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जानिए क्यों अकोला (महाराष्ट्र) के किसान जयंत रामचंद्रन बापट प्रतिबंधित एचटीबीटी बीज के प्रयोग को जायज ठहरा रहे हैं। और यह भी जानें कि क्यों उन्हें यह बयान देना पड़ता है कि 'आतंकवाद से व्यक्ति एक बार मरता है लेकिन सरकार के इस प्रावधान के कारण महिला किसान रोज मरती हैं।' किसान सत्याग्रह के दौरान की गई बातचीत के अंश..    - आजादी.मी

महान समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम ठाकुरदास बंधोपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था। माता पिता ने इन्हें ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय नाम दिया था लेकिन विभिन्न विषयों पर इनकी पकड़ और ज्ञान के कारण उनके गांव के लोगों ने उन्हें विद्यासागर नाम की उपाधि प्रदान की थी।

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पुराने जमाने में मार्ग से गुजरने का पहला अधिकार ऊंची जाति के लोगों को होता था। नीची जाति के लोग तभी निकल सकते थे जब ऊंची जाति के लोग पहले वहां से गुजर चुके हों। यानि कि यदि दो लोगों को रास्ते से गुजरना हो तो रास्ते से गुजरने का पहला अधिकार ऊंची जाति के व्यक्ति का था उसके बाद ही नीची जाति का व्यक्ति वहां से निकल सकता था। आज के जमाने में शहरों की सड़कों पर ट्रैफिक लाइट्स होती हैं। ट्रैफिक लाइट्स कास्ट ब्लाइंड होती हैं यानि कि वो जात-पात को नहीं देखतीं हैं। आपकी जाति ऊंची हो या नीची हो, रेड लाइट पर सबको रूकना होता है और ग्रीन लाइट होने पर सबको न

बहुत से भारतीयों की धारणा अभी भी यही है कि बाजार धनी लोगों को और अधिक धनी तथा गरीबों को और अधिक गरीब बनाता है तथा यह भ्रष्टाचार एवं क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह एक गलत धारणा है। वास्तविकता यही है कि पिछले दो दशकों में व्यापक तौर पर समृद्धि बढ़ी है और तकरीबन 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकले हैं। बावजूद इसके लोग अभी भी बाजार पर अविश्वास करते हैं। आंशिक तौर पर इसके लिए आर्थिक सुधारकों को दोष दिया जा सकता है, जो प्रतिस्पर्धी बाजार की विशेषताओं अथवा धारणा को ब्रिटेन की मार्गरेट थैचर की तरह आम लोगों को नहीं बता सके। सौभाग

Author: 
गुरचरण दास

इस बात से कोई भी इंकार नहीं करेगा कि गुणवत्ता युक्त शिक्षा ही 21वीं सदी के भारत की दशा और दिशा तय करेगी। केंद्र और राज्य सरकारें भी अब इस ओर काफी गंभीर दिखाई प्रतीत होती हैं। मोदी सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति लाने का प्रयास इसकी एक बानगी है। हालांकि देश में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था विशेषकर प्राथमिक शिक्षा की हालत में सुधार होने की बजाए खराबी ही आई है।

भारत बहु विविधताओं वाला देश है। अर्थात यहां की भौगोलिक और पारिस्थितिक स्थिति, रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, भाषा-संस्कृति, जरूरतें आदि लगभग सभी चीजों में भिन्नताएं हैं। यह एक ऐसी अनूठी विशेषता है जिसपर प्रत्येक देशवासियों को गर्व है और हम सभी का यह फर्ज है कि इस विशेषता को सहेज कर रखें। किसी दार्शनिक ने जब ‘एक कमीज सभी पर बराबर नहीं अंट सकती’ (वन शर्ट डज़ नॉट फिट ऑल) का दर्शन प्रस्तुत किया होगा तो कहीं न कहीं हमारे देश की विविधताएं उसके जेहन में अवश्य रही होगी।

पब्लिक पॉलिसी थिंकटैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी, एटलस नेटवर्क व देश के पहले उदारवादी हिंदी वेबपोर्टल आजादी.मी के संयुक्त तत्वावधान में पत्रकारों के लिए आयोजित होने वाले ipolicy वर्कशॉप के लिए आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ा दी गयी है। लैंसडाऊन (उत्तराखंड) की खूबसूरत वादियों में स्थित वनवासा रिसॉर्ट में 12 से 14 जुलाई 2019 तक चलने वाले इस वर्कशॉप के लिए अब 25 जून 2019 तक आवेदन किया जा सकता है। अधिक जानकारी https://bit.ly/2N14h8k पर.. 
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14वर्ष तक की आयु के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया। इस कानून के आने के बाद स्कूलों में छात्रों का नामांकन वैश्विक स्तर (औसतन 95%) के लक्ष्य के पास तो पहुंच गया लेकिन सीखने के परिणामों के मामले में स्तर रसातल में पहुंच गया।

पब्लिक पॉलिसी थिंकटैंक सेंटर फार सिविल सोसायटीएटलस नेटवर्क के संयुक्त तत्वावधान में आजादी.मी एकबार फिर लेकर आए हैं पत्रकारों के लिए अवार्ड विनिंग सर्टिफिकेट कार्यक्रम ipolicy वर्कशॉप। लैंसडाऊन (उत्तराखंड) की खूबसूरत वादियों में स्थित वनवासा रिसॉर्ट में 12 से 14 जुलाई 2019 तक चलने वाले ipolicy वर्कशॉप में शामिल होने के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख बढ़ा दी गई है। अब आईपॉलिसी वर्कशॉप के लिए 25 जून 2019 तक आवेदन किया जा सकता है। तीन दिनों (

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