व्यापार

अर्थव्यवस्था में लेनदेन मुख्य रूप से उत्पादक और उपभोक्ता के बीच होता है। जैसे किसान सब्जी उगाता है और एक परिवार उसकी खपत करता है। यदि परिवार का कोई सदस्य गांव जाकर लौकी खरीदे तो कठिनाई होती है, इसलिए समाज ने मंडी और दुकानदार बनाए। अब यह काम इंटरनेट के जरिए होने लगा है। कई शहरों में लोगों ने सब्जी पहुंचाने की वेबसाइट बनाई है। आप सुबह अपना ऑर्डर बुक करा सकते हैं। साइट का मालिक मंडी से सब्जी लाकर सीधे आपके घर पहुंचा देगा। सब्जी पसंद न आए तो आप लौटा सकते हैं। दुकानदार और ठेले वालों की जरूरत नहीं रह गई है। इससे छोटे ही नहीं, बड़े विक्रेता भी संकट महसूस कर रहे हैं।

आस पास के रेहड़ी पटरी व्यवसायियों के पास आपका आना जाना अवश्य रहता होगा। रेहड़ी पटरी वाले ताजे फल-सब्जियों से लेकर हल्के फुल्क नाश्ते तक की हमारी दिन प्रतिदिन की सारी जरूरतों को पूरी करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नीतिगत अनिश्चितताओं के कारण अपनी आजीविका को लेकर प्रतिदिन उन्हें कितने जोखिमों का सामना करना पड़ता है?

देश के वर्तमान आर्थिक हालात को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि बैकिंग ढांचा पटरी पर आ गया तो अर्थव्यवस्था की गाड़ी को रफ्तार पकड़ने में ज्यादा देर नहीं लगेगी

नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन ने सन् 1980 में लिखी अपनी पुस्तक 'फ्री टू चूज़' में धन खर्च किए जाने की प्रक्रिया को अध्ययन की सरलता के लिए चार हिस्सों में वर्गीकृत किया था। पहला, आप अपना धन स्वयं पर खर्च करते हैं। दूसरा, आप अपना धन किसी और पर खर्च करते हैं, तीसरा आप किसी और का धन स्वयं पर खर्च करते हैं और चौथा, आप किसी और का धन किसी और पर खर्च करते हैं। उदाहरणों के माध्यम से फ्रीडमैन ने स्पष्ट किया था कि धन खर्च करने का पहला तरीका सबसे ज्यादा किफायती और सर्वाधिक उपयोगिता प्रदान करने वाला होता है। धन खर्च क

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कानून के तहत इसका पालन न करने वाले कॉर्पोरेट्स के लिए जेल के प्रावधान पर पुर्नविचार करने के बयान के बमुश्किल एक सप्ताह के भीतर ही एक उच्च स्तरीय कमेटी ने इसे दीवानी अपराध (सिविल ऑफेंस) बनाने और प्रावधान को अर्थदंड तक सीमित रखने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है। पूर्व में इसके लिए तीन वर्ष तक के जेल की सजा का प्रावधान था। इस सुझाव के आते ही कुछ प्रबुद्ध वर्गों के बीच तीखी आलोचना का दौर शुरू हो गया जो इसे जरूरी मानते हैं। उनके बहस का असर कुछ कॉरपोरेट कंपनियों के उच्च अधिकारियों पर प

जब भी चुनाव आते हैं तो मैं यह सोचकर हताश हो जाता हूं कि हम सच्चे, स्वतंत्र और सुधार चाहने वाले उदार नागरिकों की बजाय फिर अपराधियों, लुभावने नारों वाले भ्रष्टों और राजनीति क वंश के सदस्यों को चुन लेंगे। इस बार तमिलनाडु में शशिकला और अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की धक्कादायक जीत साफ-सुथरे उदारवादियों की नाकामी को रेखांकित करती है।

Author: 
गुरचरण दास

सवा दो लाख करोड़ रुपये की भारी भरकम राशि केन्द्र सरकार हर साल किसानों की मदद के लिए खर्च करती है। ये राशि फर्टिलाइजर सब्सिडी, बिजली, फसल बीमा, बीज, किसान कर्ज, सिंचाई जैसी मदों में खर्च की जाती है बावजूद इसके देश का किसान बदहाल है। उसकी हालत इतनी खराब है कि वो अपनी दैनिक जरूरतों का भी पूरा नहीं कर पा रहा है। उसकी और उसके जैसे दूसरे 75 फीसदी आबादी की मदद के लिए सरकार सस्ती दर पर अनाज के साथ परिवार के एक सदस्य को मनरेगा के तहत 100 दिनों का रोजगार मुहैया कराती है लेकिन किसानो की स्थिति सुधरने का नाम नहीं ले

Author: 
नवीन पाल

देश के तमाम शहरों की सड़कें न सिर्फ लाखों कामगार गरीबों तथा अभावग्रस्त लोगों की आश्रयस्थली वरन उनकी रोजीरोटी का केंद्र भी हैं, जहां पर वे सस्ते और आकर्षक सामानों की दुकान सजाते हैं। शहरों में सड़क किनारे फुटपाथ पर आपकों ऐसे अनेक पुरष-महिलाएं पकाया हुआ भोजन, फल व सब्जियां, कपड़े, खिलौने, किताबें, घरेलू इस्तेमाल की चीजें व सजावटी सामान बेचते मिल जाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन एक करोड़ लोग इस तरह सड़क किनारे सामान बेचते हुए अपनी आजीविका कमाते हैं।

- 10वें स्कूल च्वाइस नेशनल कॉंफ्रेंस के दौरान शिक्षाविदों ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली को बताया अप्रासंगिक

नई दिल्ली। देश की शिक्षा प्रणाली दशकों पुराने ढर्रे पर चल रही है जबकि दुनिया तेजी बदल रही है। अलग अलग छात्रों की सीखने व समझने की क्षमता अलग अलग होती है जबकि वर्तमान प्रणाली अभी भी सभी छात्रों को समान तरीके से ‘ट्रीट’ करती है। छात्रों का सर्वांगीण विकास हो इसके लिए जरूरी है कि उन्हें वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ज्ञान प्रदान किया जाए।

कुछ दिन पहले विश्व बैंक ने भारत और दुनिया में व्यवसाय करने की सुगमता से संबंधित अपनी वार्षिक सूची को जारी किया था। भारत ने रैंकिंग में 23 स्थान की छलांग लगाकर 2017 में 100 के मुकाबले इस वर्ष 77वां स्थान हासिल किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह हमारे आर्थिक स्वास्थ्य या हमारे कारोबारी माहौल की स्थिति के अंतिम शब्द से बहुत दूर है। इसके विपरीत सोचना गलत होगा। भारतीय सरकारी व्यवस्था एक जटिल जानवर के समान है। सरकारी मशीनरी, प्रक्रिया और नियमों के स्तर पर राज्यों में बहुत अधिक भिन्नताएं हैं। देश को यदि व्यापक परिदृश

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