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भारत बहु विविधताओं वाला देश है। अर्थात यहां की भौगोलिक और पारिस्थितिक स्थिति, रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, भाषा-संस्कृति, जरूरतें आदि लगभग सभी चीजों में भिन्नताएं हैं। यह एक ऐसी अनूठी विशेषता है जिसपर प्रत्येक देशवासियों को गर्व है और हम सभी का यह फर्ज है कि इस विशेषता को सहेज कर रखें। किसी दार्शनिक ने जब ‘एक कमीज सभी पर बराबर नहीं अंट सकती’ (वन शर्ट डज़ नॉट फिट ऑल) का दर्शन प्रस्तुत किया होगा तो कहीं न कहीं हमारे देश की विविधताएं उसके जेहन में अवश्य रही होगी।

पब्लिक पॉलिसी थिंकटैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी, एटलस नेटवर्क व देश के पहले उदारवादी हिंदी वेबपोर्टल आजादी.मी के संयुक्त तत्वावधान में पत्रकारों के लिए आयोजित होने वाले ipolicy वर्कशॉप के लिए आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ा दी गयी है। लैंसडाऊन (उत्तराखंड) की खूबसूरत वादियों में स्थित वनवासा रिसॉर्ट में 12 से 14 जुलाई 2019 तक चलने वाले इस वर्कशॉप के लिए अब 25 जून 2019 तक आवेदन किया जा सकता है। अधिक जानकारी https://bit.ly/2N14h8k पर.. 
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14वर्ष तक की आयु के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया। इस कानून के आने के बाद स्कूलों में छात्रों का नामांकन वैश्विक स्तर (औसतन 95%) के लक्ष्य के पास तो पहुंच गया लेकिन सीखने के परिणामों के मामले में स्तर रसातल में पहुंच गया।

पब्लिक पॉलिसी थिंकटैंक सेंटर फार सिविल सोसायटीएटलस नेटवर्क के संयुक्त तत्वावधान में आजादी.मी एकबार फिर लेकर आए हैं पत्रकारों के लिए अवार्ड विनिंग सर्टिफिकेट कार्यक्रम ipolicy वर्कशॉप। लैंसडाऊन (उत्तराखंड) की खूबसूरत वादियों में स्थित वनवासा रिसॉर्ट में 12 से 14 जुलाई 2019 तक चलने वाले ipolicy वर्कशॉप में शामिल होने के लिए आवेदन करने की अंतिम तारीख बढ़ा दी गई है। अब आईपॉलिसी वर्कशॉप के लिए 25 जून 2019 तक आवेदन किया जा सकता है। तीन दिनों (

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रेहड़ी-पटरी और थड़ी ठेला लगाकर अपनी व अपने परिवार के लिए परिश्रम से रोजी रोटी कमाने वाले पथ विक्रेताओं (स्ट्रीट वेंडर्स) के अधिकारों की रक्षा के लिए वर्ष 2014 में स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट पास किया गया था। लेकिन कानून पास होने के पांच वर्ष बीत जाने के बावजूद दूर दराज के ही नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में भी रेहड़ी पटरी व्यवसायियों का उत्पीड़न लगातार जारी है। स्ट्रीट वेंडर्स एक्ट 2014 के अनुसार शहर के प्रत्येक वार्ड को एक टाऊन वेंडिंग कमेटी गठित करनी होगी जिसके 40% सदस्य स्वयं पटरी व्यवसायी होंगे। यह कमेटी उस वार्ड में रेहड़ी पटरी लगाने वालों

हर कोई जानता है कि भारत में शिक्षा प्रणाली कितनी खराब है – लेकिन कितना अजीब है कि, जब चुनाव होते हैं तो यह एक बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में राज्य की विफलता माता-पिता के वोट देने के तरीके को बदलती नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में गड़बड़ी की स्थिति का सामान्यीकरण हो गया है - जो उदासीनता को स्पष्ट करती है। लेकिन हमारे देश का भविष्य हमारे बच्चों को मिलने वाली शिक्षा पर निर्भर करता है। हमें इसे ठीक करने की जरूरत है।

दशकों तक भारत में ‘अर्थशास्त्र’ का तात्पर्य गरीबी का अध्ययन रहा है। कुछ समय पहले तक कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ाने की शुरूआत ‘गरीबी के दोषपूर्ण चक्र’ नामक सिद्धांत (Theory of vicious circle of poverty) से की जाती थी। इस सिद्धांत के अनुसार गरीबी को दूर नहीं किया जा सकता है। गरीब लोग तथा गरीब राष्ट्र के लिए गरीब रहना नियति है। वास्तव में यह कोरी बकवास है। यदि यह सत्य होता तो संसार आज भी पाषाण युग में होता। जीवनियों (Biography) का इतिहास ‘गरीबी से अमीरी’ का सफर करने वाली कथाओं से भरा पड़ा है। हांगकांग और अमेरिका गरीब अप्रवासियों (immigrants) द्वार

टैगोर जयंती विशेषः

“हिंदुओं के साथ मुसलमानों का अगर कहीं कोई विरोध है तो मैं हिंदू नहीं हूँ, ऐस कहकर इस विरोध को समाप्त करने की इच्छा, फौरी तौर पर समस्या का सहज समाधान लग सकता है; लेकिन सही मायने में यह उपयुक्त नतीजा नहीं निकाल सकता है। ऐसा कहने से हिंदू-मुस्लिम का विरोध पहले जैसा ही रह जाता है। इससे केवल इतना ही होता है कि ऐसा कहकर हम खुद को इस समस्या से अलग कर लेते हैं।

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