शासन

भारत आर्थिक सुधार करने में भले ही अफ्रीका से पीछे रहा, लेकिन विकास में काफी आगे निकल चुका है। भारत में ज्यादातर सुधार जीडीपी विकास दर के 6 फीसदी से बढ़कर 9 फीसदी तक पहुंचने से काफी पहले ही हो चुके थे। ब्रिटिश विद्वान जेम्स मेनर कहते हैं कि घाना और दक्षिण अफ्रीका के विचारशील लोग उनसे पूछते हैं, "भारतीय ऐसा कैसे कर पाते हैं? उनके यहां उदारीकरण हमसे कम हुआ, लेकिन उनकी विकास दर हमसे ज्यादा है और समाज में स्थिरता भी अधिक है।"

इसका जवाब मैं देना चाहुंगा। आर्थिक सफलता महज आर्थिक सुधारों पर नहीं बल्कि सांस्थानिक मजबूती और ऐतिहासिक कौशल पर भी निर्भर करती है- जिसे अर्थशास्त्री ‘आरंभिक स्थितियां’ (इनिशियल कंडीशन) कहते हैं। भारत और चीन ऐतिहासिक महाशक्तियां हैं। यहां औद्योगिक क्रांति से पहले दुनिया के संपूर्ण औद्योगिक उत्पादन का 70 फीसदी उत्पादन होता था।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

भारत में आर्थिक  स्वतंत्रता के मामले में आंध्र प्रदेश ने सब से अधिक तरक्की करी है. तेलंगाना जैसी विषम समस्या के चलते भी, आंध्र प्रदेश आर्थिक स्वतंत्रता के लिए एक  अनुकूल वातावरण प्रदान करने में सफल रहा है.

फ्रेडरिक नौमान फ़ौंडेशन (दक्षिणी एशिया) द्वारा हाल ही में जारी की गयी 'इकोनोमिक फ्रीडम ऑफ़ द स्टेट्स ऑफ़ इंडिया 2011' (भारत के राज्यों में आर्थिक स्वतंत्रता 2011) रिपोर्ट  के अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता के क्षेत्र में तामिल नाडू  सर्वोच्च रहा जबकि गुजरात दूसरे स्थान पर आया. अपना पिछला प्रदर्शन सुधारते हुए, आन्ध्र प्रदेश ने इस बार 4 जगह की छलांग लगाई और तीसरे स्थान पर आया. पिछली बार की लिस्ट में आन्ध्र प्रदेश सातवें स्थान पर था.

बजट के प्रस्तुत होते ही सेंसेक्स ने 600 अंकों की छलांग लगाई, लेकिन जैसे ही निवेशकों को ये समझ आया कि बजट की कुछ बातें वित्तीय घाटे को ध्यान में रखने की बजाय आंकड़ों में सुधार और आशावाद पर अधिक आधारित है, तो सेंसेक्स को नीचे गिरते भी ज्यादा वक्त नहीं लगा।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट में कर प्रबंधन की कुशलता की कमी दिखाई पड़ती है, फिर भी इसमें वित्तीय स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखाई पड़ती है और रसोई गैस, खाद और मिट्टी के तेल के लिए नकद सब्सिडी की एक नई नीति सामने रखता है।

वित्त मंत्री ने वित्तीय क्षेत्र के सात अहम विधेयकों पर फिर से विचार शुरू करने का संकल्प कर आर्थिक सुधारों की संभावनाएं बढ़ाई हैं। इनमें बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को बढ़ाकर 49 फीसदी करने और बैंकों में विदेशी निवेशकों के मतदान अधिकार को समाप्त करने संबंधी विधेयक भी शामिल है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

विदेशी मुद्रा में पूर्णतया कंगाल होने के बाद ही देश के राजनीतिक वर्ग को 1991 में आर्थिक सुधार लाने की सुध आयी. डेंग ज़ियाओपिंग के नेतृत्व में चीन में 12 साल पहले ही आर्थिक सुधार शुरू हो चुके थे. ये देर से की गयी शुरुआत एक महत्त्वपूर्ण वजह है कि आज भारत और चीन के विकास में इतना फासला है. भारत में दो चरणों में सुधारों को क्रियान्वित किया गया: पहला चरण था 1991 से 1993 के बीच प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हाराव के नेतृत्व में और दूसरा चरण था 1997 से 2004 के बीच प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व काल में. इसके विपरीत, चीन में सुधारों का सिलसिला अनवरत चलता आ रहा है.

उड़ीसा में नक्सलियों ने जिस तरह से मलकानगिरी जिले के जिलाधिकारी आर वी कृष्णा का अपहरण किया उस से तो यही लगता है कि आने वाले समय में सरकारी स्तर पर की जाने वाली इस लापरवाही से नक्सली कुछ लाभ उठा सकते हैं. माओवादियों के दबाव में आते हुए राज्य सरकार ने मलकानगिरी जिले समेत पूरे राज्य में माओवादियों के खिलाफ़ अपने अभियान को रोकने का आदेश जारी कर दिया. इस पूरे मसले को देखते हुए यही लगता है कि कहीं न कहीं से सरकारी अधिकारियों द्वारा सुरक्षा के निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है और साथ ही यह भी हो सकता है कि किसी दूर दराज़ के क्षेत्र में कृष्णा स्थिति का जायजा लेने के लिए जा रहे हो और वापसी में किसी निर्जन स्थान पर उनकी सुरक्षा से अधिक लोगों ने आकर उनका अपहरण कर लिया हो ?

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प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आपकी सरकार की विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है। भ्रष्टाचार, नीति-निर्धारण में विचलन और एक पंगु शासन ने देश चलाने की संप्रग सरकार की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आप ऐसा आभास देते हैं जैसे आप पद पर तो हैं, लेकिन ताकत आपके पास नहीं। फिर आपको क्या करना चाहिए? मेरे विचार से इस सवाल का उत्तार काफी कुछ उन संकेतों में निहित है जो पिछले दिनों कुल मिलाकर निराशाजनक प्रेस कांफ्रेंस में आपने दिए। सरकार को अपनी ताकत वाले क्षेत्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और अपना इकबाल नए सिरे से स्थापित करना चाहिए।

Author: 
गुरचरण दास

सरकार को सार्वजनिक कार्यों की व्यवस्था करनी चाहिए अथवा वित्तीय सहायता देनी चाहिए, पर वास्तविक प्रबंधन निजी क्षेत्र के लिए ही छोड़ दिया जाना चाहिए। इस विचारधारा के तहत सरकार और निजी क्षेत्र के उद्यमी मिलजुल कर व्यवस्था की गाड़ी को आगे बढ़ाते हैं। सरकार जहाँ दिशा-निर्देशक अथवा मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है, वहीं वास्तविक धरातल पर कार्यों को अंजाम देने का कार्य निजी क्षेत्र के उद्यमी करते हैं। इस व्यवस्था में कार्यों की बारीकियों में उलझने की जगह सरकार का ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि उसे हासिल क्या करना है। इस तरह वास्तविक प्रबंधन में लगे बिना ही सरकार नागरिकों को निजी क्षेत्र के उद्यमियों द्वारा हर तरह की सेवा दिला सकती है। अगर सरकार छात्रों को पाठयपुस्तक नि:शुल्क देना चाहती है, तो उसे प्रकाशन कार्य में स्वयं लगने की जरूरत नहीं। वह निजी प्रकाशकों से पुस्तक खरीद कर छात्रों को दे सकती है या बेहतर होगा कि छात्रों को पैसे ही दे दिये जाएँ, ताकि वे अपनी जरूरत की किताबें स्वयं खरीद लें।

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भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की भर्ती के लिए साक्षात्कार से वापस आ रहे लाखों युवक रेल की छत पर यात्रा को मजबूर हुए. इनमें से 19 की करेंट से मौत हो गयी. भर्ती के लिए दो लाख लोगों ने अर्जी दी थी. यह घटना दर्शाती है कि देश में बेरोजगारी कितनी व्यापक हो चुकी है. मिस्र् एवं ट्यूनीशिया में हाल में भड़के जनांदोलनों के पीछे भी बेरोजगारी ही है. यानि यह समस्या वैश्विक है.

हम में से कई लोग भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा रिकॉर्ड से खुश होंगे क्योंकि वह तेज रफ्तार से वृद्धि  करने वाली अर्थव्यवस्था है लेकिन वे भूल चुके हैं कि आजादी के बाद भारत ने समान रूप से जबरदस्त शुरुआत की थी। बीसवीं सदी की एक जानी-मानी शख्सियत जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने विकास योजना की आधारशिला रखी और इसमें देश अग्रणी रहा।

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