जीविका

संसद से लेकर सचिवालय तक और परिवार से लेकर समुदाय तक महिला अधिकारों के लिये महिलाओं की लड़ाई आज प्रतिशत के आकड़ों व आरक्षण की आग में बलि चढ़ रही है. विश्व महिला अधिकार दिवस के अवसर पर पिछले 6 दशको से अधिकारों की बाट में पिसती हुई महिला की वास्तविक तस्वीर देखने के लिये आप बुन्देलखण्ड की पत्थर मण्डी में काले सोने को तोड़ती और मौत की खदानों मे हथौड़ो की ठोकर लगाती महिलाओ को देखे तो यकीनन कह सकते है कि क्रशर के गुबार में खत्म हो रही है उन की ज़िन्दगी.

एक तरफ करोड़ों रु. खर्च कर सरकार विभिन्न रोजगार योजनाएँ चला रही है। जबकि दूसरी ओर ऐसे कई कानून हैं, जो आम आदमी को ईमानदारी से कमाने से रोकती हैं। रिक्शा चलाने वालों से संबंधित कानून इसका जीता जागता उदाहरण है।

दिल्ली में रिक्शा चलाना सरल नहीं है। दिल्ली नगर निगम साइकिल रिक्शा बायलॉज के प्रावधानों तथा सड़क जाम के मद्देनजर रिक्शा चलाने वालों पर तमाम बंदिशें लादी गयीं हैं। जैसे रिक्शा चलाने के लिए लाइसेंस अनिवार्य है। रिक्शा का मालिक ही रिक्शा चालक हो सकता है। एक व्यक्ति एक से अधिक रिक्शा नहीं रख सकता। अर्थात् किराये का रिक्शा चलाना अवैध है।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस की भर्ती के लिए साक्षात्कार से वापस आ रहे लाखों युवक रेल की छत पर यात्रा को मजबूर हुए. इनमें से 19 की करेंट से मौत हो गयी. भर्ती के लिए दो लाख लोगों ने अर्जी दी थी. यह घटना दर्शाती है कि देश में बेरोजगारी कितनी व्यापक हो चुकी है. मिस्र् एवं ट्यूनीशिया में हाल में भड़के जनांदोलनों के पीछे भी बेरोजगारी ही है. यानि यह समस्या वैश्विक है.

भारत 2020-25 तक विश्व की दूसरी महाआर्थिक शक्ति बनने का अनुपम स्वप्न संजोए हुए है। इस दिशा में आर्थिक मंदी, महंगाई और वैश्विक उतार-चढ़ाव के बावजूद इसकी यात्रा आगे बढ़ रही है। देश में करोड़पति, अरबपति और खरबपतियों की आबादी भी बढ़ रही है। 20 से 25 करोड़ के तथाकथित 'ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास' के अस्तित्व में आने का दावा भी किया जा रहा है। अब भारत को अमीर राष्ट्रों के समूह (जी-8, जी-20 आदि) में शामिल होने का न्योता भी दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद के हम प्रबल दावेदार बन चुके हैं। दो दशकों से वैश्वीकरण, निजीकरण, उदारीकरण और विनिवेशीकरण का अश्वमेध अबाध

क्या खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार कागजी वायदों के सिवाय कुछ ठोस उपायों के बारे में सोच सकती है? हमारा मानना है कि अमूल की तर्ज पर किसानों को कोऑपरेटिव और कंपनियों के रूप मे संगठित किया जाना चाहिए और इन एजेंसियों के जरिए व्यवस्थित रीटेल बनाया जाना चाहिए।

हाल ही में केंद्र सरकार ने बांस को पेड़ नहीं, घास की संज्ञा दे दी है. इस आधिकारिक पुष्टि के साथ ही लम्बे समय से बांस को घास घोषित किये जाने के लिए चल रहे अभियान को राहत मिली है. इस आधिकारिक पुष्टि से जंगलो में रहने वाले आदिवासियों के अधिकार भी स्थापित हो सकेंगे.

बांस के घास घोषित होने के साथ ही उम्मीद है कि हमारे जंगलों का नुकसान कुछ कम होगा और देश के करोड़ों लोगों को रोज़गार मिल सकेगा. साथ ही साथ देश के आदिवासियों को अपने जंगलों और उन से मिलने वाले फायदों पर बेहतर इख्तियार मिल सकेगा.

बुन्देलखण्ड के चार जनपद बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर में बीते ढाई दशकों से प्राकृतिक संपदाओं की बेइतहां लूट जारी है। लूट के दुष्परिणामों का असर किसानों, मजदूरों और अन्य श्रमजीवियों पर पड़ रहा है। घटता जलस्तर, भू-प्रदूषण, कम होती वर्षा, विस्थापित होते हुए किसान-मजदूर और साल दर साल बदहाल होती खेती इसके बड़ी सामान्य उदाहरण हैं।

एक शाम, मैं सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के एक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर घिटोरनी मेट्रो स्टेशन से दिल्ली विश्वविद्यालय वापस आ रहा था. अगले स्टेशन से लोगों का जो रेला शुरू हुआ कि मुझे ‘शेर की मांद में आने वालो के पंजो के ही निशान मिलने वाली बात’ याद आ गयी. केवल आने वाले दिख रहे थे, जाने वाला कोई नहीं. एक सतत शाश्वत प्रक्रिया, ‘अगला स्टेशन ….. है’ की अनुगूंज, ट्रेन धीमी होती, दरवाजे खुलते, घर जाने को आतुर जन सैलाब अंदर घुसता. बाहर से आने वाले गतिज ऊर्जा से भरे हुए थे तो अंदर वाले, दब दब कर स्प्रिंग सदृश स्थितिज ऊर्जा से भरते जा रहे थे.

अनेक वर्षों से कई सामाजिक-राजनीतिक संगठनों द्वारा दलित समस्याओं को लेकर देश में जगह-जगह चर्चाएं-परिचर्चाएं की जाती रही हैं. सवाल उठाया जाता रहा है कि आखिर कब तक दलित पूरी तरह से आर्थिक-सामाजिक रूप से बेहतर होगा और वह भी समाज में उसी तरह सम्मान के साथ निडर होकर जी सकेगा जैसे समाज के अगड़े जी रहे हैं. ऐसे सवाल भी उठाये जा रहे हैं जो दलितों के लिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लागू की गयी योजनाओं के अपेक्षित परिणाम न आने को लेकर हैं.

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