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महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म नाशिक के निफड तालुके में 18 जनवरी, 1842 को हुआ था। उनके बचपन का अधिकांश समय कोल्हापुर में बीता। 14 साल की अवस्था में उन्होंने बॉम्बे के एल्फिन्सटन कॉलेज से पढ़ाई प्रारंभ की। उन्होंने एक एंग्लो-मराठी पत्र ‘इन्दुप्रकाश’ का सम्पादन भी किया।

- हम अमीर सरकार वाले गरीब देश के निवासी है
- गरीबी उन्मूलन के लिए लाई जाने वाली सरकारी योजनाएं गैरकानूनी और काला धन बनाने का स्त्रोत होती हैं
- यदि समाजवाद के प्रति हमारी सनक बरकार रहती है तो देश का भविष्य अंधकारमय ही रहेगा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल अगले चार महीने में पूरा करने जा रही है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि सरकार इन पांच वर्षों में क्या हासिल करने में सफल रही। सरकार ने कई क्षेत्रों में सुधार पेश किए हैं लेकिन देश भर में स्कूली शिक्षा प्रणालियों में एक बड़ा बदलाव लाने में विफल रही है।

दिल्ली के कम शुल्क वाले बजट स्कूल सरकार से सहयोग की उम्मीद रखते हैं जबकि बदले में उन्हें नियमन संबंधी बाधाएं ही मिलती हैं। स्कूल संचालक सभी नियमों का पालन करना तो चाहते हैं लेकिन दिक्कत उन नियमनों को पूरा करने की कठिन प्रक्रिया है। इस मुद्दे पर दिल्ली के बजट स्कूलों के प्रतिनिधि से विस्तृत बातचीत के कुछ मुख्य अंश.. - आजादी.मी

- अंतर्राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतियोगिता में ‘ड्रीमर्स ऑफ ब्रेसवाना’ और ‘ब्रिंगिग स्कूल्स वेयर देयर इज नन’ को क्रमशः दूसरी और तीसरी श्रेष्ठ फिल्म का खिताब

- एडुडॉक फेलो वर्ग में विकिरण को श्रेष्ठ शॉर्ट फिल्म का पुरस्कार

सुप्रीम कोर्ट ने रोहिंग्या शरणार्थियों पर सुनवाई अगले साल जनवरी तक स्थगित कर दी है। जनवरी 2019 में इस पर आखिरी सुनवाई होगी। याचिका में भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने वापस न भेजने की मांग की है। केंद्र सरकार की दलील है कि ये मसला आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा है लिहाजा अदालत इसमें दखल न दे। वहीं देश में रह रहे रोहिंग्या लोगों ने अपने कैंप में बुनियादी सुविधाओं की कमी की शिकायत भी याचिका में की है।

Author: 
नवीन पाल

- 10वें स्कूल च्वाइस नेशनल कॉंफ्रेंस के दौरान शिक्षाविदों ने वर्तमान शिक्षा प्रणाली को बताया अप्रासंगिक

नई दिल्ली। देश की शिक्षा प्रणाली दशकों पुराने ढर्रे पर चल रही है जबकि दुनिया तेजी बदल रही है। अलग अलग छात्रों की सीखने व समझने की क्षमता अलग अलग होती है जबकि वर्तमान प्रणाली अभी भी सभी छात्रों को समान तरीके से ‘ट्रीट’ करती है। छात्रों का सर्वांगीण विकास हो इसके लिए जरूरी है कि उन्हें वैकल्पिक शिक्षा प्रणाली के माध्यम से ज्ञान प्रदान किया जाए।

क्या देश की शिक्षा व्यवस्था अबतक के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है? क्या ऐसा नीति निर्माताओं की बुरी नीयत का परिणाम है? या यह सेक्टर बुरी नीतियों का परिणाम भुगत रहा है? क्या सुधार के लिए सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रयास सही दिशा में जा रहे हैं?? इन सब का जवाब ढूंढने के लिए आइए जानते हैं विशेषज्ञों का क्या मानना है..

आजादी.मी

देश में सभी छात्रों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा आसानी से, पड़ोस में और कम खर्च में प्राप्त हो सके, अफोर्डेबल अर्थात बजट स्कूलों का यही ध्येय है। स्वप्रेरित एडुप्रेन्योर्स (शिक्षा प्रदाता) इसी उद्देश्य से काम करते हैं लेकिन सरकारी तंत्र और नियमन संबंधी बाधाएं उन्हें ऐसा करने से रोकती हैं। कम से कम बजट स्कूलों की अखिल भारतीय संस्था नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस (निसा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कुलभूषण शर्मा का यही मानना है। इस वीडियो में देखिए कुलभूषण शर्मा और क्या क्या आरोप सरकार और सरकारी तंत्र पर लगा रहे हैं.. आजादी.मी

लाइसेंस, परमिट और इंस्पेक्टर राज की बुरी तहर उलझी समस्याओं ने सेवा क्षेत्र के छोटे उद्यमों को परेशान करना जारी रखा है

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