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रेहड़ी-पटरी और थड़ी ठेला लगाकर अपनी व अपने परिवार के लिए परिश्रम से रोजी रोटी कमाने वाले पथ विक्रेताओं (स्ट्रीट वेंडर्स) के अधिकारों की रक्षा के लिए वर्ष 2014 में स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट पास किया गया था। लेकिन कानून पास होने के पांच वर्ष बीत जाने के बावजूद दूर दराज के ही नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में भी रेहड़ी पटरी व्यवसायियों का उत्पीड़न लगातार जारी है। स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट 2014 के अनुसार शहर के प्रत्येक वार्ड को एक टाऊन वेंडिंग कमेटी गठित करनी होगी जिसके 40% सदस्य स्वयं पटरी व्यवसायी होंगे। यह कमेटी उस वार्ड में रेहड़ी पटरी लगाने वालों

हर कोई जानता है कि भारत में शिक्षा प्रणाली कितनी खराब है – लेकिन कितना अजीब है कि, जब चुनाव होते हैं तो यह एक बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में राज्य की विफलता माता-पिता के वोट देने के तरीके को बदलती नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में गड़बड़ी की स्थिति का सामान्यीकरण हो गया है - जो उदासीनता को स्पष्ट करती है। लेकिन हमारे देश का भविष्य हमारे बच्चों को मिलने वाली शिक्षा पर निर्भर करता है। हमें इसे ठीक करने की जरूरत है।

दशकों तक भारत में ‘अर्थशास्त्र’ का तात्पर्य गरीबी का अध्ययन रहा है। कुछ समय पहले तक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने की शुरूआत ‘गरीबी के दोषपूर्ण चक्र’ नामक सिद्धांत (Theory of vicious circle of poverty) से की जाती थी। इस सिद्धांत के अनुसार गरीबी को दूर नहीं किया जा सकता है। गरीब लोग तथा गरीब राष्ट्र के लिए गरीब रहना नियति है। वास्तव में यह कोरी बकवास है। यदि यह सत्य होता तो संसार आज भी पाषाण युग में होता। जीवनियों (Biography) का इतिहास ‘गरीबी से अमीरी’ का सफर करने वाली कथाओं से भरा पड़ा है। हांगकांग और अमेरिका गरीब अप्रवासियों (immigrants) द्वार

टैगोर जयंती विशेषः

“हिंदुओं के साथ मुसलमानों का अगर कहीं कोई विरोध है तो मैं हिंदू नहीं हूँ, ऐस कहकर इस विरोध को समाप्त करने की इच्छा, फौरी तौर पर समस्या का सहज समाधान लग सकता है; लेकिन सही मायने में यह उपयुक्त नतीजा नहीं निकाल सकता है। ऐसा कहने से हिंदू-मुस्लिम का विरोध पहले जैसा ही रह जाता है। इससे केवल इतना ही होता है कि ऐसा कहकर हम खुद को इस समस्या से अलग कर लेते हैं।

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लोकसभा चुनावों के लिए चौथे चरण का मतदान हो चुका है और पांचवे चरण के लिए कैंपेनिंग अपने चरम पर है। सभी राजनैतिक दल अधिक से अधिक सीटें जीतने के लिए तमाम लोक लुभावन वादे कर रहे हैं और आश्वासनों की झड़ी लगा रहे हैं। राजनैतिक मंच से सबसे अधिक चर्चा यदि किसी विषय पर हो रही है तो वह बेरोजगारी और किसान आत्महत्या का मुद्दा ही है। इसके बात बारी धार्मिक कट्टरता, न्यूनतम आय गारंटी, महागठबंधन, बालाकोट सर्जिकल एयर स्ट्राइक और रफैल डील की आती है।

स्वतंत्रता सर्वोच्च राजनैतिक मूल्य के रूप में
समाजवादी मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था की इस आधार पर भी आलोचना करते हैं कि यह असमानता को बढ़ावा देती है। उनका विश्वास है कि राज्य के हस्तक्षेप व नियंत्रण से वे समानता को बढ़ावा दे सकते हैं। यही जवाहर लाल नेहरू का समाज का समाजवादी ढांचा (Socialistic pattern of society) नामक ‘महान’ दर्शन था।

संदर्भः मोदी से मोहभंग और राहुल गांधी पर भरोसा न होने से उनके सामने वोट देने का विकल्प नहीं

Author: 
गुरचरण दास

मेरा बेटा समलैंगिक है और अब मुझे इसे स्वीकार करने में कोई डर नहीं है। वह बीते 20 वर्षों से अपने पार्टनर के साथ आपसी विश्वास और प्रसन्नता भरी ज़िंदगी बिता रहा है। मेरे परिवार व नज़दीकी मित्रों ने इसे गरिमापूर्वक स्वीकार किया है। लेकिन, मैं इसके बारे में सार्वजनिक तौर पर बोलने से डरता था कि कहीं उसे कोई नुकसान न हो जाए। सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया। मेरी पत्नी और मुझे अचानक लगा कि जैसे बहुत बड़ा बोझ सिर से उतर गया है। मुख्य न्यायाधीश के बुद्धिमत्ता भरे शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे, 'मैं जो हूं, वैसा हूं, इसलिए

Author: 
आलोक पुराणिक

मैं अपनी माँ को कुछ समय पहले तक सब्जी विक्रेताओं के साथ मोलभाव करते हुए देखती थी। विक्रेता दो तीन रूपये कम कर देते थे। कुछ दिनों मैं अक्सर खुद को ऐसा ही करता देखती हूं और फिर झुंझलाती हूं। यह एक तरह की हम सबकी किसानों के प्रति विडंबना है। उस दो तीन रुपये अथवा कल और आज में  इससे क्या बदल गया ? आमतौर पर, एक सब्जी विक्रेता को कीमत कम करने से इनकार करते हुए निराशा होगी, एक वयस्क के रूप में मेरी योग्यता पर वह सवाल उठाएगा। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य हमें उनके बेहतरी के लिए क्या करना है कुछ नहीं पता है। 

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