शासन

स्वतंत्रता सर्वोच्च राजनैतिक मूल्य के रूप में
समाजवादी मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की इस आधार पर भी आलोचना करते हैं कि यह असमानता को बढ़ावा देती है। उनका विश्वास है कि राज्य के हस्तक्षेप व नियंत्रण से वे समानता को बढ़ावा दे सकते हैं। यही जवाहर लाल नेहरू का समाज का समाजवादी ढांचा (Socialistic pattern of society) नामक ‘महान’ दर्शन था।

आश्चर्यजनक है कि तमाम प्रांतीय और राष्ट्रीय आंदोलनों, सत्याग्रहों और क्रांति के लिए जाने जाने वाले भारत देश में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार को लेकर हुए किसी बड़े जन-आंदोलन का वाक्या याद नहीं आता। कुछ-एक आंदोलन (ज्योतिबा फुले/सावित्री बाई फुले का अभियान) जो शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक स्तर पर बदलाव लाने में कामयाब हुए भी तो उनका प्राथमिक उद्देश्य महिला उत्थान, समाज सुधार अथवा वर्ण/जाति व्यवस्था में बदलाव ज्यादा रहा। स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात के काल में भी कुछ बड़े आंदोलन अवश्य हुए लेकिन उनकी परिणति भी राजनैतिक बदलाव अधिक और शैक्षणिक सुधार कम

जब भी चुनाव आते हैं तो मैं यह सोचकर हताश हो जाता हूं कि हम सच्चे, स्वतंत्र और सुधार चाहने वाले उदार नागरिकों की बजाय फिर अपराधियों, लुभावने नारों वाले भ्रष्टों और राजनीति क वंश के सदस्यों को चुन लेंगे। इस बार तमिलनाडु में शशिकला और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की धक्कादायक जीत साफ-सुथरे उदारवादियों की नाकामी को रेखांकित करती है।

Author: 
गुरचरण दास

मेरा बेटा समलैंगिक है और अब मुझे इसे स्वीकार करने में कोई डर नहीं है। वह बीते 20 वर्षों से अपने पार्टनर के साथ आपसी विश्वास और प्रसन्नता भरी ज़िंदगी बिता रहा है। मेरे परिवार व नज़दीकी मित्रों ने इसे गरिमापूर्वक स्वीकार किया है। लेकिन, मैं इसके बारे में सार्वजनिक तौर पर बोलने से डरता था कि कहीं उसे कोई नुकसान न हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया। मेरी पत्नी और मुझे अचानक लगा कि जैसे बहुत बड़ा बोझ सिर से उतर गया है। मुख्य न्यायाधीश के बुद्धिमत्ता भरे शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे, 'मैं जो हूं, वैसा हूं, इसलिए

Author: 
आलोक पुराणिक

कोई भी राष्ट्र तब तक प्रगति और उन्नति नहीं कर सकता जब तक कि सभी बच्चों के लिए अच्छे स्कूल न हों। ऐसे में और स्कूलों का होना लाजमी है। ढेरों नए सरकारी स्कूलों के आने की उम्मीद बहुत कम है, क्योंकि हमारे यहां के सत्ताधारी स्कूलों और अन्य सामाजिक ज़रूरतों पर खर्च करने के बजाए वोट पाने की उम्मीद में लोकलुभावने ‘लॉलीपॉप’ देने के प्रति अधिक आशक्त हैं।

सवा दो लाख करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि केन्द्र सरकार हर साल किसानों की मदद के लिए खर्च करती है। ये राशि फर्टिलाइजर सब्सिडी, बिजली, फसल बीमा, बीज, किसान कर्ज, सिंचाई जैसी मदों में खर्च की जाती है बावजूद इसके देश का किसान बदहाल है। उसकी हालत इतनी खराब है कि वो अपनी दैनिक जरूरतों का भी पूरा नहीं कर पा रहा है। उसकी और उसके जैसे दूसरे 75 फीसदी आबादी की मदद के लिए सरकार सस्ती दर पर अनाज के साथ परिवार के एक सदस्य को मनरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराती है लेकिन किसानो की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले

Author: 
नवीन पाल

मैं एक अभिभावक हूं और अपने बच्चे की शिक्षा और व्यापक शिक्षा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण हितधारक हूं। मेरी आवाज नहीं सुनी गई।

देश के तमाम शहरों की सड़कें न सिर्फ लाखों कामगार गरीबों तथा अभावग्रस्त लोगों की आश्रयस्थली वरन उनकी रोजीरोटी का केंद्र भी हैं, जहां पर वे सस्ते और आकर्षक सामानों की दुकान सजाते हैं। शहरों में सड़क किनारे फुटपाथ पर आपकों ऐसे अनेक पुरष-महिलाएं पकाया हुआ भोजन, फल व सब्जियां, कपड़े, खिलौने, किताबें, घरेलू इस्तेमाल की चीजें व सजावटी सामान बेचते मिल जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन एक करोड़ लोग इस तरह सड़क किनारे सामान बेचते हुए अपनी आजीविका कमाते हैं।

चालू विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित- लोकतंत्र में रिजार्ट -विषय पर निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त निबंध यह है-

- हम अमीर सरकार वाले गरीब देश के निवासी है
- गरीबी उन्मूलन के लिए लाई जाने वाली सरकारी योजनाएं गैरकानूनी और काला धन बनाने का स्त्रोत होती हैं
- यदि समाजवाद के प्रति हमारी सनक बरकार रहती है तो देश का भविष्य अंधकारमय ही रहेगा

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