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मार्क्स ने कहा था धर्म अफीम है। लेनिन ने कहा था धर्म केवल एक निजी मामला नहीं है। आज हमारे बीच न मार्क्स हैं न लेनिन। मगर धर्म है। मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत पुराने पड़ चुके हैं, मगर धर्म पुराना होकर भी खत्म नहीं हुआ। यह निरंतर फैल रहा है। या कहें हम धर्म को अपनी सुरक्षा के लिए फैला रहे हैं। हम डरे हुए हैं। धर्म से अलग नहीं होना चाहते। धर्म और ईश्वर हमारा सहारा हैं। यहां हर कोई धर्म और ईश्वर की छतरी में खुद को सुरक्षित महसूस करता है।

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एक तरफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जूझती और दूसरी तरफ बिहार में करारी हार झेलने के बाद, कांग्रेस एक नाज़ुक दौर से गुज़र रही है. इसी माहौल के बीच पार्टी ने अपनी स्थापना के 125 वर्ष भी पूरे किये और अपना 83वां महाधिवेशन दिल्ली में आयोजित किया. भ्रष्टाचार के मामलों पर विपक्ष की घेराबंदी, बिहार में चुनावी पराजय, राहुल गांधी से जुड़े कथित विकिलीक्स खुलासे, कुछ अन्य राज्यों में  आने  वाले विधानसभा चुनाव की तय्यारी और बढ़ती महंगाई समेत कई मुद्दों पर इस अवसर पर चर्चा हुई.

चायनीज़ दबाव को ना मानते हुए, भारत ने नोर्वे में चीन के लोकतंत्र समर्थक आन्दोलनकारी लियु श्याबाओ को मिलने वाले नोबेल शांति पुरस्कार समारोह में हिस्सा लिया. ऐसा कदम उठाते हुए, भारत ने स्वतंत्रता और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का अच्छा प्रमाण दिया. चीनी सरकार के आव्हान के चलते, रूस और पाकिस्तान समेत 15 देशों ने इस समारोह का बहिष्कार किया. ये समारोह विश्व मानवाधिकार दिवस पर मनाया गया और भारत, अमरीका, यू के और फ्रांस समेत 46 देशों इस अवसर में सम्मिलित हुए.

श्याबाओ चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार को समाप्त कर लोकतान्त्रिक सुधारों की एक लम्बे समय से मांग कर रहे हैं. 55 वर्षीय श्याबाओ एक लेखक, आलोचक और प्रोफ़ेसर भी हैं. पिछले साल चीनी सरकार ने उन्हे राज्य विरोधी कार्यकलापों के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

फ्रेडरिक बास्तियात ने अपने बहुचर्चित प्रभावी लेख, “क्या देखा जाता है और क्या नहीं देखा जाता” में लिखा है कि हम कैसे मान लेते हैं कि एक सामाजिक प्रणाली का एक तय परिणाम ही होगा, जबकि इसके कई परिणाम हो सकते हैं। ये सभी विरोधाभासी भी हो सकते हैं। सच में तो हम यह भी सोच सकते हैं कि “न देखी गई बात को देखने” की सोच तो कथनात्मक प्रक्रिया है, जिसमें लगातार कुछ न कुछ जोड़ते रहने की जरुरत है। और वाकई, ‘क्या नहीं देखा जाता’ वाकई दृष्टिकोण का मामला है। और जितने ज्यादा लोग उतने ज्यादा दृष्टिकोण। इसी अलग-थलग बात में मैं कॉमनवैल्थ गेम्स के संबंध में अपने कुछ विचार जोड़ना चाहूंग

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नया करने वाला हर व्यक्ति किसी आदर्श व्यक्तित्व का स्वामी, किसी उच्च चेतना और नैतिकता का वाहक नहीं होता। वे तो बस अपने ज़रिये अपने समय को बेलाग-बेलौस अभिव्यक्त कर रहे होते हैं। पुराने ढाँचे में नए की अभिव्यक्ति सहज सरल रूप से ही हो जाय यह हमेशा सम्भव नहीं होता। नया अक्सर वह पुराने ढाँचे को ढहा कर, उस की बाँस-बल्लियां हिला कर ही पैदा होता है। और इसीलिए वह अवैध और अनैतिक बताया जाता है। सोशल नेटवर्क में भी मूल सवाल यही है- मार्क ज़करबर्ग क्या एक अपराधी है? क्या उसने झूठ बोला है, चोरी की है, धोखा दिया है?

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शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम 2009 दरअसल 86वें संवैधानिक संशोधन के तहत मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के सार्वभौमिक अधिकार को सुनिश्चित करने की ही एक वैधानिक कोशिश है। इसके मुख्य बिंदु हैं-

दुनिया जबकि साम्यवाद के पतन की 20वीं वर्षगांठ मना रही है, कई विश्लेषकों को याद होगा कि कैसे सोवियत नीतियों की नाकामी ने सरकार को उत्पादन पर ज्यादा अधिकार दे दिया था और साम्राज्यवादी जाल की संज्ञा देकर कैसे विदेश व्यापार और निवेश को हतोत्साहित किया जाता था। भारत जैसे विकासशील देशों ने भी ऐसी ही नीतियों को अपनाया था, जो साम्यवादी नहीं समाजवादी थे। 1930 के दशक में सोवियत संघ

एक सदी से ज्यादा वक्त हो गया अर्थशास्त्री आदर्श मुद्रा को बनाने या उसे ईजाद करने में जुटे हुए हैं। ऐसी मुद्रा के विस्तृत स्वभाव को लेकर किन्हीं दो अर्थशास्त्रियों तक में सहमति दिखाई नहीं देती। लेकिन फिलहाल वे इसके एक नकारात्मक बिंदु पर तो सहमत दिखाई देते हैं। मुझे शक ही है कि शायद ही कोई अर्थशास्त्री होगा जो अंतरराष्ट्रीय या अमेरिकी मुद्रा प्रणाली का आज की स्थिति में बचाव करना चाहेगा।

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