शासन

राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा हाल ही में समस्याओं से घिरा रहा। स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग के पूर्व सचिव, अनिल स्वरूप, जिन्होंने शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने वाली समिति को इनपुट प्रदान किए थे, ने इससे जुड़ी कुछ बड़ी समस्याओं के बारे में प्रज्ञानंद दास से बातचीत की:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 के प्रस्तुत मसौदे को लेकर आपकी क्या राय है?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कानून के तहत इसका पालन न करने वाले कॉर्पोरेट्स के लिए जेल के प्रावधान पर पुर्नविचार करने के बयान के बमुश्किल एक सप्ताह के भीतर ही एक उच्च स्तरीय कमेटी ने इसे दीवानी अपराध (सिविल ऑफेंस) बनाने और प्रावधान को अर्थदंड तक सीमित रखने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। पूर्व में इसके लिए तीन वर्ष तक के जेल की सजा का प्रावधान था। इस सुझाव के आते ही कुछ प्रबुद्ध वर्गों के बीच तीखी आलोचना का दौर शुरू हो गया जो इसे जरूरी मानते हैं। उनके बहस का असर कुछ कॉरपोरेट कंपनियों के उच्च अधिकारियों पर प

कानून या विधि का मतलब है मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित और संचालित करने वाले नियमों, हिदायतों, पाबंदियों और हकों की संहिता। संविधान सम्मत आधार पर संचालित होने वाले उदारतावादी लोकतंत्रों में ‘कानून के शासन’ की धारणा प्रचलित होती है। इन व्यवस्थाओं में कानून के दायरे के बाहर कोई काम नहीं करता, न व्यक्ति और न ही सरकार। इसके पीछे कानून का उदारतावादी सिद्धांत है जिसके अनुसार कानून का उद्देश्य व्यक्ति पर पाबंदियाँ लगाना न हो कर उसकी स्वतंत्रता की गारंटी करना है।

कुछ दिनों पहले रविवार की रात एक टीवी शो में एंकर ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 5 लाख करोड़ डॉलर के जीडीपी के लक्ष्य का तिरस्कारपूर्व बार-बार उल्लेख किया। यह शो हमारे शहरों के दयनीय पर्यावरण पर था और एंकर का आशय आर्थिक प्रगति को बुरा बताने का नहीं था, लेकिन ऐसा ही सुनाई दे रहा था। जब इस ओर एंकर का ध्यान आकर्षित किया गया तो बचाव में उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक वृद्धि तो होनी चाहिए पर पर्यावरण की जिम्मेदारी के साथ। इससे कोई असहमत नहीं हो सकता पर दर्शकों में आर्थिक वृद्धि के फायदों को लेकर अनिश्चतता पैदा हो गई होगी।

Author: 
गुरचरण दास

निजी स्कूलों की महंगी शिक्षा का मुद्दा राजनैतिक गलियारे में हमेशा से ‘हॉट’ रहा है। पिछले लगभग एक दशक के दरम्यान इस मुद्दे ने इतना गंभीर रुख अख्तियार कर लिया कि इस मुद्दे पर पूरा का पूरा चुनावी अभियान केंद्रीत होने लगा। वर्तमान की दिल्ली सरकार तो राज्य में स्कूलों की फीस को सख्ती से नियंत्रित करने के कदम को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित करती है। दिल्ली की देखा देखी महाराष्ट्र, गुजरात, यूपी, हरियाणा, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों ने अपने यहां फीस नियंत्रण कानून लागू कर दिए हैं और कई अन्य राज्य इसी प्रकार का कानून लागू करने की दिशा

जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाने के बहुचर्चित फैसले पर केंद्र सरकार ने मुहर लगा दी है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद केंद्र सरकार ने सोमवार को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 खत्म होने की सूचना संसद में दी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पहले राज्यसभा और फिर लोकसभा में अनुच्छेद-370 को खत्म करने की जानकारी दी। अनुच्छेद-370 खत्म होने की सूचना मिलते ही राजनीतिक हलकों में हंगामा मचा हुआ है। जहां कुछ राजनेता इसे एक देश-एक संविधान बता रहे हैं। वहीं विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। आइए 10 बिंदु में जानें- जम्मू-कश्मीर से धारा-370 खत्म होने का क्या मतलब है

जानिए क्यों अकोला (महाराष्ट्र) के किसान जयंत रामचंद्रन बापट प्रतिबंधित एचटीबीटी बीज के प्रयोग को जायज ठहरा रहे हैं। और यह भी जानें कि क्यों उन्हें यह बयान देना पड़ता है कि 'आतंकवाद से व्यक्ति एक बार मरता है लेकिन सरकार के इस प्रावधान के कारण महिला किसान रोज मरती हैं।' किसान सत्याग्रह के दौरान की गई बातचीत के अंश..    - आजादी.मी

पुराने जमाने में मार्ग से गुजरने का पहला अधिकार ऊंची जाति के लोगों को होता था। नीची जाति के लोग तभी निकल सकते थे जब ऊंची जाति के लोग पहले वहां से गुजर चुके हों। यानि कि यदि दो लोगों को रास्ते से गुजरना हो तो रास्ते से गुजरने का पहला अधिकार ऊंची जाति के व्यक्ति का था उसके बाद ही नीची जाति का व्यक्ति वहां से निकल सकता था। आज के जमाने में शहरों की सड़कों पर ट्रैफिक लाइट्स होती हैं। ट्रैफिक लाइट्स कास्ट ब्लाइंड होती हैं यानि कि वो जात-पात को नहीं देखतीं हैं। आपकी जाति ऊंची हो या नीची हो, रेड लाइट पर सबको रूकना होता है और ग्रीन लाइट होने पर सबको न

बहुत से भारतीयों की धारणा अभी भी यही है कि बाजार धनी लोगों को और अधिक धनी तथा गरीबों को और अधिक गरीब बनाता है तथा यह भ्रष्टाचार एवं क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविकता यही है कि पिछले दो दशकों में व्यापक तौर पर समृद्धि बढ़ी है और तकरीबन 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। बावजूद इसके लोग अभी भी बाजार पर अविश्वास करते हैं। आंशिक तौर पर इसके लिए आर्थिक सुधारकों को दोष दिया जा सकता है, जो प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं अथवा धारणा को ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर की तरह आम लोगों को नहीं बता सके। सौभाग

Author: 
गुरचरण दास

इस बात से कोई भी इंकार नहीं करेगा कि गुणवत्ता युक्त शिक्षा ही 21वीं सदी के भारत की दशा और दिशा तय करेगी। केंद्र और राज्य सरकारें भी अब इस ओर काफी गंभीर दिखाई प्रतीत होती हैं। मोदी सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसकी एक बानगी है। हालांकि देश में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था विशेषकर प्राथमिक शिक्षा की हालत में सुधार होने की बजाए खराबी ही आई है।

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