अन्य

देशभर के शहरों में रहनेवाले गरीबों के आंकड़े जुटाने के लिए एक जून से सात माह का सर्वे शुरू हो चुका है. इसके साथ ही गरीबों की पहचान के मानदंड पर बहस भी फ़िर छिड़ गयी है. यह विडंबना ही है कि तमाम योजनाओं के बावजूद गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

शहरी गरीबों की गणना की खबरों के साथ ही गरीबी को लेकर जारी बहस फ़िर छिड़ गयी है. यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि एक तरफ़ तो यह चुनावी प्रक्रिया में गरीबों की बढ़ती भागीदारी पर गर्व महसूस करती है, दूसरी तरफ़ इसी भागीदारी ने राजनीतिक और सांख्यिकीय रूप से गरीबों की पहचान को अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण बना दिया है. इस हद तक कि हम महात्मा गांधी जी के उस सूत्र वाक्य को भी भूल गये, जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई भी कदम उठाने से पहले सबसे गरीब व्यक्ति के चेहरे को याद करें और खुद से पूछें कि आपका यह कदम क्या उसके किसी काम आयेगा?

गरीबी कम करने के मॉडल के तौर पर व्यापक रूप से स्वीकृत किया गया लघुऋण उद्योग अचानक कड़ी आलोचना का शिकार बन गया है, खासतौर पर दक्षिण एशिया में।  भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में एस के एस और अन्य के खिलाफ कथित तौर पर गलत कार्यप्रणाली और उच्च ब्याज़ दर लेने के कारण माहौल में गर्मी है। बांग्लादेश में नोबल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के जीवन पर्यन्त किए कार्यों को गरीबों के गले की फांस कहा जा रहा है। वजह है, ज्यादा ऋणग्रस्तता। हालांकि लघुऋण कार्यक्षेत्र को नियंत्रित करने की बहस प्रासंगिक है, लेकिन इसके लिए संपूर्ण कार्यक्षेत्र को कुसूरवार ठहराने से ना केवल इस उद्योग द्वारा देखरेख किए जाने वाले लाखों गरीब लोगों की जिंदगी पर असर पड़ेगा बल्कि ये प्रभावी ढंग से लघु ऋण से संबद्ध कारणों जैसे भारत में प्रगामी वैश्विक स्वास्थ्य सेवा में भी विघ्न डालेगा।

Category: 

19वीं सदी में तिलक युग से देश में राजनैतिक राष्ट्रीय भावना के नवजागरण का आरम्भ हुआ| उन दिनों बंगाल में भी राष्ट्रीयता के त्रि-आयाम का उद्भव हुआ| सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कर्मयोग, विपिन चंद्र और महर्षि अरविन्द का ज्ञान योग और रविंद्रनाथ की देशप्रेम साधना का भक्तियोग| स्व-देश या निज-देश की भावना उन्हें पारिवारिक विरासत से प्राप्त हुई थी| भारतवर्ष के जीवन आदर्श और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए देवेंद्रनाथ ‘तत्वबोधिनी’ पत्रिका के माध्यम से हमेशा देशवासियों को ईसाई मिशनरियों के धर्मान्तरण के खरते से आगाह करने की कोशिश करते रहते थे| राष्ट्र की व्यापक समस्याओं के विषय में ठाकुर परिवार सदैव सजग रहा था| ऐसे परिवेश में रविंद्रनाथ टैगोर का पालन -पोषण हुआ था| उन्हीं दिनों बंगाल में बंकिमचंद्र, जिन्होंने राष्ट्रीयता और आध्यात्मिकता को जीवन में समान स्था दिया था, का पदार्पण हुआ| देशप्रहरनी दुर्गा के रूप में वंदेमातरम के मंत्र से उन्होंने स्वदेश को दीक्षित किया| हिंदुत्व के आदर्श के आधार पर उन्होंने देश भविष्य का निर्माण करने के लिए महान मन्त्र का प्रचार किया| उनके इस प्रभाव से खुद रविंद्रनाथ भी अपने आपको अलग नहीं कर सके थे| इसिलए वर्ष १८९६ में कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने वन्देमातरम का गायन किया और साथ में ‘ओ भुवनमोहिनी’ की रचना की|

राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना ने बिहार के गांवों को एक नई चमक दी है। जहां एक ओर फिलहाल कुछ मिनट ही सही हरेक दिन तसल्ली के तौर पर ग्रामीणों को बिजली के दर्शन हो जाया करते हैं, वहीं दूसरी ओर तकरीबन सभी गांवों में बिजली की चमक ने एक नए किस्म के दलालों की आंखों में दमक भर दी है।

उदीयमान बीबार में औरंगाबाद जिले में एक गांव है-चनकप। इस गांव में करीब 300 सौ घर हैं। अधिकांश घर खपरैल हैं। साथ ही, अधिकांश लोग भी गरीबी रेखा के नीचे हैं। आजादी के बाद पहली बार संभवतः गांव वालों को बिजली के दर्शन हुए हैं। वैसे, बिजली के तार सालभर पहले से ही गांव के गली-कूचों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

Category: 

प्रेस को नियंत्रित करने के लिए प्रेस कर्मचारियें का वेतन निर्धारित करने से बेहतर तरीका और क्या हो सकता है. कोई पत्रकार सरकार के खिलाफ निभीर्क होकर लिख ही कैसे सकता है, जबकि वह जानता हो कि उसका वेतन सरकार ही निर्धारित कर रही है। एक के बाद एक भारतीय सरकारों ने प्रेस को नियंत्रित करने का आसान तरीका यह पा लिया है कि अखबारों के लिए वैधानिक वेज बोर्ड बना दिया जाए, जिसके तहत अयथार्थ रूप से ऊंचे वेतन निर्धारित कर दिए जाएं जिन्हें देना कानून के तहत जरूरी हो।

Category: 

लोग अगर पूरी तरह स्वतंत्र हों तो सबसे ज्यादा प्रतिभावान ( और सौभाग्यशाली ) लोग सबसे सुस्त और दुर्भाग्यशाली लोगों से कहीं ज्यादा अमीर होंगे। यानी स्वतंत्रता से असमानता पैदा होगी। कम्युनिस्ट देशों ने तानाशाही नियंत्रण के जरिए समाज में समता लाने का प्रयास किया , लेकिन वह पाखंड मात्र था। इन देशों में नियम बनाने वालों और उनका पालन करने वालों के बीच ताकत की कोई समानता मौजूद नहीं थी। स्वतंत्रता और समानता के बीच का तनाव कम करने के लिए देशों को अवसरों की समानता लाने का लक्ष्य लेकर चलना होता है , परिणाम की समानता का नहीं। इसके बावजूद अर्थशास्त्री लगभग हर जगह विषमता का आकलन परिणाम के ही पदों में करते हैं। इससे आंकड़ों का विरोधाभास उत्पन्न होता और गलत विश्लेषण सामने आता है।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

एक भारतीय लेखक को कैंसर पर आई उनकी पुस्तक 'इम्परर ऑफ आल मेलडीज' के लिए पुलित्जर पुरस्कार मिलने पर हम गर्व कर रहे हों लेकिन इसके साथ ही हमको उन तमाम तरह के कैंसर के बारे में तत्काल सोचना होगा जो हमारी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में घर कर चुके हैं।

अभी भले ही ये कैंसर प्राथमिक अवस्था में हों लेकिन अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया और इनका उपचार नहीं किया गया तो ये कैंसर बहुत जल्द ही घातक रूप ले लेंगे और पहले ही देश की 1.2 अरब आबादी को स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने के मामले में संघर्ष कर रहे स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को और अधिक निशक्त कर देंगे। इन कैंसरों में सबसे पहला और संभवत: सबसे चिंताजनक है अभी संगठित होने की शुरुआत कर रहे देश के स्वास्थ्य सेवा आपूर्ति क्षेत्र में उभरती बुराइयों का कैंसर।

Category: 

शांतिपूर्वक तरीके से चल रहे आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और रैलियों को कुचल देने की परंपराएं इतिहास के कई पन्नों मंआ दर्ज हैं। दरअसल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार और हुकूमत के पास विद्रोह को बर्दाश्त करने की क्षमता नहीं होती। यहीं वजह है कि अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को तमाम सरकारें दबा देती हैं। भ्रष्टाचार और काले धन पर शांतिपूर्वक चल रहे  बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के सत्याग्रह के साथ भी ऐसा ही बर्ताव किया गया।

Category: 

मैंने ओसामा बिन लादेन की मौत का जश्न नहीं मनाया। किसी विचार को खत्म करने से कहीं ज्यादा आसान है, किसी व्यक्ति को मार देना। ओसामा की मौत के बाद भी उसके जेहाद की विचारधारा जिंदा रहेगी।

वो 9/11 का मास्टरमाइंड था और जेहाद की दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका था। हालांकि लंबे वक्त से वो जेहादी गतिविधियों से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन इस बीच उसने अलकायदा के विरोधी मुस्लिमों की हत्या करवाने का घृणित काम किया था।

Author: 
स्वामीनाथन अय्यर

भारत की ऊर्जा समस्या बड़ा आकार लेने वाली है। कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल के बड़े उत्पादकों ने हाल ही में कहा कि अगले कुछ सालों में उनके उत्पादन में बहुत कम वृद्धि होगी। जब देश में ईंधन की मांग बढ़ती जा रही है, तब देश के लिए यह बुरी ख़बर है।

इसका मतलब यह हुआ कि और अधिक ईंधन का आयात किया जाएगा और ऊर्जा कंपनियों के आयात खर्च और अधिक बढ़ते जाएंगे। इसका मतलब यह भी हुआ कि भारत का ऊर्जा क्षेत्र तेज़ी से असुरक्षित होता जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया की बाढ़ और मध्य-पूर्व के देशों में फैल रही अशांति जैसी घटनाओं से विश्व आपूर्ति में आयी बाधाओं और अस्थिर कीमतों के कारण यह कमज़ोरी आ रही है।

Category: 

Pages