जीविका

पिछले छह वर्षों में खेत मजदूरों की मजदूरी काफी तेजी से बढ़ी है और इसके बढ़ने की रफ्तार चीजों की कीमतें बढ़ने की रफ्तार से ज्यादा रही है। इसका नतीजा ग्रामीण मजदूरों का जीवन स्तर सुधरने रूप में दिखाई पड़ा है। 2007-08 से लेकर अबतक देश के इस सर्वाधिक विपन्न तबके की आय में 6.8 प्रतिशत की वास्तविक सालाना बढ़त दर्ज की गई है। इस शानदार रुझान के पीछे क्या है?

 

- अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के दिन रेहड़ी-पटरी व फेरी वालों के लिए मित्रवत व सुविधाजनक कानून बनाने की मांग पर बोले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष

- समस्या के समाधान के लिए सियासतदारों पर निर्भर न रहने की दी सलाह

दिल्ली में एकबार फिर से पॉलीथिन के प्रयोग व इसकी खरीद-बिक्री को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है। पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 15 के तहत प्रतिबंध की अनदेखी करने वालों पर 10 हजार से एक लाख रूपए तक का आर्थिक दंड अथवा सात वर्ष तक की सजा अथवा दोनों का प्रावधान किया गया है। इसके पूर्व वर्ष 2009 में भी दिल्ली में प्लास्टिक के प्रयोग पर रोक लगाया गया था। लेकिन उस समय 40 माइक्रोन से मोटे प्लास्टिक व उससे निर्मित वस्तुओं, कैरीबैग आदि को प्रतिबंध से मुक्त रखा गया था। हाल ही में राजधानी में गुटखे पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। हालांकि गुटखा, प्लास्टिक आदि के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर प

प्रायः समाज शास्त्रियों, समता व समानता के पुरोधाओं और समाजसेवी राजनेताओं को शहरों की मलिन बस्तियों व झुग्गी झोपड़ियों की बढ़ती तादात पर अपने घड़ियाली आंसू बहाते और वहां रहने वाले लोगों के उद्धार के लिए भविष्य के वादों की घुट्टी पिलाते हम सबने सुना और देखा होगा। शहर की मलिन बस्तियों से संबंधित जब कोई रिपोर्ट किसी एनजीओ, कमेटी अथवा जनगणना आयोग द्वारा प्रकाशित की जाती है, अलग-अलग वर्ग द्वारा अपने अपने ढंग से इसे अमानवीय, यातना व नर्क जैसी उपमाओं से नवाजा जाना शुरू कर दिया जाता हो यहां तक कि शहरीकरण को ही इस पूरे वाकए के लिए दोषी साबित करने की भी होड़ शुरू हो जाती है। मजे की

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

खुदरा व्यापार में 51 फीसदी विदेशी निवेश के मुद्दे पर ‘संसद से सड़क तक’ घमासान छिड़ने और काफी जद्दोजहद के बाद नियम 184 के तहत संसद में बहस और वोटिंग के बाद विदेशी खिलाड़ियों के लिए देश में रिटेल स्टोर खोलने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि विदेशी निवेश के नफा-नुकसान को लेकर लोगों के मन में अब भी संशय बना हुआ है। उधर, वॉलमार्ट द्वारा भारत में विदेशी निवेश के पक्ष में समर्थन हासिल करने के लिए की गई लॉबिंग और इस मद में खर्चे गए सवा सौ करोड़ रुपए की भारी भरकम राशि ने एक नए बहस को हवा दे दी है। एफडीआई के इन्हीं मसलों पर भारत के पहले उदारवादी वे

Author: 
आलोक पुराणिक

क्या आपने संसद के दोनों सदनों में इस हफ्ते किराना में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर हुई बहस टेलीविजन पर देखी? यदि नहीं, तो कृपया लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही जरूर पढ़िए। आप पाएंगे कि हमारे नेताओं के शब्द खोखले हो गए हैं और विचार भोथरे। न उनके विरोध का कोई अर्थ है और न समर्थन पर कोई सार्थक तर्क.

जब से भारतीयों विशेषकर खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध कर रही राजनैतिक पार्टियों को पता चला है कि वालमार्ट ने भारत में एफडीआई को मंजूरी देने के प्रति सहमति कायम कराने के लिए ‘लॉबिंग’ के मद में सवा सौ करोड़ रूपए की भारी भरकम धनराशि खर्च की है, उनकी भृकुटि तन गई है। एफडीआई के मुद्दे पर लोकसभा में वोटिंग के दौरान हुई हार से तिलमिलाए राजनैतिक दलों को जैसे सरकार को गलत और खुद को सही साबित करने का एक बड़ा मौका मिल गया। मुख्य विपक्षी दल सहित अन्य दलों ने जिस प्रकार लॉबिंग पर हाय तौबा मचाना शुरू किया और संसद की कार्रवाई में गतिरोध पैदा किया वह उनकी अधीरता

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