन को देने की घोषणा की है। यह राशि विप्रो में उनकी हिस्सेदारी का लगभग 11 फीसदी है। अजीम प्रेमजी ट्रस्ट उत्तराचल, राजस्थान व कर्नाटक के दो-दो जिलों में 25 हजार स्कूलों को सहायता प्रदान कर चुका है। इससे ढाई लाख बच्चे लाभान्वित

राजस्थान के करौली जिले में भ्रष्ट वार्ड मेम्बरों की वजह से ज़रूरतमंद गरीब जनता BPL (गरीबी की रेखा से नीचे) राशन कार्ड के लाभ से वंचित है. जब कि अपने रौब और रुतबे के चलते गरीबी की रेखा से ऊपर रहने वाले लोग इस स्कीम का फायदा उठा रहे हैं.

Category: 

वोक्स यू (VoxEU) में जीसस फेलिप, उत्सव कुमार और आर्नेलिन एबडन का एक आकर्षक लेख प्रकाशित हुआ है, ‘चीन और भारतः सबसे अलग दो धुरंधर’ (china and India: Those two big outliers)। इस लेख में वे इस रोचक तथ्य का जिक्र करते हैं कि जब बात निर्यात को व्यावहारिक बनाकर परिष्कृत करने, उसमें विविधता लाने की आती है तो भारत और चीन उनके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से काफी समझदार दिखते हैं। निर्यात में विविधता का जो सबूत वे पेश करते हैं, वह काफी चौंकाने वाला है-

प्रायः 'दरिद्रता' और 'निर्धनता' को पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है किन्तु इन दोनों शब्दों में भारी अंतराल है. 'निर्धनता' एक भौतिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति के पास धन का अभाव होता है किन्तु इससे उसकी मानसिक स्थिति का कोई सम्बन्ध नहीं है. निर्धन व्यक्ति स्वाभिमानी तथा परोपकारी हो सकता है. 'दरिद्रता' शब्द भौतिक स्थिति से अधिक मानसिक स्थिति का परिचायक है जिसमें व्यक्ति दीन-हीन अनुभव करता है जिसके कारण उसमें और अधिक पाने की इच्छा सदैव बनी रहती है. अनेक धनवान व्यक्ति भी दरिद्रता से पीड़ित होते हैं.

देशभर में बहुत से ऐसे लोग हैं जो खुले आसमान के तले जीवन बसर करते हैं। सिर ढंकने तक को छत नहीं मिल रही। दूसरी ओर जिन स्थानीय निकायों पर लोगों को सस्ते आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है, वे जमीनों के कारोबार में लग गए हैं। ये निकाय जनहित और आवास योजनाओं के नाम पर किसानों की जमीनें तो बहुत कम कीमत में लेते हैं, लेकिन जब योजना विकसित करके भूखंड अथवा आवास देने की बारी आती है तो वे इतने शुल्क जोड़ देते हैं कि वही जमीन दस गुना महंगी हो जाती है।

Tags: 
Category: 

कुछ हफ्तों पहले मैंने ‘द सोशल नेटवर्क’ देखी। अद्भुत फिल्म है और इसका असर मेरे दिलो-दिमाग से अब तक गया नहीं है।

द एक्सीडेंटल बिलियनेअर्स किताब पर आधारित यह फिल्म सोशल नेटवर्किग साइट फेसबुक के निर्माण की कहानी बताती है। इसमें आधी हकीकत है और आधा फसाना। फिल्म तो खैर बहुत अच्छे ढंग से बनाई ही गई है, इसकी कहानी और भी ज्यादा शानदार है।

एक आदर्श शहर के लिए क्या-क्या जरूरी सुविधाएं हो सकती हैं? 24 घंटे बिजली और पानी? स्वच्छ वातावरण, कार, साइकिल और पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त चौड़ी सड़कें? शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं, खेल के मैदान, संग्रहालय, आदि? राजनीतिक व्यवस्था में अधिक दिलचस्पी लेने वाले शहर के लिए एक मेयर या महापौर की भी आवश्यकता बता सकते हैं, जिसके पास कर लगाने और प्रशासन के सभी जरूरी अधिकार हों।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

'वॉच डॉग' की भूमिका का निर्वाह करने वाला मीडिया भला 'खतरनाक' कैसे हो सकता है? निष्ठापूर्वक अपने इन कर्तव्य का पालन-अनुसरण करने वाले मीडिया को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने खतरनाक प्रवृत्ति निरूपित कर वस्तुत: लोकतंत्र के इस चौथे पाये की भूमिका और कर्तव्य निष्ठा को कटघरे में खड़ा किया है। वैसे बिरादरी से त्वरित प्रतिक्रिया यह आई है कि चव्हाण की टिप्पणी ही वस्तुत: लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

Tags: 
Category: 

Pages