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देश में सभी छात्रों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा आसानी से, पड़ोस में और कम खर्च में प्राप्त हो सके, अफोर्डेबल अर्थात बजट स्कूलों का यही ध्येय है। स्वप्रेरित एडुप्रेन्योर्स (शिक्षा प्रदाता) इसी उद्देश्य से काम करते हैं लेकिन सरकारी तंत्र और नियमन संबंधी बाधाएं उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं। कम से कम बजट स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा का यही मानना है। इस वीडियो में देखिए कुलभूषण शर्मा और क्या क्या आरोप सरकार और सरकारी तंत्र पर लगा रहे हैं.. आजादी.मी

कुछ दिन पहले विश्व बैंक ने भारत और दुनिया में व्यवसाय करने की सुगमता से संबंधित अपनी वार्षिक सूची को जारी किया था। भारत ने रैंकिंग में 23 स्थान की छलांग लगाकर 2017 में 100 के मुकाबले इस वर्ष 77वां स्थान हासिल किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन यह हमारे आर्थिक स्वास्थ्य या हमारे कारोबारी माहौल की स्थिति के अंतिम शब्द से बहुत दूर है। इसके विपरीत सोचना गलत होगा। भारतीय सरकारी व्यवस्था एक जटिल जानवर के समान है। सरकारी मशीनरी, प्रक्रिया और नियमों के स्तर पर राज्यों में बहुत अधिक भिन्नताएं हैं। देश को यदि व्यापक परिदृश

मोदी सरकारी द्वारा नई शिक्षा नीति के मसौदे को तैयार करने के लिए गठित के. कस्तूरीरंगन कमेटी को हाल ही में चौथा विस्तार प्रदान किया गया है। अब इस कमेटी के पास नई शिक्षा नीति से संबंधित फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने के लिए 15 दिसंबर तक का समय होगा। इसके पूर्व कमेटी को तीसरा कार्य विस्तार 30 अक्टूबर तक के लिए प्रदान किया गया था। मीडिया में आई रिपोर्ट के मुताबिक कमेटी ने सरकार को ‘जीरो ड्रॉफ्ट’ सौंप दिया गया था, लेकिन सरकार की मंशा शायद इसे आम चुनावों तक टालने की ही प्रतीत होती है। खैर..

● स्कूल स्थापित करने और चलाने के लिए आवश्यक मौजूदा कठोर नियमोँ को जितनी जल्दी हो सके आसान किया जाना चाहिए
● शिक्षा के क्षेत्र में नव प्रवेशियों के लिए सरकार को ‘स्कूल खोलने और चलाने की सुगमता’ रैंकिंग अभियान की शुरूआत करनी चाहिए और स्कूलों को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त करने के नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव करना चाहिए

● प्राइवेट स्कूल लर्निंग आउटकम के मामले में सरकारी स्कूलोँ से ज्यादा आगे नहीं हैं
● तो सरकारी स्कूलोँ में होने वाले दाखिलों में गिरावट क्यों देखने को मिल रही है?

वर्ष 2010-11 में, 4,435 सरकारी स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन पर 486 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इन सभी स्कूलोँ में 14,000 शिक्षक अधिक थे। और इन सभी 4,435 स्कूलोँ में पढ़ने वाले बच्चोँ की कुल संख्या करीब शून्य थी।

नए साल में नया संकल्प लेने का वक्त आ गया है। ऐसे में मैं एक नियम में सुधार की बात करूंगी, जो मेरे हिसाब से इस साल के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है और वह है शिक्षा क्षेत्र को स्वतंत्रत किया जाए और स्कूलोँ को लाभ कमाने का अवसर दिया जाए।

आरटीई एक्ट लागू होने के बाद से लगातार सरकारी स्कूलों में नामांकन की संख्या घटी है जबकि नामांकन कराने वाले छात्रों की कुल संख्या में तेजी से ईजाफा हुआ है। पर यदि ऐसा है तो बच्चे जा कहां रहे हैं.. ! जी हां, बच्चे जा रहे हैं निजी स्कूलों, विशेषकर ऐसे स्कूलों में जहां फीस तो न्यूनतम है ही गुणवत्ता भी सरकारी स्कूलों की तुलना में बेहतर है। ऐसे में सरकार की फजीहत होना लाजमी है।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानी भारत की चुनाव प्रणाली आज बहस के केंद्र में है। सत्ताधारी दल भाजपा के साथ-साथ अनेक दलों, संस्थाओं और बुद्धिजीवियों का मानना है कि देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों, इस दिशा में ठोस पहल करनी चाहिए। हालांकि एकसाथ चुनाव कराने के विचार से असहमति रखने वाले दलों की भी कोई कमी नहीं है। कांग्रेस सहित अनेक दल- जैसे तृणमूल कांग्रेस, बसपा, टीडीपी और कम्युनिस्ट पार्टी, ने एक साथ चुनाव कराने से असहमति व्यक्त की है। इस बहस में सहमति और असहमति के पाटों पर खड़े दो खेमों के अपने-अपने तर्क हैं। लेकिन यह बहस आज के दौर

Author: 
शिवानंद दिवेदी

आरंभिक स्तर की पब्लिक पॉलिसी ट्रेनिंग वर्कशॉप ipolicy में शामिल हो चुके पत्रकारों के लिए अपनी लेखनी को और धार देने का सुनहरा मौका। देश के पहले और एकमात्र उदारवादी हिंदी वेबपोर्टल आज़ादी.मी लेकर आए हैं पत्रकारों के लिए 3 दिनों का उन्नत (advance ipolicy) वर्कशॉप। 28-30 सितंबर 2018 तक चलने वाले इस वर्कशॉप का आयोजन थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस), एडलगिव और एटलस नेटवर्क के सहयोग से किया जा रहा है। उत्तराखंड के जिम कॉर्बेट में आयोजित होने वाले इस वर्कशॉप के लिए आवेदन (पंजीकरण) प्रक्रिया शु

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