जीविका

प्रतिबंध को समस्या का एकमात्र समाधान मानने के दुष्परिणाम के रूप में राजधानी दिल्ली में प्लास्टिक व गुटखे पर लगी पाबंदी के बावजूद खुले आम बिक्री, प्रयोग और सेवन के तौर पर देखा जा सकता है। गुटखे पर लगे प्रतिबंध के लगभग तीन माह और प्लास्टिक पर प्रतिबंध को एक माह बीत जाने के बावजूद दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां प्लास्टिक बैग व गुटखों की उपलब्धता व प्रयोग खुलेआम न दिखता हो। और तो और डलाव व कूड़ा घरों में कूड़े से ज्यादा प्लास्टिक व पॉलीथीन देखने को मिल रहे हैं। मजे की बात तो यह है कि गुटखा उत्पादकों ने इस प्रतिबंध का भी आसान तोड़ निकाल लिया है। चूंकि पान मसाला व तंबा

उदाहरण के लिए चीनी व्स्तुओं पर प्रतिबंध उनकी घटिया गुणवत्ता व इसके अर्थव्यवस्था व स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए लगाया गया है। लेकिन भारतीय बाजार चीनी वस्तुओं से भरे पड़े हैं और खिलौनों आदि में प्रयुक्त रंग के संपर्क में आने के कारण बच्चों को कैंसर, दिल व फेफड़े की बीमारी हो रही है। क्या ही अच्छा होता कि चीनी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोल दिए जाए लेकिन इसके पूर्व उनके लिए कड़े मानक तय कर दिए जाएं और उनका अनुपालन भी सुनिश्चित किया जाए। इससे देश को कई फायदे होंगे। एक तो प्रतिबंध समाप्त होने के कारण चीनी सामान वैध तरीके से कस्टम व आयात शुल्क अदा कर देश

जब भी दिल्ली में आम उपभोक्ता सब्जियों की महंगाई को लेकर हायतौबा मचाते हैं तो अक्सर सरकार राजधानी की सबसे बड़ी थोक मंडी आजादपुर में खरीदी जाने वाली सब्जियों के थोक भावों का विज्ञापन छपवाती है। पिछले कई सालों से इन विज्ञापनों को जिन्होंने भी देखा है, वे जानते हैं कि इनसे साफ पता चलता है कि आज तक किसान को कभी भी पालक के लिए 10 रुपये किलो का रेट नहीं मिला। बथुआ, गोभी कभी भी सीजन में 10 रुपये किलो से ऊपर यहां किसानों से नहीं खरीदी गई। मूली के भाव सुनकर तो लगता है, जैसे हम रामराज में जी रहे हों। डेढ़ रुपये, दो रुपये किलो अक्सर मूली बिकती है।

खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर बहस अंततः समाप्त हो गई। उम्मीद है कि अब इसने उन अन्य गरमागरम बहसों की आत्माओं के बीच अपनी शांतिपूर्ण जगह बना ली होगी, जिनसे हमारा लोकतांत्रिक देश यदा कदा गुजरता रहता है। हर समय लगता है मानो यह हमारे जीवन मरण का मुद्दा हो और हम विनाश के कगार पर खड़ें हों। अगर आप उनमें से हैं, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरोधियों द्वारा की गई बर्बादी की भविष्यवाणियों से डरते हैं तो यहां प्रस्तुत है इसी तरह की पहले हुई कुछ बहसों का छोटा सा इतिहास। यह बताने के लिए कि लाखों भारतीय नौकरी से निकालकर फेंक नहीं दिए जाएंगे। और भारत वॉलमार्ट या टेस्को का उपनिवेश

विपक्षी दलों ने गुरूवार को खुदरा व्यवसाय में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर किसी प्रकार ‘बंद’ कराने में तो सफल रहें लेकिन छोटे दुकानदारों, जिनके हितों की रक्षा के नाम पर यह सब हुआ वे ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उनके व्यवसाय पर कथित हमले का आशंका से अविचलित दिखें। टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में किराना दुकान संचालकों ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि वे बेरोजगार हो जाएंगे।

बांस के पेड़ की बजाए घास होने के तथ्य के वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित और संवैधानिक तौर पर स्वीकृत हो जाने के बावजूद नौकरशाही और पहले से जारी व्यवस्था के कारण अब तक इसे घास के रूप वैधानिक मान्यता नहीं मिल सकी है। जिसके कारण इसकी कटाई और व्यवसायिक प्रयोग की मनाही है। यदि इसे घास के रूप में पर्यावरण और वन मंत्रालय से वैधानिक मान्यता मिल जाती है तो देश में न केवल हरे वृक्षों की कटाई में कमी आएगी बल्कि इसके सहारे आजिविका कमाने वाले लाखों आदिवासियों व जंगल पर निर्भर जनजातियों को व्यवसाय भी उपलब्ध हो सकेगा। यहां तक कि स्वयं योजना आयोग का भी मानना है कि इससे 5 करोड़ लोगों के रोजगार

जीविका एशिया लाईवलीहुड डॉक्यूमेंटरी फिल्म फेस्टीवल 2012 में शिरकरत करेंगे बालीवुड के ‘शो मैन’ सुभाष घई; इंडिया हैबिटेट सेंटर में 2 सितंबर तक चलने वाले फिल्म फेस्टिवल के दौरान 18 डाक्यूमेंटरी फिल्मों का होगा प्रदर्शन

रिक्शा-टैक्सी चालकों को शहर की यातायात व्यवस्था के लिए परेशानी का सबब मान नए-नए नियम बना उन्हें नियंत्रित करने और इस क्रम में परिवहन व्यवस्था व चालकों की रोजी रोटी दोनों के साथ खिलवाड़ करने वाले टाऊन प्लानर्स व नीति-निर्धारकों को नासिक के यशवंतराव चाह्वाण ओपन यूनिवर्सिटी से सबक लेनी चाहिए। यूनिवर्सिटी के मुताबिक यह काम आम नहीं बेहद खास है और इसके लिए विशेष हुनर होना आवश्यक है। यदि ड्राइवरों को बेहतर प्रशिक्षण प्रदान किया जाए तो एक साथ कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। यूनिवर्सिटी के नीति-निर्धारकों के मुताबिक ड्राइवरों को प्रशिक्षित कर न केवल शहर में बढ़ते वाहनों के दबाव

नई दिल्ली- सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा जारी सालाना वार्षिक रिपोर्ट “इकोनॉमिक फ्रीडम ऑफ द वर्ल्ड 2011’’ में भारत 94वें पायदान पर है। बीते साल वह 90वें स्थान पर था। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के अध्यक्ष पार्थ शाह ने कहा, “बीते साल के मुकाबले भारत की रैंकिंग में गिरावट निराशाजनक है। आर्थिक आजादी बढ़ने के बजाय घटी है। व्यापक भ्रष्टाचार और लाइसेंस राज की परेशानियों ने भारतीयों के लिए बेहतर और अपनी क्षमताओं के साथ जीवन-यापन को बेहद मुश्किल बना दिया है।’’

गरीबी रेखा के हालिया विवाद से दो चीजें साबित होती हैं। पहली, संख्याओं को अलग-अलग तरीके से रखकर आंकड़ों का भ्रम पैदा किया जा सकता है। दूसरी, भारतीय मध्यवर्ग में दोहरे चरित्र और गरीबी को झुठलाने की बीमारी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर योजना आयोग के हलफनामे के बाद मीडिया में भूचाल आ गया। ये कोई नए आंकड़े नहीं थे, बल्कि विश्लेषक इनसे पहले से परिचित थे। इसमें शहरों में रोजाना 32 रुपये कमाने वाले को गरीबी रेखा के ऊपर माना गया। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह आंकड़ा 26 रुपये रखा गया है। मीडिया और मध्यवर्ग चीख-चीखकर यह सवाल पूछने लगे कि कैसे कोई इतने कम पैसों में गुजारा कर सकता है। कई रिपोर्टों का हवाला दिया गया, जिनके मुताबिक पटरी पर रेहड़ी लगाने वाले भी रोजाना बस किराए में ही 32 रुपये खर्च कर देते हैं।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

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