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रिश्वत देकर अयोग्य लोग शिक्षक बन गए, जब तक राज्य सरकारें इस समस्या का हल नहीं करतीं, तब तक कोई नीति बच्चों का भविष्य नहीं संवार सकती

1947 में इंग्लैंड ने भारत छोड़ दिया, लेकिन वे अपने पीछे अंग्रेजी भाषा और भारतीयों के लिए सिरदर्द भी छोड़ गए। तब से हम अंग्रेजी के अपनी जिंदगी में स्थान को लेकर लड़ रहे हैं। विशेषकर, इस बात पर कि अपने बच्चों को किस भाषा में पढ़ाएं। 

Author: 
गुरचरण दास

“बाजार की असफलता” शब्दावली का ज्यादातर इस्तेमाल राजनेता, पत्रकार, विश्वविद्यालय और अर्थशास्त्र के उच्च श्रेणी के छात्र और शिक्षक करते हैं। हालांकि जो लोग इस शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, प्रायः उन्हें इस बात की बिल्कुल समझ नहीं होती है कि सरकार के पास इस संकट को दूर करने की कितनी क्षमता है। ऐसा मुख्य रूप से सामान्य ज्ञान की कमी और सार्वजनिक चयन वाले अर्थशास्त्र के प्रति अनभिज्ञता के कारण होता है। इसकी वजह से सामान्य बातों और आर्थिक मुद्दों को वह सार्वजनिक चयन सिद्धांत के नजरिए से नहीं देख पाते हैं।

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मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।
मैं सज्जा हूँ, मैं जीवन हूँ। मैं भावों का दर्पण हूँ।।
मैं अमृत हूँ, मैं संगत हूँ। मैं प्रेम की चिर यौवन हूँ।।
मैं हिंदी हूँ, मैं भाषा हूँ। मैं राष्ट्रगौरव की अभिलाषा हूँ।।

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दुनिया भर में 67 करोड़ लोगों के द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली ‘हिंदी’ विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। मैंड्रिन (चीनी) और अंग्रेजी का स्थान क्रमशः पहला और दूसरा है। दुनिया भर में एक ओर जहां तमाम भाषाएं विलुप्त हो रही हैं और उनके संरक्षण और संवर्द्धन के लिए अनेक कदम उठाने की जरूरत पड़ रही है वहीं हिंदी का प्रसार दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है। लेकिन ऐसा हमेशा से ही नहीं था। आजादी के पहले व बाद में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर प्रयास किए जाते रहे। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, पं.

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आमतौर पर यह माना जाता है कि गरीबी दूर करने का सीधा और सरल तरीका यह है कि वंचित लोगों को वह सब उपलब्ध करा दिया जाए जो उनके पास नहीं है। गरीबी दूर करने का यह दर्शन काफी पुराना है और हम सब के दिलो दिमाग में पूरी तरह से रचा बसा है। धर्मार्थ कार्य में विश्वास करने वाले जहां दरिद्र नारायण की सेवा कर अपने को उप कृत समझते हैं वहीं जन कल्याण के लिए कार्य करने वाले (फिलॉंथ्रोपिस्ट्स) गरीबों को वह सब दे देने में विश्वास करते हैं जिन्हें वे स्वयं हासिल नहीं कर सकते। जबकि समाजवादी सरकारों का ज्यादा जोर रॉबिनहुड वाले तरीके यानी कि गरीबी मिटाने के लिए अमीरो

गरीबी को खत्म करने के अभी तक सुने गए प्रस्तावों में सबसे आसान एक एनजीओ में काम करने वाले एक दोस्त की ओर से आया। क्यों न हम न्यूनतम वेतन को इतना बढ़ा दें कि सभी लोग गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएं? यह कितना आसान लगता है मनोहारी और दर्दरहित। अफसोस, यह नाकाम रहेगा क्योंकि हमारे यहां एक ऐसा कानून है जिसका परिणाम अनपेक्षित है।

पिछले दिनों बहु प्रतिक्षित और बहु चर्चित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। देश की शिक्षा को लेकर नीति क्या हो, आखिरी बार यह 1986 में तय किया गया था। हालांकि 1992 में इसमें छिटपुट संशोधन किया गया था। वर्ष 2014 की चुनावी रैलियों में तब के बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और वर्तमान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा नीति में बदलाव की ज़रूरतों को मुद्दा बनाया था। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार द्वारा लागू किये गए शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों की प्रधानमंत्री ने चुनावी रैलियों के दौरान मुखर

दो दिनों पहले भारत ने अनलॉकडाउन 3.0 में प्रवेश किया। केंद्र सरकार द्वारा नाइट कर्फ्यू को समाप्त कर दिया गया है। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी देर तक खुलने की अनुमति दे दी गई है। जिम, योगा सेंटर्स को भी कुछ निर्देशों के साथ खोलने की तैयारी कर ली गई है। तैयारी सिनेमाघरों और मॉल्स को खोलने की भी चल रही है। रेल और विमान सेवा भी सीमित संख्या में शुरु कर दी गई है। सरकार द्वारा दिशा निर्देश में सामाजिक दूरी बनाए रखना, आरोग्य सेतु ऐप का उपयोग करना, मास्क का उपयोग करना और नियमित रूप से हाथों को साफ करने को पूर्व की भांति जारी रखा गया है। 

यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मैं प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं। मैं शराब पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं। मैं सिगरेट पीने पर लगाए गए प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं; मैं सैक्रीन व साइक्लामेट पर प्रतिबंध के पक्ष में नहीं हूं वरन मैं बस इस पक्ष में हूं कि हर किसी को खतरों से अवगत कराया जाए और उन्हें इस बात की छूट मिले कि अपनी पूरी बुद्धिशीलता व अपने निर्णय के अनुसार वे वही करें जो करना चाहते हैं।

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