शासन

विकृत और अक्षम प्रशासनिक तौर तरीकों वाली आरटीई हमारे बच्चों को शैक्षणिक भूखमरी का शिकार बना रही है

मलेशिया की नवनिर्मित डा. महातिर बिन मोहम्मद सरकार ने देश में गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स अर्थात जीएसटी को समाप्त कर दिया है। ऐसा करके उन्होंने चुनाव पूर्व देश की जनता के साथ किए वादे को पूरा किया है। भारत के पूर्व मलेशिया ही वह आखिरी देश था जिसने अपने यहां जीएसटी लागू किया था। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि इस नई कर प्रणाली को लागू होने के तीन वर्षों के भीतर ही समाप्त करने की जरूरत आन पड़ी? इसकी विवेचना कर रहे हैं वरिष्ठ टीवी पत्रकार नवीन पाल..    

Author: 
नवीन पाल

पिछले लगभग दो महीनों तक देश ताबड़तोड़ क्रिकेट के 20-ट्वेंटी फार्मेट वाले इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के रंग में रंगा है। इस दौरान कई मैच रोमांच की चरम सीमा तक पहुंचे और खेल अंतिम गेंद तक पहुंचा। कई युवा खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने और राष्ट्रीय टीम के चयनकर्ताओं को प्रभावित करने का मौका भी मिला। मैच दर मैच ऐसे ऐसे इनोवेटिव शॉट्स लगातार देखने को मिलें जो आमतौर पर कम ही देखने को मिलते हैं। गेंदबाजी, क्षेत्ररक्षण सहित सभी क्षेत्रों में खिलाड़ियों के अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिले। ऐसे ऐसे कैच भी पकड़े गए जिनकी कल्पना भी नहीं की ज

7 अप्रैल को शिक्षा बचाओ ‘सेव एजुकेशन’ अभियान के समर्थन में देश भर के निजी स्कूल दिल्ली के रामलीला मैदान में इकट्ठा हुए। भारत के 70 वर्षोँ के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। ये स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में ‘लाइसेंस परमिट राज’ के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और शैक्षिक संस्थानोँ के लिए स्वायत्तता और सम्मान की मांग कर रहे थे। यहाँ पहुंचने वाले लगभग 65,000 प्रतिनिधियोँ में से अधिकतर प्रिंसिपल, शिक्षक, कम फीस लेने वाले स्कूलोँ में अपने बच्चोँ को पढ़ाने वाले माता-पिता थे। लेकिन इनके अलावा यहाँ अल्पसंख्यक संस्थान जैसे कि कैथलिक स्कूलोँ के प्रतिनिधि

Author: 
गुरचरण दास

सहल कौशिक इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी ज्वाइंट एंटरेंस एग्जामिनेशन (आईआईटी जेईईई) की बेहद प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के छात्र हैं। वर्ष 2010 में उन्होंने महज 14 साल की छोटी सी उम्र में देशभर में 33वाँ और दिल्ली में पहला रैंक हासिल किया था। सहल ने किसी स्कूल में पढ़ाई नहीँ की थी। उन्होंने घर में ही पढ़ाई की थी। पिछ्ले कुछ वर्षोँ में बहुत सारे पैरेंट्स ने होम स्कूलिंग के विकल्प को अपनाया है, क्योंकि परंपरागत स्कूलों की कई खामियों के कारण वे अपने बच्चोँ को वहां नहीं भेजना चाहते थे। उन्हेँ स्कूलोँ द्वारा बच्चोँ की समस्याओँ को सुलझाने

दिल्ली में कम फीस वाले 3 हजार बजट प्राइवेट स्कूलों को बंद करने का फैसला लिया गया है। सरकार के इस फैसले के कारण 10 लाख बच्चों और उनमें पढ़ाने वाले 30 हजार अध्यापकों का भविष्य अधर में लटक गया है। विशेष बात यह है कि निर्विवादित तौर पर इन स्कूलों की गुणवत्ता सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता की तुलना में बेहतर है वह भी बेहद की कम खर्च पर.. - वीडियो साभारः आजतक

कहते है आईटी और आईआइएम में दाखिला लेना आसान है बनिस्पत अच्छे नर्सरी स्कूलों के। क्योंकि आईआईटी और आईआईएम में दाखिले के लिए इम्तिहान छात्र देते है और निजी स्कूलों में उनके अभिभावक। किस्मत और आपकी जेब इसका फैसला करतीहै कि आपका बच्चा फलां स्कूल में जाने लायक है भी या नही। कितने सूटकेस में पैसा और सिफारिशी पत्र आपने सलंग्न किये है दाखिला इसपर निर्भर करता है। इतने जतन प्रयत्न के बाद अगर दाखिल मिल जाये तो अभिभावक की स्थिति एक बंधक की भांति हो जाती है जो स्कूलो के सही गलत सब नियम मानने को मजबूर हो जाते हैं। हर साल कितनी फीस बढ़ेगी, किताबे कहाँ से आएं

सीमापार से खबर अच्छी आई है। बांग्लादेश सरकार ने देश में सरकारी सेवाओं में आरक्षण की व्यवस्था को खत्म करने का फैसला किया है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 11 अप्रैल को संसद में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को खत्म करने का ऐलान किया । बांग्लादेश में आरक्षण नीति के खिलाफ हजारों छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। ढाका यूनिवर्सिटी से आरक्षण व्यवस्था को लेकर आंदोलन शुरू हुआ और धीरे धीरे पूरे बांग्लादेश में फैल गया। प्रदर्शकारियों का पुलिस से टकराव भी हुआ जिसमें 100 से ज्यादा छात्र घायल हुए। सरकार को छात्रों की मांगों के आगे झुकना पड़ा और आरक्ष

Author: 
नवीन पाल

मौजूदा समय में भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में नीतियां बनाने, नियमन (रेग्युलेशन) करने और सेवा प्रदान (सर्विस डिलिवरी) करने जैसे सारे सरकारी कामों की जिम्मेदारी एक ही संस्था के जिम्मे है। हालांकि, जरूरत इन सारे कामों को तीन अलग अलग हिस्सों में बांटने की है और इन तीनोँ के बीच संबंधों में वैसी ही स्पष्ट दूरी होनी चाहिए जैसे कि वित्त, टेलीकॉम और विद्युत क्षेत्र में है। ऐसा करने से नीति निर्धारण और नियमन दोनों के श्रेष्ठ क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त क्षमता बढ़ेगी जो कि फिलहाल सेवा प्रदान करने की जिम्मेदारी के कारण अवरुद्ध हो जाती है। जिम्मेदारियों को

हमारे जीवन में कानून की क्या और कितनी आवश्यकता है? कानून का असल काम क्या है और कानून दरअसल क्या कर रहा है, इस विषय पर फ्रेंच विचारक बास्तियात के विचारों पर अपनी राय प्रकट कर रहे हैं श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाऊंडेशन के रिसर्च फेलो शिवानंद द्विवेदी..

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