शासन

सरकार को सार्वजनिक कार्यों की व्यवस्था करनी चाहिए अथवा वित्तीय सहायता देनी चाहिए, पर वास्तविक प्रबंधन निजी क्षेत्र के लिए ही छोड़ दिया जाना चाहिए। इस विचारधारा के तहत सरकार और निजी क्षेत्र के उद्यमी मिलजुल कर व्यवस्था की गाड़ी को आगे बढ़ाते हैं। सरकार जहाँ दिशा-निर्देशक अथवा मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है, वहीं वास्तविक धरातल पर कार्यों को अंजाम देने का कार्य निजी क्षेत्र के उद्यमी करते हैं। इस व्यवस्था में कार्यों की बारीकियों में उलझने की जगह सरकार का ध्यान इस बात पर केंद्रित रहता है कि उसे हासिल क्या करना है। इस तरह वास्तविक प्रबंधन में लगे बिना ही सरकार नागरिकों को निजी क्षेत्र के उद्यमियों द्वारा हर तरह की सेवा दिला सकती है। अगर सरकार छात्रों को पाठयपुस्तक नि:शुल्क देना चाहती है, तो उसे प्रकाशन कार्य में स्वयं लगने की जरूरत नहीं। वह निजी प्रकाशकों से पुस्तक खरीद कर छात्रों को दे सकती है या बेहतर होगा कि छात्रों को पैसे ही दे दिये जाएँ, ताकि वे अपनी जरूरत की किताबें स्वयं खरीद लें।

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भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की भर्ती के लिए साक्षात्कार से वापस आ रहे लाखों युवक रेल की छत पर यात्रा को मजबूर हुए. इनमें से 19 की करेंट से मौत हो गयी. भर्ती के लिए दो लाख लोगों ने अर्जी दी थी. यह घटना दर्शाती है कि देश में बेरोजगारी कितनी व्यापक हो चुकी है. मिस्र् एवं ट्यूनीशिया में हाल में भड़के जनांदोलनों के पीछे भी बेरोजगारी ही है. यानि यह समस्या वैश्विक है.

हम में से कई लोग भारतीय अर्थव्यवस्था के मौजूदा रिकॉर्ड से खुश होंगे क्योंकि वह तेज रफ्तार से वृद्धि  करने वाली अर्थव्यवस्था है लेकिन वे भूल चुके हैं कि आजादी के बाद भारत ने समान रूप से जबरदस्त शुरुआत की थी। बीसवीं सदी की एक जानी-मानी शख्सियत जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने विकास योजना की आधारशिला रखी और इसमें देश अग्रणी रहा।

सरकार ने चुनाव सुधार पर एक और कमेटी बना दी है. इस खबर से न कोई हैरानी होती है, न किसी के मन में डर पैदा होता है ना ही कोई आस बंधती है. लोक और तंत्र के बीच गहराते फ़ासले को कागजी रपटों से पाटने की कई कवायद पहले भी हो चुकी हैं.

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क्या भारतीय मतदाता सरकार बदलने का फैसला बड़े मुद्दों के आधार पर करता है? जी नहीं। उसका उनसे कोई लेना-देना नहीं होता। वह सड़क, पानी, सामान्य प्रशासन जैसी उन बातों के आधार पर सत्ता बदलता है जो उसके दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं।

Author: 
गुरचरण दास

जब विकृत या गलत या उल्टी प्रोत्साहन व्यवस्था भ्रष्टाचार को दंडित करने की बजाए ईनाम देती है, तब भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है। हमें इस विकृत प्रोत्साहन का अंत करने के लिए संस्थागत परिवर्तनों की जरूरत है।

मुझे आशा है कि साल 2010 को एक ऐसे साल के रूप में याद किया जाएगा, जब नाराज मतदाता नेताओं को बाध्य कर देंगे कि वे राजनीति को एक फायदेमंद और कर मुक्त पेशे के रूप में देखना बंद करें। मीडिया में इन दिनों कई घोटाले जैसे अवैध खनन, आदर्श सहकारी समिति, राष्ट्रमंडल खेल और 2जी लाइसेंस जैसे मामले छाए हुए हैं।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

समूचे भारत वर्ष में उल्लास के साथ गणतंत्र दिवस की 61 वीं सालगिरह मनायी गयी। इन 61 सालों में देश के विकास के बारे में यदि दृष्टि डाली जाये तो ना तो यह कहना सही होगा कि हमने कुछ भी हासिल नहीं किया है और ना ही यह कहना सही होगा कि हमने सब कुछ पा लिया है। हां विकास की गति पर जरूर मतभेद हो सकते है।

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राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता् लगातार नए अधिकारों की बात करते हैं- काम का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और अब भोजन का अधिकार। "अधिकार" शब्द को तोड़-मरोड़कर इनटाइटलमेंट के पर्याय में इस्तेमाल किया जाने लगा है, लेकिन दोनों में काफी फर्क है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

बिहार में मुख्यमंत्री नितीश कुमार को मिली हालिया चुनावी जीत ने मतदाताओं के व्यवहार में आए बदलाव की पड़ताल करने का एक अवसर दिया है। नीतीश कुमार ने बिहार को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाकर गरीबों का मसीहा बनने का दंभ भरने वाले लालू यादव को हालिया चुनाव में करारी शिकस्त दी है।

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