शासन

सेंटर फॉर सिविल सोसायटी द्वारा प्रस्तुत आज़ादी पॉडकास्ट के इस एपिसोड में फाउंडेशन फॉर इकोनॉमिक डेवलपमेंट के सीनियर प्रोग्राम मैनेजर देवाशीष देशपांडे के साथ ‘कृषि सब्सिडी की तार्किकता’ की पड़ताल कर रहे हैं सेंटर फॉर सिविल सोसायटी के रिसर्च मैनेजर व होस्ट सुधांशु नीमा।

इस पॉडकास्ट में किसानों को सब्सिडी वस्तुओं के रूप में प्रदान करने की बजाए डायरेक्ट कैश ट्रांसफर के माध्यम से प्रदान किए जाने की संभावनाओं और इसकी जटिलताओं पर विस्तार से चर्चा की गई है।

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा प्रस्तुत, अज़ादी पोडकास्ट के इस एपिसोड में होस्ट अमित चंद्रा पिछले सप्ताह की बातचीत को आगे बढ़ाते हैं भुवना आनंद और अभिषेक रंजन के साथ। वे सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा किए गए हस्तक्षेपों पर चर्चा करते हैं।

अभिषेक रंजन और अमित चंद्रा ने शिक्षा के विषय पर पिछले दस वर्षो में ज़मीनी स्तर पर काफी काम किया है। भुवना आनंद सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के रिसर्च डिपार्टमेंट की डायरेक्टर हैं।

कृषि कर्ज माफी का जो आंकड़ा है वह उद्योग जगत के कुल एनपीए के बराबर पहुंच गया है। यानि कि पिछले दस वर्षों में केंद्र व राज्य स्तर पर किसानों की कर्ज माफी के रूप में कुल 4.7 लाख करोड़ रूपए माफ किए गए हैं। हालांकि इतना सब होने के बावजूद किसानों की समस्या एक लाइलाज रोग की तरह अब भी मौजूद है। आए दिन किसान धरना दे रहे हैं या मौत को गले लगाने को मजबूर हो रहे हैं। आखिर क्या है किसानों की समस्याओं का इलाज!

आजादी पॉडकास्ट के इस एपिसोड में होस्ट अविनाश चंद्रा, संपादक, azadi.me और हरवीर सिंह, संपादक, आउटलुक पत्रिका, बातचीत करते हैं कृषि में संकट और उसके समाधान के बारे में।

दिल्ली एक बार फिर से मिशन मोड में है। यह मिशन है ‘मिशन नर्सरी एडमिशन’। नवंबर के अंतिम सप्ताह में नर्सरी दाखिलों के लिए गाइडलाइंस जारी होने के साथ ही अभिभावकों की दौड़ शुरू हो गई है। दौड़ अपने बच्चों को एक अदद ‘बढ़िया’ स्कूल में दाखिला दिलाने की है। यह सिर्फ घर से ‘पसंद’ के स्कूल तक की ही दौड़ नहीं है, यह दौड़ है उन सभी संभावित विकल्पों को आजमाने की जो उन्हें मनपसंद स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करा सके। इस दौरान अभिभावकों को जिस आर्थिक, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है ये सिर्फ वही जानते हैं। हालांकि गाइडलाइंस जारी करते समय प्रत्येक वर्ष शिक्षा विभाग द्वारा अभि

लगभग 3 करोड़ की आबादी वाली दिल्ली, दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से एक है। 1950 में दिल्ली की आबादी 10 लाख थी जो 2019 तक बढ़कर 2.96 करोड़ हो गई। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक दिल्ली की जनसंख्या 4.3 करोड़ हो जाएगी। लेकिन नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता के कारण जिस तेजी से शहर की जनसंख्या में वृद्धि हुई उस तेजी से यहां के इंफ्रास्ट्रक्चर (भौतिक संरचना) में बदलाव नहीं हो सका। इस कारण अनके चुनौतियां पैदा हो गईं जैसे कि आवास, परिवहन, प्रदूषण, रोजगार, शिक्षा आदि आदि।

जीएम टेक्नोलॉजी पूरी दुनिया के किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। फिर भी, भारत की सरकारें इस तकनीकि के फायदों को समझने में असफल रही है और किसानों को इस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से वंचित रखा है।

  • गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया। क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित। अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर
काफी इंतजार के बाद पिछले वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2019 ड्राफ्ट आखिरकार जारी हो ही गया। यह ड्राफ्ट 484 पृष्ठों का व्यापक दस्तावेज है जिसे तैयार करने में चार वर्षों से अधिक का समय लगा। इंडियन स्पेश रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के चेयरमैन रहे पद्मश्री व पद्म विभूषण के. कस्तूरीरंगन समीति द्वारा प्रस्तुत एनईपी ड्राफ्ट को लेकर सरकार काफी उत्साहित है और इसे जल्द से जल्द लागू कराना चाहती है। कुछ दिनों पहले केंद्रीय बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने नई शिक्षा नीति के जल्द लागू होने का जिक्र भी किया।

वित्तमंत्री ने खतरा न उठाकर संजीदगी दिखाई, संरक्षणवाद को पलटने में नाकाम रहीं

हमारी जैसी मंदी से निपटने के केवल दो ही तरीके हैं। एक उपभोग के जरिए और दूसरा निवेश के माध्यम से। इस बजट में दूसरा तरीका अपनाया गया है और मेरे विचार में यह सही रास्ता है। उपभोग के पहले तरीके में लोगों के हाथों में बैंक ट्रांसफर के माध्यम से पैसा देना पड़ता। वे पैसा खर्च करते, सामान इस्तेमाल करते और मांग को बढ़ाते, जिससे फैक्टरियां चलतीं और अधिक नौकरियां आतीं, जिससे और खर्च बढ़ता। इस चक्र के चलने से अर्थव्यवस्था में गति आ जाती। 

Author: 
गुरचरण दास

इकोनॉमिक थिंक टैंक सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के प्रेसिडेंट पार्थ जे शाह ने कहा कि सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण में जिस तरह से बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के नाम और उनके विचारों का हवाला दिया, उससे उम्मीद जगी थी कि बजट में कुछ बड़े और व्यवस्थागत बदलाव पेश किए जाएंगे। लेकिन शनिवार को पेश बजट में इन विचारकों और उनके आर्थिक दर्शनों को व्यावहारिक तौर पर उम्मीद के मुताबिक लागू नहीं किया गया। दोनों दस्तावेजों को देखने से एकबारगी यह विश्वास नहीं होता है कि दोनों दस्तावेज एक ही सरकार ने पेश किए हैं।

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