शासन

काफी लंबे समय से महंगाई की मार से कराह रहा आमजन अब और किसी भी तरह के बोझ को ढोने के लायक नहीं बचा है। यही वजह है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव-नतीजों के बाद जैसे ही कंपनियों ने पेट्रोल के दाम बढ़ाए आवाम विरोध स्वरूप सड़कों पर उतर आई। नाराज लोगों ने जगह-जगह केंद्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पुतले फूंके। इसे देखते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं कि पेट्रोल की कीमतों का निर्धारण कंपनियां करती हैं, सरकार नहीं। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सरकार के खिलाफ एक्शन लेने की बजाय तेल कंपनियों को ऐसा कोई रास्ता सुझाया जाए जिससे दाम कम बढ़ें और घाटा भी कम हो।

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कोलकाता की अलीमुद्दीन स्ट्रीट स्थित मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय के भीतर का नजारा देखकर अंदाजा हो जाता है कि आखिर क्यों यह पार्टी ममता बनर्जी के ‘परिबोर्तन’ यानी बदलाव के नारे के आगे असहाय हो गयी। कुछ समय पहले कोलकाता में एक यात्रा के दौरान मेरे अनुभव बहुत रोचक हैं. मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के इंतजार में बैठने से पहले हमें कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बड़े से कमरे में हलकी रोशनी है, जिसमें रखी कुरसी पर बैठकर आप अपने स्कूल के परीक्षा वाले दिनों में खो जाते हैं। आसपास का दृश्य अतियथार्थवाद की बुनावट-सा लगता है। दीवार पर करीने से गुजरे जमाने के कम्युनिस्ट दिग्गजों की तसवीरें लगी हैं। वहां सभी हैं- कार्ल मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, हो ची मिन्ह। उनके साथ राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर के कम्युनिस्ट नेताओं और क्रांतिकारियों की तसवीरें भी लगी हैं। मगर एक मुश्किल यह है कि इन सभी नेताओं के नाम चीनी लिपि में लिखे हैं, जिन्हें पहचान पाना मुश्किल है।

विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने हाल में खुलासा किया है कि स्विस बैंक में सबसे ज्यादा खाते भारतीयों के हैं। उन्होंने इस बात का भी संकेत दिया कि सूची में शामिल भारतीयों के नाम सार्वजनिक किए जाएंगे। उन्होंने  कहा कि इन निजी स्विस बैंकिंग संस्थानों में आपको खाता खोलने के लिए कम से कम 10 लाख डॉलर की जरूरत होती है, जो काफी ज्यादा राशि है और यह किसी आम भारतीय के पास नहीं होती। उन्होंने कहा कि विदेशी बैंकों में काला धन छिपाकर रखने का मुद्दा स्थानीय स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार से भी बदतर है, क्योंकि इसमें धन को देश से बाहर भेज दिया जाता है। असांजे ने कहा कि हर बार वे रुपए को बेचते हैं, जिसके नतीजतन देश की मुद्रा का मूल्य कम होता है।

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आजादी के बाद अनशन तो कई हुए, लेकिन अन्ना हजारे का अनशन अपूर्व था| इतने कम समय में इतनी जबर्दस्त प्रतिक्रिया पहले कभी नहीं हुई| श्रीरामुलू के अनशन ने आंध्रप्रदेश बनाया और तारासिंह और फतेह सिंह के अनशन ने पंजाब बनाया| अन्ना के अनशन ने अभी तक कुछ नहीं बनाया| लोकपाल भी नहीं| लेकिन इस अनशन ने सब सीमाएं तोड़ दीं| प्रांत, भाषा, जाति, मज़हब – कोई भी दीवार टिक न सकी| मानो पूरे देश में तूफान आ गया| चार-पांच दिन में ही सरकार की अकड़ ढीली पड़ गई| उसने घुटने टेक दिए|

अपने नागरिकों के लिए खाद्य और शिक्षा जैसी सामग्री और सेवाओं में सुधार के उपाय भारत ने कानून बनाकर किए हैं। भारत में शिक्षा का अधिकार कानून पहले ही है, और भूख तथा कुपोषण के समाधान के लिए अब खाद्य अधिकार कानून बनाने की तैयारी चल रही है। हालांकि शिक्षा का अधिकार कानून के नतीजे क्या निकलेंगे, यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगी।

इस बीच बिहार ने सेवा अधिकार कानून बनाने की तैयारी शुरू कर दी है। यह कानून इस राज्य के निवासियों के लिए यह सुनिश्चित करेगा कि वे एक तय समय के भीतर सार्वजनिक निकायों या दफ्तरों की सेवा प्राप्त कर सकेंगे, जैसे कि बिजली की मरम्मत और पोस्टमार्टम रिपोर्ट।

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इस साल हम भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की 20वीं वर्षगांठ मना रहे है। आर्थिक सुधारों से हमने क्या हासिल किया है? आज हम किस स्थिति में है? क्रिकेट विश्व कप में भारत की जीत आत्मविश्वास का परिणाम है। यह वही आत्मविश्वास है, जो हमारे उद्यमियों को आगे बढ़ा रहा है और जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना दिया है। आत्मविश्वास की यह राष्ट्रीय भावना 1991 से उभरनी शुरू हुई थी।

1991 का साल भारत के इतिहास में मील का पत्थर है। इस साल हमें अपनी आर्थिक स्वतंत्रता मिली थी। 1947 में हमने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल की थी। हमें भूलना नहीं चाहिए कि राजनीतिक स्वतंत्रता आर्थिक स्वतंत्रता पर निर्भर करती है। ब्रिटिश राज से मुक्त होने के तुरंत बाद भारत ने आर्थिक विकास का गलत रास्ता अपनाया और हम समाजवादी राज के शिकार बन गए। इसने हमें चालीस साल तक बंधक बनाए रखा और हमारी राजनीतिक नैतिकता को क्षति पहुंचाई।

Author: 
गुरचरण दास

मुंबई की अदालत में मिंट चबा रहा हसन अली दरअसल भारत के कानून को चबा रहा था. हसन अली को जमानत देते हुए अदालत पूरी दुनिया को बता रही थी कि भारत की जांच एजेंसियों का डायनासोरी तंत्र अपने सबसे पुराने और मशहूर कर चोर व काले धन के सरगना के खिलाफ एक कायदे का मुकदमा भी नहीं बना सकता. दो माह पहले वित्त मंत्री बड़े भोलेपन के साथ विश्व को बता चुके हैं कि हसन अली के स्विस बैंक खाते तो खाली हैं. होने भी चाहिए, काले धन पर इतनी चिल्ल-पों के बाद कोई अहमक ही खातों में पैसा रखेगा.

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विकास और सामाजिक खर्च को लेकर पिछले एक-दो महीने से इंटरनेट पर अर्थशास्त्रियों के बीच बहस छिड़ी हुई है। फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा शुरू किए गए इस बहस में नोबल पुरस्कार विजेता और जाने-माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को यह कहते हुए उद्धृत किया गया कि सामाजिक खर्च में वृद्धि नहीं कर सिर्फ दोहरे अंकों की विकास दर हासिल करने पर ध्यान देना नासमझी होगी। समाचार पत्र ने इसके जवाब में नोबेल पुरस्कार के एक दूसरे दावेदार जगदीश भगवती को भी उद्धृत किया, जिन्होंने कहा कि सामाजिक खर्च बढ़ाने से अधिक जरूरी है कि उसे बेहतर तरीके से लक्षित किया जाए और उसके लिए अधिक-से-अधिक धन की व्यवस्था करने के लिए विकास दर बढ़ाने की जरूरत है और उसके लिए दूसरी पीढ़ी का आर्थिक सुधार किया जाना जरूरी है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली के जल में घातक बैक्टीरिया सुपरबग की मौजूदगी न केवल शर्मनाक, बल्कि जल स्वच्छता के प्रति आपराधिक  लापरवाही का नतीजा है। कल्पना कीजिए, जब केन्द्र सरकार व देश की सर्वोच्च संस्थाओं की नाक तले पानी में खतरनाक सुपरबग पल सकता है, तो देश के दूसरे इलाकों में लोग कितना जहरीला पानी पी रहे होंगे। न्यू दिल्ली मेटालो-बीटा लेक्टामेस (एनडीएम) नाम का बैक्टीरिया कुछ दिनों पहले चर्चा में आया था, तब यह माना गया था कि यह दिल्ली को बदनाम करने के लिए ब्रिटेन की साजिश है। केन्द्र सरकार ने तो ब्रिटिश वैज्ञानिक मार्क टोलमैन की रिपोर्ट को ही खारिज कर दिया है।

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केंद्र सरकार ने हाल ही मे देश का सलाना आर्थिक बजट पेश किया। इसके साथ ही नई आर्थिक नीति को अपनाए हुए लगभग 20 साल पूरे हो गए, जब भारत ने अपनी उन अधिकतर पुरानी आर्थिक नीतियों का त्याग कर दिया था, जिसने 1991 के शुरुआती महीनों में भारत को कंगाली की कगार पर ला खड़ा किया था।

उस वर्ष नाटकीय रूप से उदारीकरण की नीतियों को अपनाने और 1990 के दशक के आखिरी सालों में किए गए कुछ नीतिगत बदलावों को कुछ मायनों में जबदरस्त सफलता मिली-- भारतीय अर्थव्यवस्था में पहले की तुलना में काफी अधिक स्थायित्व आया और यह पहले से अधिक समृद्ध भी हुआ। लेकिन पिछले छह सालों में आर्थिक सुधार को आगे बढ़ाने में मिली असफलता और पिछले सुधारों की कुछ खामियों को देखने से यह समझा जा सकता है कि सुधार के लिए राजनीतिक जमीन तैयार क्यों नहीं हो पाई।

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