पर्यावरण

गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई ने दुनिया में एक नई विसंगति पैदा की है। हमारी एक पृथ्वी पर दो दुनिया बसी हुई हैं- एक में गरीब लोग भुखमरी से बचने के लिए पसीना बहा रहे हैं, जबकि दूसरी में अमीरों को नहीं सूझ रहा है कि वे अपनी धन-दौलत कैसे खर्च करें। एक पृथ्वी पर दो दुनिया की स्थिति बहुत लंबे समय तक जारी नहीं रह सकती।

जल और स्वच्छता (सेनिटेशन) का संकट विश्व में अरबों लोगों को प्रभावित कर रहा है। इससे नियमित रूप से बच्चों की मौत हो रही है। वर्तमान में, 1,10 अरब लोगों (विश्व की 17 फीसदी आबादी) को स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार अस्वच्छ पानी और अस्वच्छता के कारण प्रतिवर्ष लाख लोगों की मौत होती है। विश्व में लगभग 2 अरब लोगों की शौचालयों एवं स्वच्छता संबंधी अन्य सुविधाओं तक पहुंच नहीं है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का दूसरा प्रमुख कारण डायरिया है।

चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने पिछले दिनों कहा कि उनके देश में अगले पांच साल के लिए वार्षिक संवृद्धि दर का लक्ष्य घटाकर सात प्रतिशत कर दिया गया है। हमें तीव्र आर्थिक संवृद्धि के लिए अपने पर्यावरण का बलिदान नहीं करना चाहिए। उन्होंने सरकार से सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि से ध्यान हटाकर संवृद्धि की गुणवत्ता और लाभ पर केंद्रित करने को कहा। वेन का बयान चीन और भारत की आर्थिक संवृद्धि का वैश्विक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर पश्चिमी जगत की चिंताओं के मद्देनजर आया है। पिछले साल चीन की संवृद्धि दर 10.3 प्रतिशत थी, जो इस साल 9 प्रतिशत रह गई है। यद्यपि वह अपने देश के नागरिकों से मुखातिब थे, फिर भी उनका संदेश पश्चिम के आलोचकों पर लक्षित था।

Author: 
गुरचरण दास

अभयारण्यों के आस-पास बसे लोगों के पुर्नवास के लिए अधिक धन उपलब्ध कराने का सरकार द्वारा हाल ही में फैसला लिया गया है। पर्यावरण मंत्री की मानें तो पुर्नवास के लिए अगले सात सालों में 77 हजार परिवारों को बसाने के लिए आठ हजार करोड़ की जरूरत पड़ेगी। सोचने वाली बात ये है कि क्या अगले सात सालों तक बाघ बचे रहे पाएंगे। जिस रफ्तार से उनकी संख्या घटती जा रही है, उससे तो इस बात की संभावना कम ही दिखाई देती है।

वर्तमान में देश में बाघों की संख्या 14-1500 से अधिक नहीं होगी। इस राष्ट्रीय प्राणी को बचाने के लिए सरकार महज जब जागो, तब सवेरा वाली कहावत पर अमल करने की कोशिश करती आई है। उसकी इसी कोशिश में बाघों की संख्या आधे से भी कम होकर रह गई है। कुंभकरणी नींद से बीच में उठकर कुछ कदम बढ़ाने और वापस फिर सो जाने से स्थितियां नहीं बदला करतीं।

प्रकृति ने फिर एक बार कहर ढाकर पूरे जीव जगत को झकझोरकर रख दिया। जापान में पहले तो उच्च तीव्रता का भूकंप आया, जिससे तटीय इलाकों के भवनों और निर्माणों में आग लग गई और उसके बाद सुनामी की 10 मीटर ऊंची लहरों ने जो तबाही मचाई, उसके दृश्य पूरी दुनिया ने देखे। ऎसा लग रहा था मानो शहर के अंदर किसी ज्वालामुखी का लावा बह रहा हो। कहीं आग, तो कहीं पानी का सैलाब और उसमें उखड़कर बहते विकास के प्रतीकों का ऎसा मंजर शायद ही पहले कभी देखा गया होगा।

हाल ही में केंद्र सरकार ने बांस को पेड़ नहीं, घास की संज्ञा दे दी है. इस आधिकारिक पुष्टि के साथ ही लम्बे समय से बांस को घास घोषित किये जाने के लिए चल रहे अभियान को राहत मिली है. इस आधिकारिक पुष्टि से जंगलो में रहने वाले आदिवासियों के अधिकार भी स्थापित हो सकेंगे.

बांस के घास घोषित होने के साथ ही उम्मीद है कि हमारे जंगलों का नुकसान कुछ कम होगा और देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार मिल सकेगा. साथ ही साथ देश के आदिवासियों को अपने जंगलों और उन से मिलने वाले फायदों पर बेहतर इख्तियार मिल सकेगा.

बारह दिनों तक जलवायु परिवर्तन पर चले कोपनेहेगन सम्मेलन में अंतिम दिन अमेरिका ने चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ एक समझौते को दिया अंजाम. अमेरिका समझौते को भविष्य के लिए अहम कदम मान रहा जबकि कई देश कर रहे आलोचना.

हिमालय की बर्फ का पिघलना, समुद्र के जलस्तर का बढ़ना और पृथ्वी के तापमान में वृद्धि ग्लोबल वार्मिंग की भयावहता की ओर ही इशारा करते हैं। यही नहीं, बाढ, सूखे, बीमारी, कुपोषण और अकाल सरीखे खतरे भी हमारे सिर पर मंडरा रहे है.

मैं लैड पेंसिल हूँ- साधारण लकडी की पैंसिल, जिसे सभी पढ़ने-लिखने वाले लड़के, लड़कियॉ और बड़े जानते हैं।

लिखना मेरी प्रवृत्ति और पेशा दोनों है। कुल मिला कर मै यहीं करती हूं।

    सरकार और निजी क्षेत्र के पारस्परिक सहयोग से छत्तीसगढ़ में हाथियों को बचाने की कोशिश की जा रही है। वन और वन्य जीवन की रक्षा के लिए होने वाले सरकारी प्रयास अब तक भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते रहे हैं। शेर और बाघ को बचाने वाले वन्य जीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय पार्कों में शेर और बाघों की संख्या में लगातार कमी देखने को मिली है। ऐसे में हाथियों को बचाने की छत्तीसगढ़ की मंशा रंग लाए इसकी शुभकामना ही की जा सकती है। शुक्र है कि सरकार अपनी योजना में निजी क्षेत्र को भी शामिल कर रही है। पर सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि योजना में प्रोत्साहन को किस प्रकार से फ

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