शासन

अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।

लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।

Author: 
गुरचरण दास

64 वर्ष पूर्व कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था जिसने अंग्रेजो के निर्दयी एवं दमनकारी शासन का पर्दाफाश किया. उसने हाल मे अपने साथ भी कुछ ऐसा ही किया. अन्ना हजारे के अनशन के दौरान कांग्रेस पार्टी ने जो-जो किया उस से उसने ये सिद्ध कर दिया है की वो खुद भी कितनी निर्दयी ,बेवकूफ एवं दमनकारी है. अन्ना हजारे को जेल में डालकर, उन्होंने ऐसे जन समर्थन की लहर पैदा कर दी है जिसने इस आंदोलन में हुयी पिछली गलतियों को छिपा दिया है.

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

जमीन हमेशा ही विवादों का कारण रही है। शहरीकरण, गैर-कृषि कार्यों के लिए जमीन की बढ़ती मांग, छोटे जमीन मालिकों में कुशलता का अभाव व रोजगार की कमी से विवाद की वजह को समझा जा सकता है। पश्चिमी यूरोप, खास तौर पर ब्रिटेन और इससे भी बढ़कर इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पहले ही जमीन के बाजार को मुक्त कर दिया गया था और शिक्षा तथा तकनीकी कौशल की पहुंच बढ़ गई थी। हमने ऐसे सुधार नहीं लागू किए जो लोगों को कृषि कार्य से बाहर निकलने या कृषि में ही कुछ नया कर सकने में समर्थ बना सके।

Author: 
बिबेक देबरॉय

भ्रष्टाचार को लेकर मध्य वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है। इससे आज देश का एक बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है. इसलिए भ्रष्टाचार को लेकर लड़ाई लड़ रही सिविल सोसाइटी की मांगों के प्रति सरकार का टकरावपूर्ण रवैया किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह सरकार की हठधर्मिता का परिचायक है. यह संसदीय लोक प्रक्रिया की दृष्टि से भी हटकर है. देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान ने यह अधिकार दिया है कि वह न केवल अपनी मांगें कर सकता है, बल्कि इससे संबंधित प्रस्ताव अथवा बिल सरकार के पास विचारार्थ प्रस्तुत कर सकता है. इस प्रस्ताव अथवा बिल को मानना या न मानना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और वह चाहे तो इसे संसद में रखे अथवा न रखे?

आज से 20 वर्ष पूर्व 21 जून 1991 को नरसिम्हा राव ने एक ऐसे कमजोर और अल्पसंख्यक सरकार की बागडोर संभाली थी, जो गंभीर आर्थिक संकट से घिरी थी। इसके बावजूद उन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसने न सिर्फ भारत को बल्कि पूरे विश्व को प्रभावित किया। भारत 1991 में इतना गरीब था और यहां की शासन व्यवस्था इतनी बदहाल थी कि यह विदेशी सहायता के लिए आवश्यक शर्तों को भी पूरा नहीं कर पा रहा था। आज भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उभरा है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की सदस्यता के लिए अमेरिका का भी सहयोग मिल रहा है और यह जल्द ही आर्थिक विकास की गति में चीन को भी पीछे छोड़ देगा।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

अब तक किसी भी स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत का मूड इतना विषादग्रस्त नहीं रहा है। विडंबना है कि पिछला एक दशक भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे सुनहरा काल रहा है। देश विस्मयकारी रूपांतरण के दौर से गुजर रहा है। दशकों से देश प्रगति के पथ पर जा रहा है। देश का प्रत्येक नागरिक तो इस संपन्नता में भागीदारी नहीं कर सका, किंतु काफी बड़ी संख्या में भारतीयों ने महसूस किया कि उनका जीवन उनके माता-पिता के जीवन से बेहतर है और उनके बच्चे उनसे भी बेहतर जीवन जिएंगे। पश्चिम में बुझती आकांक्षाओं के विपरीत हमारी महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं। उदाहरण के लिए, जो लोग पहले पैदल चलते थे अब साइकिल की सवारी कर रहे हैं, जिनके पास साइकिल थी वे अब मोटरसाइकिल खरीद रहे हैं और जिनके पास मोटरसाइकिल थी, अब कार में घूम रहे हैं। अगर अब सरकार देश के सभी नागरिकों को अच्छे स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सुशासन उपलब्ध करा सके तो देश के सभी तबकों का उद्धार हो जाएगा। किंतु रोजमर्रा की घटनाएं इस शानदार तस्वीर को मुंह चिढ़ा रही हैं।

Author: 
गुरचरण दास

भारत में अगर कोई पानीदार सरकार होती तो आज वह बिन पानी ही डूब मरती. जो काम सरकार को करना चाहिए, वह काम सर्वोच्च न्यायालय को करना पड़े, इससे बढ़कर लज्जा की बात किसी सरकार के लिए क्या हो सकती है. विदेशों में जमा काले धन की वापसी पर माननीय न्यायाधीशों ने जो टिप्पणियां की हैं, वे तो अपनी जगह है ही, सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि सरकार द्वारा नियुक्त उच्च समिति को अदालत ने रद्द कर दिया है और उसकी जगह उसने स्वयं एक विशेष जांच दल बिठा दिया है.

विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अध्यक्ष नंदन निलेकणि की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में प्रत्यक्ष सब्सिडी व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया है. और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने प्रत्यक्ष सब्सिडी पर एक रिपोर्ट स्वीकार करते हुए कहा भी है कि रसोई गैस, खाद और मिट्टी के तेल पर प्रत्यक्ष सब्सिडी देकर वर्तमान सब्सिडी व्यवस्था की खामियों से निजात पाया जा सकता है.

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लोकपाल कमेटी के बारे में जो आशंका थी, वह सच निकली| यदि जन-लोकपाल के सारे प्रमुख प्रावधानों को पांचों मंत्री मान लेते तो भला उन्हें मंत्री कौन मानता? उन्हें कोई साधारण राजनीतिज्ञ भी मानने को तैयार नहीं होता| कोई भी राजनीतिज्ञ भ्रष्टाचार के समूल-नाश की बात सोच भी नहीं सकता| क्या भ्रष्टाचार किए बिना आज देश में कोई राजनीतिज्ञ बन सकता है? नेता इतने मूर्ख नहीं हैं कि वे जिस डाल पर बैठे हैं, उसी पर कुल्हाड़ी चलाएंगे| लोकपाल कमेटी में मंत्रियों ने जो रवैया अपनाया है, उन्हें वही शोभा देता है| वे लोकपाल की जगह धोकपाल लाना चाहते हैं|

नागरिक समाज बनाम नागरिक समाज के बीच विवाद के शोर के बीच एक तरफ ऐसे लोग हैं, जो लोकपाल कार्यकर्ताओं को गैर-लोकतांत्रिक समझते हैं, जबकि दूसरी तरफ जन प्रतिनिधी हैं, जिन्होंने बहुत तेज़ी से अपनी तरफ लोगों का ध्यानाकर्षण किया है। इस सबके बीच मुझे जो बात सबसे ज्यादा खटकती है, वो ये है कि इस विवाद के इतर भ्रष्टाचार के मूल कारणों और उससे निबटने के तरीके पर एक व्यापक चर्चा का अभाव है।

मैं ना ही एक तजुर्बेकार प्रशासनिक अधिकारी हूं, जिसने जिला स्तर और सचिव स्तर पर कई साल बिताएं हों या फिर बुढ़ापे की ओर अग्रसर एक क्लर्क जिसने 30 साल फोन उठाते हुए, चिठ्ठियां टाइप करते हुए और तुजुर्बेकार नौकरशाहों से श्रुतलेख (डिक्टेशन) लेते हुए बिताएं हों। मैंने एक साल सरकार के साथ काम करके यह जान लिया है कि भारत की समस्या उसकी जटिल प्रणाली है। जिसका इज़ाद भारत ने खुद किया है।

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