अन्य

बर्लिन की दीवार बनने का फैसला साम्यवाद को बचाने की आखिरी कोशिश कहा जा सकता है लेकिन दुनिया का दस्तूर है दीवारों के सहारे दुनिया को सुरक्षित रखने के नाम पर असुरक्षित नहीं रखा जा सकता। वैमनस्य और शोषण का प्रतीक बनी यह दीवार किन हालातों में बनी और ढहीः

नब्बे के दशक की बात है जब मैं पूर्व भारत में काफी भ्रमण किया करता था। अपनी इन यात्राओं से मैं इस नतीजे पर पहुंच गया था कि भारत जल्द ही आर्थिक तौर पर तरक्की कर लेगा और इतिहास में पहली बार भारतीय हर बात की कमी से जूझने से उपर उठकर एक ऐसे युग में पहुंच जाएंगे जब अधिकांश की जिंदगी आराम की होगी।

Author: 
गुरचरण दास

अमेरिका की सिलीकॉन वैली और भारत के बैंगलूरू ने निश्चित ही मलेशिया के मल्टीमीडिया कॉरीडोर या टोक्यो बे के अत्याधुनिक आइटी पार्क की तुलना में जबरदस्त सफलता हासिल की है.

Author: 
कँवल रेखी

 

समाचार पत्र दैनिक भास्कर के समूह संपादक श्रवण गर्ग ने आज़ादी. मी के लौंच पर इस नए प्रयोग कि सराहना करी. उन्होने कहा कि देश की  विशाल हिंदी बोलने वाली आबादी लगातार साक्षर हो रही है और देश में तेज़ी से कंप्यूटर व इन्टरनेट का प्रचार प्रसार भी  हो रहा है. ऐसे में हिंदी का ये पहला उदारवादी पोर्टल कुछ ज़रूरी बुनियादी सवालों को उठा कर ज्ञान प्रसारित करेगा.

Category: 

 

नवभारत टाइम्स के पूर्व संपादक वेदप्रताप वैदिक ने आज़ादी.मी के बारे में अपने विचार रखेउन्होने कहा की देश को वास्तव में सच्ची आज़ादी अभी मिली नहीं है. देश में 80 करोड़ लोग सिर्फ 20 रूपये रोज़ पर गुज़र करते हैं और शिक्षा, पोषण, घर सम्बन्धी कई दिक्कतों का सामना करते हैं. इन सभी दिक्कतों  से निजात पाना ही आज़ादी है.

Category: 

 

आज़ादी.मी के बारे में बोलते हुए वरिष्ठ स्तंभकार और लेखक स्वामीनाथन अय्यर ने कहा की भारत को अंग्रेज़ शासकों से आज़ादी तो बहुत पहले मिल गयी पर आज भी हमारे हाथ और कई मामलों में बंधे हुए हैं. आज भी बिना घूस दिए कितने ही काम पूरे नहीं हो सकते. जिस दिन हम इन बंधनों से आजाद हो जायेंगे, वहीँ जीत होगी.

Category: 

 

मशहूर लेखक गुरचरण दास यहाँ कह रहे हैं कि 1947 में हमें सिर्फ वोट देने की और नेता चुनने की आज़ादी मिली पर सन 1991 में ही हमें आर्थिक आज़ादी मिल पायी. इस बीच 40 सालों में हमें सरकार ने लाइसेंस राज में गिरफ्तार कर के रखा.

Category: 

जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत-अमेरिका परमाणु करार को आगे बढ़ाने की बात की तो कई विश्लेषकों को यह लगा कि बुश अमेरिकी परमाणु उपकरण निर्माताओं के लिए कई अरब डॉलर के ऑर्डर का रास्ता साफ करने में जुटे हैं। कई भारतीय वैज्ञानिकों ने इस करार का विरोध इसलिए किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे घरेलू परमाणु ऊर्जा संयंत्र में अमेरिकी दखल बढ़ेगा।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं ने भारत की गरीबी के लिए औपनिवेशिक शोषण को खूब कोसा था। ब्रिटिश लोगों के आने से पहले भारत की गिनती दुनिया की शीर्ष उद्योग और कारोबारी महाशक्तियों में की जाती थी। जब ब्रिटिश गए तो भारत गरीब होकर, तुलनात्मक रूप से और भी पिछड़ गया था। भारतीयों ने इसका दोष ब्रिटेन के माथे मढ़ दिया था और इस बात को लेकर वे आश्वस्त थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद भारत फिर अमीर बन जाएगा।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

Pages