जीविका

किसानों व मछुआरों के आंदोलन के चलते सरकार पूर्व मेदिनीपुर जिले के हरिपुर इलाके में प्रस्तावित परमाणु बिजली संयंत्र निर्माण के फैसले से पीछे हट गई। इससे स्थानीय लोग खुश हैं। पूर्व वामो सरकार इस परियोजना को अपनी उपलब्धि बताती थी, और कहती थी कि इससे बंगाल को विद्युत में आत्मनिर्भर बनने में मदद मिलेगी। जिस समय यह घोषणा हुई थी, उस समय तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी नंदीग्राम कांड को लेकर आंदोलन कर रही थीं।

एक साल पहले तकरीबन इन्हीं दिनों में राहुल गांधी ने ओडिशा में कुछ आदिवासियों से कहा था कि वे दिल्ली में उनकी लड़ाई लड़ेंगे। नियमगिरि के डोंगरिया कोंड आदिवासी बिसार दिए गए और अब राहुल का फोकस यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर नोएडा के जाट किसानों व अन्य समूहों की ओर हो गया है।

राहुल गांधी का यह व्यवहार समूचे राजनीतिक वर्ग के चरित्र को प्रदर्शित करता है। देश की आजादी के बाद संविधान द्वारा चिह्न्ति ऐसे दो समूहों में आदिवासी भी एक थे, जिन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत थी। इसी वजह से संसद में व सरकारी नौकरियों में दलितों के अलावा आदिवासियों के लिए भी सीटें आरक्षित की गईं।

यूपीए-1 की विशेषता उसका सोशल एजेंडा था। यह सकारात्मक संकेत है कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरते जाने और भटकाव का शिकार दिखने के बाद अपनी दूसरी पारी में मनमोहन सिंह सरकार फिर उस एजेंडे की तरफ लौट रही है।

लंबे टालमटोल के बाद खाद्य सुरक्षा विधेयक अब कानून बनने के रास्ते पर है। खास बात यह है कि अधिकारप्राप्त मंत्री समूह ने जिस विधेयक को मंजूरी दी है, वह कमोवेश राष्ट्रीय सलाहकार समिति (एनएसी) द्वारा तैयार किए गए प्रारूप पर आधारित है।

आर्थिक और जीविका संबंधी स्वतंत्रता अमीरों के लिए तो बढ़ी है पर गरीबों के लिए नहीं. कनाडा के अग्रणी विचार मंच फ्रेज़र इंस्टिट्यूट द्वारा तैयार आर्थिक स्वतंत्रता पर जारी की गयी एक रिपोर्ट (इकोनोमिक फ्रीडम ऑफ़ द वर्ल्ड रिपोर्ट-2006) के अनुसार भारत की श्रेणी 1990 में 80 से 2004 में 53 हो गयी. पर इस आर्थिक स्वतंत्रता का लाभ सभी वर्गों ने नहीं उठाया. भारत में गरीब आज भी लाइसेंस और कोटा राज में ही जीते हैं और अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप से परेशान रहते हैं. आज के समय में, एक फैक्ट्री या कॉल सेंटर स्थापित करने के लिए कोई सरकारी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं है. पर यदि कोई व्यक्ति एक सड़क फेरीवाला, साइकिल रिक्शावाला, रेलवे कुली बनना चाहता है या चाय की दुकान लगाना चाहता है तो उसे लाइसेंस की ज़रुरत होती है. निचले स्तर के कामों के लिए जहां बहुत कम निवेश और कौशल की ज़रुरत होती है, वहाँ आज भी लाइसेंस अनिवार्य बने हुए हैं.

क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

प्राय: मुद्रास्फीति से निपटने के लिए सरकार फाइलें खोलती है और कुछ कागजी कार्रवाई करती है। इसके बाद कर्ज की उपलब्धता में कमी की जाती है, निर्यात पर रोक लगाई जाती है, आयात के नियमों में ढील दी जाती है और मल्टी-ब्रान्ड रीटेल के दरवाजे विदेशी निवेश के लिए खोलने की जरूरत को लेकर बहस शुरू हो जाती है। इस तरह के कदम उठाना व्यर्थ नहीं है, लेकिन ये ज्यादा कारगर साबित नहीं हुए हैं।

भारत एक कृषि प्रधान देश है और भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है। देश में कृषि का अहम योगदान है। फिर भी हमारे देश में कृषि और किसानों की स्थिति अच्छी नहीं है। भले ही अब तक सरकारों ने कृषि क्षेत्र के विकास के लिए उपायों की झड़ी लगा दी हो, लेकिन वास्तविकता यही है कि कृषि क्षेत्र का विकास दर बढ़ने के बजाय 0.2 प्रतिशत घटा है। लगातार बढ़ती आबादी और औद्योगीकरण के विस्तार के चलते कृषि योग्य जमीन घटने से यह संकट दिनोंदिन बढ़ रहा है। आजादी के समय जहां देश की लगभग 70-75 प्रतिशत जनसंख्या आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थी वह अब यह घटकर 52 प्रतिशत पर पहुंच गई है। सचमुच अपने देश के कृषि परिदृश्य और अन्य उत्पादन पर निगाह डाली जाए तो संतोष के साथ ढेर सारी चुनौतियां ही नजर आती है।

बीते सात वर्षों से भी अधिक समय से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार अपने विशिष्ट ब्रांड (तथाकथित) 'समावेशी विकास’ का नारा बुलंद करती आई है। इस मूल विचार के साथ तो कहीं कोई खामी नहीं है क्योंकि इसके मुताबिक आर्थिक विकास के लाभ हर व्यक्ति तक पहुंचाने की मंशा जताई गई है। खासतौर पर इसे गरीब और वंचित वर्ग के लोगों तक पहुंचाने की बात कही गई है। लेकिन इसके लिए जिन नीतियों को अपनाया गया उनमें तमाम गड़बडिय़ां देखने को मिलीं। इसमें गरीबी निरोधक कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च में काफी इजाफा करने पर जोर दिया गया। इन कार्यक्रमों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) तथा खाद्य और शिक्षा संबंधी अनेक अन्य कार्यक्रम शामिल हैं। इस रवैये से सरकार के खर्च तथा केंद्रीय बजट में की गई सब्सिडी में इजाफा होता गया। चूंकि इस दौरान कर से हासिल होने वाले राजस्व में बहुत अधिक इजाफा नहीं हुआ तो जाहिर है इससे राजकोषीय घाटे की स्थिति निर्मित हुई। इसके परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति संबंधी दबाव बढ़ा और ब्याज दरों में भी इजाफा हुआ।

संसद से लेकर सचिवालय तक और परिवार से लेकर समुदाय तक महिला अधिकारों के लिये महिलाओं की लड़ाई आज प्रतिशत के आकड़ों व आरक्षण की आग में बलि चढ़ रही है. विश्व महिला अधिकार दिवस के अवसर पर पिछले 6 दशको से अधिकारों की बाट में पिसती हुई महिला की वास्तविक तस्वीर देखने के लिये आप बुन्देलखण्ड की पत्थर मण्डी में काले सोने को तोड़ती और मौत की खदानों मे हथौड़ो की ठोकर लगाती महिलाओ को देखे तो यकीनन कह सकते है कि क्रशर के गुबार में खत्म हो रही है उन की ज़िन्दगी.

एक तरफ करोड़ों रु. खर्च कर सरकार विभिन्न रोजगार योजनाएँ चला रही है। जबकि दूसरी ओर ऐसे कई कानून हैं, जो आम आदमी को ईमानदारी से कमाने से रोकती हैं। रिक्शा चलाने वालों से संबंधित कानून इसका जीता जागता उदाहरण है।

दिल्ली में रिक्शा चलाना सरल नहीं है। दिल्ली नगर निगम साइकिल रिक्शा बायलॉज के प्रावधानों तथा सड़क जाम के मद्देनजर रिक्शा चलाने वालों पर तमाम बंदिशें लादी गयीं हैं। जैसे रिक्शा चलाने के लिए लाइसेंस अनिवार्य है। रिक्शा का मालिक ही रिक्शा चालक हो सकता है। एक व्यक्ति एक से अधिक रिक्शा नहीं रख सकता। अर्थात् किराये का रिक्शा चलाना अवैध है।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की भर्ती के लिए साक्षात्कार से वापस आ रहे लाखों युवक रेल की छत पर यात्रा को मजबूर हुए. इनमें से 19 की करेंट से मौत हो गयी. भर्ती के लिए दो लाख लोगों ने अर्जी दी थी. यह घटना दर्शाती है कि देश में बेरोजगारी कितनी व्यापक हो चुकी है. मिस्र् एवं ट्यूनीशिया में हाल में भड़के जनांदोलनों के पीछे भी बेरोजगारी ही है. यानि यह समस्या वैश्विक है.

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